December 8, 2009

पहचान की अत्याधुनिक तकनीक बायोमेट्रिक्स



भोपाल (कमल सोनी) >>>> बहुत ही कम लोग ऐसे हैं जिन्होंने बायोमेट्रिक्स का नाम सुना होगा. और यदि सुना भी हो तो शायद इस तकनीकी से निश्चित रूप से अपरिचित होंगे. दरअसल बायोमेट्रिक्स पहचान की अत्याधुनिक तकनीक है. इस तकनीक के माध्यम से इंसानों के विशेष लक्षणों को आधार बनाकर किसी परिस्तिथी विशेष में सही व्यक्ति की पहचान एक ख़ास अंदाज़ में की जाती है. साथ ही आज की Information Technology के युग में बायोमेट्रिक का व्यापक रूप से इस्तेमाल कर जहां एक ओर सुरक्षा के पुख्ता इन्तेजाम किये जा सकते हैं तो दूसरी और शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लायी जा सकती है. भ्रष्टाचार पर अंकुश भी लग सकता है तो किसी भी विभाग की कार्यशैली की मौजूदा पेचीदिगियों को भी दूर किया जा सकता है. राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय या फिर क्षेत्रीय स्तर पर किसी भी व्यक्ति की पहचान सुनिश्चित की जा सकती है. इन्ही खूबियों के चलते अमेरिका, जापान, जर्मनी, आस्ट्रेलिया जैसे कई विकसित देश अरबों-खरबों रूपये निवेश कर बड़े पैमाने पर इस बायोमेट्रिक्स तकनीक का इस्तेमाल भी कर रहे हैं. साथ ही Information Technology के माध्यम से नए-नए प्रयोग कर Biometric के व्यापक इस्तेमाल के लिए कई अनुसंधान कार्य जारी हैं.


Biometrics Technology के प्रयोग से जहां एक ओर अपराधिक तत्वों और उनकी अपराधिक गतिविधियों पर अंकुश लग सकता है तो दूसरी ओर स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक Database तैयार कर कई जोखिमों से बचा जा सकता है. किसी Organization, Company अथवा किसी विभाग के कर्मचारियों को पंजीबद्ध कर प्रतिदिन की उनकी उपस्तिथी से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर Biometrics I-Card के माध्यम से Online Voting करवाकर Fake Voting से भी बचा जा सकता है. इन I-Card के माध्यम से राष्ट्रीय, प्रादेशिक या फिर क्षेत्रीय स्तर पर जनगणना जैसे अहम् कार्य बिना किसी ज़मीनी मशक्कत के सम्पन्न किये जा सकते हैं.


क्या है बायोमेट्रिक्स :- बायोमेट्रिक्स तकनीक इंसानों को ख़ास अंदाज़ में पहचानने का तरीका है। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति विशेष में कुछ लक्षण ऐसे होते हैं जो उसे अन्य इंसानों से जुदा अथवा अलग कर देते हैं. यही वो लक्षण हैं जो व्यक्ति विशेष की सटीक पहचान में सहायक होते हैं. इंसानों के इन्ही लक्षणों के नमूने बायोमेट्रिक नमूने कहलाते है. इन बायोमेट्रिक नमूनों को कम्यूटर में एक विशेष डाटाबेस तैयार कर स्टोर कर लिया जाता है. तथा समय आने पर एक विशेष सोफ्टवेयर के माध्यम से व्यक्ति के नमूनों को लेकर डाटाबेस में स्टोर नमूनों से मिलान कर सही व्यक्ति की पहचान कर ली जाती है. जब हम किसी व्यक्ति के बायोमेट्रिक नमूने (फिंगर प्रिंट, आयरिस) एक इलेक्ट्रानिक डिवाइस (फिंगर प्रिंट स्केनर, आयरिस स्केनर) की मदद से कम्प्यूटर में स्टोर करते है इस प्रक्रिया के दौरान सोफ्टवेयर इन नमूनों का विशेष कोड/स्ट्रक्चर तैयार कर लेता है जो कि यूनिक अथवा एक ही होता है तथा दूसरी बार जब मिलान के लिए पुनः फिंगर प्रिंट/आयरिस नमूने लिए जाते है तो सोफ्टवेयर पुनः वही कोड/स्ट्रक्चर तैयार कर डाटाबेस में स्टोर उसी व्यक्ति के कोड/स्ट्रक्चर से मैच कर यह मेसेज दे देता है कि सम्बंधित व्यक्ति कौन है. यह तकनीक उन व्यक्तियों की भी पहचान में सहायक है जो संदिग्ध होते हैं और झुण्ड में रहते हैं. तथा किसी न किसी अपराधिक गतिविधियों में लिप्त रहते हैं.


क्या होते है वे ख़ास लक्षण :- इंसान के वे खास लक्षण जो उसे किसी दूसरे व्यक्ति से अलग पहचान देते हैं उनमें प्राकृतिक, शारीरिक, व्यवहारिक और अनुवांशिक लक्षण शामिल होते हैं. इन लक्षणों को मुख्यतः दो भागों में विभाजित किया जा सकता है.

१. फिजियोलोजिकल २. बिहेवियरल

फिजियोलोजिकल लक्षण :- ये लक्षण मुख्यतः शारीरिक बनावट से सम्बंधित होते हैं. जैसे कि इंसान के फिंगर प्रिंट, आयरिस यानि आँखों की पुतली, चहरे की बनावट, डीएनए, शरीर की गंध इत्यादि कुछ बायोमेट्रिक लक्षण हैं जो व्यक्ति विशेष की पहचान में सहायक होते हैं.

बिहेवियरल लक्षण :- बिहेवियरल लक्षण अर्थात नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि इन लक्षणों को इंसानों के व्यवहारिक लक्षणों में शामिल किया जाता है जैसे बातचीत का तरीका, चलने का ढंग, आवाज़ इत्यादि.

इन बायोमेट्रिक लक्षणों में सबसे ज़्यादा सफल, सरल और सटीक परिणाम देने वाले लक्षण हैं आयरिस तथा फिंगर प्रिंट. यही वजह है इंसानों के इन दो लक्षणों को आधार बनाकर व्यापक रूप से इसके इस्तेमाल के लिए कई प्रयोग किये जा रहे हैं. जिसके सकारात्मक परिणाम भी मिल रहे हैं.

कैसे करती बायोमेट्रिक्स तकनीक काम :- बायोमेट्रिक्स प्रणाली में सबसे पहले एक समूह विशेष का Enrollment किया जाता है और एक डाटाबेस तैयार कर लिया जाता है. यह समूह विशेष कोई भी हो सकता है. चाहे वह स्थानीय स्तर पर हो या फिर राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर या फिर किसी विभाग अथवा कोई कंपनी विशेष के कर्मचारी. किसी भी स्तर के उस समूह विशेष के बायोमेट्रिक नमूने (फिंगर प्रिंट, आयरिस, या फिर दोनों) एक सोफ्टवेयर तथा एक इलेक्ट्रौनिक डिवाइस (फिंगर प्रिंट स्केनर, आयरिस स्केनर) के माध्यम से डाटाबेस में स्टोर कर लिए जाते हैं. फिर इन नमूनों के साथ सम्बंधित व्यक्ति की अन्य जानकारी जैसे नाम, पता, लाइसेंस नंबर, फोटोग्राफ इत्यादि कुछ जानकारियाँ भी स्टोर कर ली जाती है तथा व्यक्ति को एक आई कार्ड भी दे दिया जाता है. फिर समय आने पर पुनः इस आई कार्ड के साथ व्यक्ति का नमूना लेकर डाटाबेस में स्टोर नमूने से मिलान कर यह सुनिश्चित किया जाता है कि दावा करने वाला व्यक्ति वही हैं कि नहीं जिसके नाम अथवा पते का आई कार्ड वह लेकर आया है.

क्या होते हैं पहचाने के तरीके :- बायोमेट्रिक्स तकनीक से किसी व्यक्ति की पहचान मुख्यतः दो तरीकों से की जाती है :

१.वेरीफिकेशन २.आइडेंटीफिकेशन

वेरीफिकेशन :- जब वन टू वन की तुलना अथवा पहचान करनी हो तो वेरीफिकेशन किया जाता है. अर्थात वह व्यक्ति जो क्लेम कर रहा है उसके बायोमेट्रिक्स नमूने (फिंगर प्रिंट या फिर आयरिस) को लेकर पहले से ही डाटाबेस में स्टोर उसी व्यक्ति के नाम और कोड के बायोमेट्रिक्स नमूनों (फिंगर प्रिंट या आयरिस) से मिलान कर इस बात की पुश्टी की जाती है कि क्लेम करने वाला व्यक्ति कोई दूसरा व्यक्ति तो नहीं.

उदाहरण के लिए वाल्ट डिस्नी वर्ल्ड में बायोमेट्रिक्स तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है. वहां टिकिट बिक्री के वक्त टिकिट खरीदने वाले व्यक्ति का फिंगर प्रिंट ले लिया जाता है तथा जब बाद में वह व्यक्ति टिकिट के साथ डिस्नी वर्ल्ड में प्रवेश करता है तो प्रवेश के वक्त पुनः उस व्यक्ति का फिंगर प्रिंट लेकर डाटाबेस में पहले स्टोर फिंगर प्रिंट के साथ मिलान कर यह सुनिश्चित किया जाता है कि प्रवेश करने वाला व्यक्ति वही व्यक्ति है जिसने टिकिट खरीदा है. कहीं उसकी जगह कोई अन्य व्यक्ति तो टिकिट का इस्तेमाल नहीं कर रहा.

आइडेंटीफिकेशन :- जब वन टू मेनी की तुलना अथवा पहचान करनी हो तो आइडेंटीफिकेशन किया जाता है. आइडेंटीफिकेशन मुख्यतः संदिघ्धों की पहचान के लिए किया जाता है.
कब हुआ पहली बार बायोमेट्रिक्स का इस्तेमाल :- पहली बायोमेट्रिक्स तकनीक का इस्तेमाल वर्ष २००४ में एथेंस (ग्रीस) में हुए ओलम्पिक गेम्स के दौरान किया गया था. जिसमें दर्शकों तथा विसिटर्स जिनमें एथीलीट, कोचिंग स्टाफ, टीम मेनेजमेंट तथा मीडिया कर्मी शामिल थे उनको बायोमेट्रिक्स तकनीक से लैस आई कार्ड दिए गए थे. तथा इन आई कार्ड धारी विसिटर्स को पहचान के बाद ही स्टेडियम में प्रवेश दिया गया था. वर्ष २००४ में एथेंस (ग्रीस) में हुए ओलम्पिक गेम्स के दौरान ऐसा इसीलिये किया गया था क्योंकि वर्ष १९७२ में जर्मनी में हुए ओलम्पिक गेम्स के दौरान आतंकवादी हमले में ११ इस्रायली एथीलीट मारे गए थे.

कहाँ किया जा सकता है बायोमेट्रिक्स तकनीक का इस्तेमाल :-

<><> विभाग,संस्था या किसी कंपनी के कर्मचारियों के बायोमेट्रिक्स नमूनों का डाटाबेस तैयार कर उनकी प्रतिदिन की उपस्तिथी से लेकर उनकी परफोर्मेंस पर नज़र रखी जा सकती है.

<><> इलेक्ट्रौनिक मतदाता पहचान पत्र/इलेक्ट्रौनिक पहचान पत्र बनाकर देश के नागरिकों का रिकॉर्ड एक जगह स्टोर किया जा सकता है. तथा चुनाव के वक्त उसी इलेक्ट्रौनिक मतदाता पहचान पत्र के साथ बायोमेट्रिक्स नमूने से पहचान कर राष्ट्रीय प्रादेशिक अथवा क्षेत्रीय स्तर के ऑनलाइन मतदान संपन्न कराये जा सकते है जिससे न केवल बूथ कैप्चरिंग और फेक वोटिंग से बचा जा सकता है. बल्कि सही मतदान के प्रतिशत का पता भी लगाया जा सकता है.

<><> जन्म के तुरत बाद ही यदि किसी बच्चे के बायोमेट्रिक्स नमूने को लेकर उसकी समस्त जानकारी स्टोर कर लिया जाए और इलेक्ट्रौनिक मतदाता पहचान पत्र/इलेक्ट्रौनिक पहचान पत्र बना दिया जाए तो आने वाले 25 सालों में राष्ट्रहित में पूरा डिजिटल डाटाबेस तैयार किया जा सकता है. साथ ही सुरक्षा के दृष्टिकोण पर किसी संस्था, विभाग, कार्यालय, होटल, या किसी खेल के मैदान या फिर वे सभी स्थान जहां प्रतिदिन कई लोगों का आना-जाना होता है उन जगहों पर प्रवेश के पूर्व इलेक्ट्रौनिक मतदाता पहचान पत्र/इलेक्ट्रौनिक पहचान पत्र अनिवार्य कर प्रवेश कर रहे व्यक्ति की सम्पूर्ण जानकारी लेकर कई जोखिमों से बचा जा सकता है. इसके अलावा रेलवे रिसर्वेशन के वक्त, फ्लाईट रिसर्वेशन वक्त भी इलेक्ट्रौनिक मतदाता पहचान पत्र/इलेक्ट्रौनिक पहचान पत्र को अनिवार्य कर कई आत्मघाती घटनाओं और हमलों को होने से रोका जा सकता है.

<><> अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर डिजिटल पासपोर्ट बनाए जा सकते है.

<><> बैंक अपने ग्राहकों को बायोमेट्रिक्स तकनीक से लैस ATM और Credit Card देकर किसी भी तरह की फ्रॉड गतिविधियों पर रोक भी लगा सकते हैं.

<><> सुरक्षा तंत्र को मज़बूत बनाने के लिए अपराधिक गतिविधियों में संलग्न व्यक्तियों का पृथक से बायोमेट्रिक्स रिकॉर्ड रख उनकी पहचान के साथ उनकी गतिविधयों पर आसानी से नज़र रखी जा सकती है.

भारत में भी हो रहा है बायोमेट्रिक्स का सफल इस्तेमाल :-

<><> 29 जुलाई 2009 से गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय हिसार हरयाना में शिक्षकों व गैर शिक्षक कर्मचारियों की हाजिरी के लिए विवि प्रशासन ने बायोमेट्रिक्स सिस्टम शुरू किया.

<><> 5 अगस्त 2008 से ग्वालियर महापौर विवेक नारायण शेजवलकर ने कर्मचारियों में अनुशासन तथा अपने कार्य के प्रति जबाबदेही बढ़ाने के लिये महाराज बाड़े पर स्थित मुख्यालय पर बायोमेट्रिक्स मशीन का उद्धाटन किया. यह मशीन कर्मचारी के कार्यालय में आने एवं जाने के समय को रजिस्टर करेगी, इसमें प्रत्येक कर्मचारी के ''थम्ब इम्प्रेशन'' को ''स्केन'' कर एक ''कोड नम्बर'' दबाकर एवं अपना ''थम्ब'' (अंगूठा) मशीन के ''स्केनर'' के सामने रखकर अपनी उपस्थिति दर्ज करायेगा। साथ ही इस प्रकार का साफ्टवेयर भी तैयार किया जा रहा है जिसके आधार पर बायोमेट्रिक्स मशीन में प्राप्त डाटा सीधे वेतन संबंधी साफ्टवेयर से लिंक किया जावेगा ताकि इस मशीन में दर्ज उपस्थिति का वेतन निर्धारण में उपयोग किया जा सके।

<><> 26 जून 2009 से दिल्ली की पांच अदालतों जल्द ही बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली प्राम्भ करने के आदेश जारी किये. अदालत के द्वारा कर्मचारियों में अनुशासन बनाए रखने और कार्य संस्कृति विकसित करने के लिए यह कदम उठाया जा रहा है।

<><> 1 सितम्बर 2009 से केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम ने कर्मचारियों का तय समय पर आना-जाना सुनिश्चित करने के लिए मंगलवार को नार्थ ब्लॉक स्थित जैसलमेर हाउस और लोकनायक भवन के कार्यालयों में बायोमेट्रिक उपस्थिति नियंत्रण प्रणली (बीएसीएस) का उद्घाटन किया। समय की पाबंदी के मामले में चिदम्बरम ने खुद ही पहल की और सुबह 9 बजे नार्थ ब्लॉक पहुंच गए और बीएसीएस के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

<><> इसके अलावा भी कई कंपनियों और विभागों ने बायोमेट्रिक्स तकनीक का इस्तेमाल कर पायलट बेस पर इस तकनीक का प्रयोग कर रहे हैं

December 1, 2009

भोपाल गैस त्रासदी: ज़ख्म के 25 बरस, मरहम को तरस रहे पीड़ित

* ठीक 25 साल पहले भोपाल में बरसी थी आसमान से मौत
* 2-3 दिसम्बर 1984 को युनियन कार्बाइड कारखाने से अकस्मात मिथाइल आइसोसायनाईट अन्य रसायनों का हुआ था रिसाव

* 25 साल बाद भी यूनियन कार्बाइड का जहरीला प्रदूषण नहीं छोड़ रहा पीछा
* आज भी कई लोग शारीरिक और मानसिक कमजोरी से हैं पीड़ित
* गैस पीड़ितों की संख्या में सरकारी आंकड़े और गैर सरकारी आंकड़ों में भिन्नता
* यूनियन कार्बाइड के मुखिया वारेन एंडरसन को 5 दिसंबर 1984 को ही दे दी गई थी ज़मानत
* 25 बरस बीत जाने बाद भी दोषियों को कि सज़ा नहीं

भोपाल (कमल सोनी) >>>> ठीक 25 साल पहले दो-तीन दिसंबर 1984 की दरमियानी रात भोपाल में मौत का कहर बरसाने वाली रात थी। तब से लेकर अब तक इस भीषण भोपाल गैस त्रासदी को गुजरे हुए 25 वर्ष हो गए हैं, लेकिन आज भी इस इलाके में जाने पर लगता है मानों कल की ही बात हो. आज 25 साल बाद भी हर सुबह दुर्घटना वाले दिन की अगली सुबह ही नजर आती है. यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से ज़हरीले गैस रिसाव और रसायनिक कचरे के कहर का प्रभाव आज भी बना हुआ है. बच्चे अपंग होते रहे, मां के दूध में ज़हरीले रसायन पाये जाने की बात भी सामने आई, चर्म रोग, दमा, कैंसर और न जाने कितनी बीमारियां धीमा ज़हर बनकर आज भी गैस प्रभावितों को अपनी चपेट में ले रही हैं. मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में आज से 25 वर्ष पहले हुए दुनिया के सबसे बड़े औद्योगिक हादसे को लोग अभी तक नहीं भूल पाए हैं.

क्या थी त्रासदी :- मध्य प्रदेश के भोपाल शहर मे 2-3 दिसम्बर सन् 1984 की रात भोपाल वासियों के लिए काल की रात बनकर सामने आई। इस दिन एक भयानक औद्योगिक दुर्घटना हुई। इसे भोपाल गैस कांड, या भोपाल गैस त्रासदी के नाम से जाना जाता है. 2-3 दिसम्बर 1984 को युनियन कार्बाइड कारखाने से अकस्मात मिथाइल आइसोसायनाईट अन्य रसायनों के रिसाव होने से कई जाने गईं थी. इस त्रासदी को 25 साल पूरे होने आए हैं, उस त्रासदी के वक्त जो जख्म यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से निकली जहरीली हत्यारी गैस ने दिए थे वह आज भी ताजा हैं. हजारों लोगों को आधी रात हत्यारी गैस ने मौत की नींद सुला दिया, सैंकड़ो को जानलेवा बीमारी के आगोश में छोड़ गई यह जहरीली गैस. आज भी गैस के प्रभाव उन लोगों में साफ देखे और महसूस किए जा सकते हैं. उनकी यादों में वह आधी रात दहशत और दर्द की काली स्याही से इतिहास बनकर अंकित हो गई है. उसे न अब कोई बदल सकता है और न ही मिटा सकता.


25 साल बाद भी नहीं पीछा छोड़ रहा जहर :- भोपाल गैस त्रासदी के 25 साल बाद भी यूनियन कार्बाइड का जहरीला प्रदूषण पीछा नहीं छोड़ रहा है। सेंटर फॉर साइंस एंड इंवायरंमेंट द्वारा किए गए परीक्षण में इस बात की पुष्टि हुई है कि फैक्ट्री और इसके आसपास के 3 किमी क्षेत्र के भूजल में निर्धारित मानकों से 40 गुना अधिक जहरीले तत्व मौजूद हैं। सीएसई की निदेशक सुनीता नारायण ने बताया कि फैक्ट्री के कचरे को लेकर भोपाल की जनता को आवाज उठानी चाहिए.


भूजल प्रदूषित :- मध्य प्रदेश प्रदूषण बोर्ड के अलावा कई सरकारी और ग़ैरसरकारी एजेंसियों ने पाया है कि फैक्ट्री के अंदर पड़े रसायन के लगातार ज़मीन में रिसते रहने के कारण इलाक़े का भूजल प्रदूषित हो गया है. कारखाने के आस-पास बसी लगभग 17 बस्तियों के ज़्यादातर लोग आज भी इसी पानी के इस्तेमाल को मजबूर हैं. एक सर्वेक्षण के मुताबिक़ इसी इलाक़े में रहने वाले कई लोग शारीरिक और मानसिक कमजोरी से पीड़ित है. गैस पीड़ितों के इलाज और उन पर शोध करने वाली संस्थाओं के मुताबिक़ लगभग तीन हज़ार परिवारों के बीच करवाए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया है कि इस तरह के 141 बच्चे हैं जो या तो शारीरिक, मानसिक या दोनों तरह की कमजोरियों के शिकार हैं कई के होंठ कटे हैं, कुछ के तालू नहीं हैं या फिर दिल में सुराख हैं, इनमें से काफ़ी सांस की बीमारियों के शिकार हैं. दूसरी और इसे एक विडम्बना ही कहेंगे कि अब तक किसी सरकारी संस्था ने कोई अध्ययन भी शुरू नहीं किया है या न ये जानने की कोशिश की है कि क्या जन्मजात विकृतियों या गंभीर बीमारियों के साथ पैदा हो रही ये पीढियां गैस कांड से जुड़े किन्ही कारणों का नतीजा हैं या कुछ और. और ना ही शासन ने अब तक इस तरह के बच्चों को लेकर कोई कार्रवाई नहीं की है. इन बस्तियों में नज़र दौडाने पर अधूरा पडा सरकारी काम अपने ढुलमुल रवैये की कहानी खुद बताता है.

कितने हुए प्रभावित :- जिस वख्त यह हादसा हुआ उस समय भोपाल की आबादी कुल 9 लाख के आसपास थी और उस समय लगभग 6 लाख के आसपास लोग युनियन कार्बाइड कारखाने की जहरीली गैस से प्रभावित हुए थे सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ लगभग 3000 लोग मारे गए थे. खैर ये थे सरकारी आंकड़े लेकिन यदि गैर सरकारी आंकड़ों की बात की जाए तो अब तक इस त्रासदी में मरने वालों की संख्या 20 हज़ार से भी ज़्यादा है. और लगभग 6 लाख लोग आज भी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं.

क्या है सरकारी क़वायद :- 2-3 दिसंबर 1984 की दरमियानी रात हुई गैस के रिसाव के बाद 1985 में भारत सरकार ने भोपाल गैस विभीषिका अधिनियम पारित कर जिसके बाद अमेरिका में यूनियन कार्बाइड के खिलाफ अदालती कार्यवाही शुरू हुई. लेकिन इससे पूर्व ही यूनियन कार्बाइड के मुखिया वारेन एंडरसन को 5 दिसंबर 1984 को ही भोपाल आने पर ज़मानत दे दी गई थी साथ देश से बाहर जाने अनुमति भी. अमेरिकी अदालत ने इसे क्षेत्राधिकार की बात करते हुए अदालती कार्यवाही भारत में ही चलाने के बात कही. जिसके पश्चात भारत सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर फरवरी 1989 को यूनियन कार्बाइड से 470 मिलियन डालर यानि उस वख्त के हिसाब से लगभग सात सौ दस करोड़ इक्कीस लाख रूपए लेना स्वीकार कर लिया. उसमें से मवेशियों के लिए 113 करोड़ और बाकी की राशी लगभग 1 लाख 5 लज़ार पीडितो के लिए अनुमानित थी जिनको 1989 के आदेशों के मुताबिक़ 57 हज़ार रुपये प्रति व्यक्ति मिलाने वाले थे. जबकि उस दौरान तक पीड़ितों की संख्या बढाकर 5 लाख पहुँच गई थी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 31 अक्टूबर 2009 तक पांच हज़ार चौहत्तर हज़ार तीन सौ बहत्तर गई पीड़ितों को मुआवजा दिया जा चुका है वह भी सिर्फ 200 रुपये प्रतिमाह अंतरिम राहत के तौर पर. कुछ लोगों का यह कहना है कि गैस पीड़ितों को मुआवजे में कम राशि दी गई है मृतकों के परिवार को महज़ 1 लाख रुपये की दो किस्त देकर मामला दबा दिया गया. तो कुछ पीड़ितों को मात्र 25 हज़ार रुपये दे दिए गए.

न्याय को तरस रहे हैं पीड़ित :- 2-3 दिसंबर की दरमियानी रात जहां भोपाल में हवा में मौत घुली थी तो आज कई पीड़ितों जिंदगियों में मौत घुली हुए है एक नई पीढ़ी तैयार हो गई, सरकारें आई और चली गईं, लेकिन किसी को गैस पीड़ितों की सुध नहीं आई. मुआवजा तो दूर असहाय लोगों को ईलाज के लिए भी तरसना पड़ गया. गैस पीड़ितों के लिए एक केन्द्रीय आयोग गठित होना चाहिए, यह बात 25 सालों के बाद केन्द्र सरकार को समझ में आई है. हालांकि केन्द्रीय आयोग बनने में भी अभी कई पेंच हैं. बहरहाल हालात अभी भी उतने ही खराब हैं, जितने कि हादसे के बाद अगली सुबह में थे. गैस जनित बीमारियों से आज करीब सवा लाख लोग जूझ रहे हैं और प्रभावित लोगों की औसत उम्र महज 46-47 वर्ष रह गई है. टी.बी. एवं कैंसर जैसी भयानक बीमारियां लोगों को काल के गाल में धकेल रही हैं. हैण्डपंप पानी के स्थान ज़हर उगल रहे हैं और मजबूरन लोगों को यही पानी पीना पड़ता है. हालांकि पानी सप्लाई का कुछ जरूर हुआ है, लेकिन अभी कसर बाकी है. पानी सप्लाई कर देना मुद्दा नहीं है, मुद्दा पीड़ितों के दीर्घकालीन अस्तित्व और पर्यावरण से अधिक जुड़ा है. इतने वर्षों के बाद भी सरकार अभी यह फैसला नहीं कर पाई है कि कारखाने के भीतर दबे 10 हजार टन रसायनिक कचरे का निपटान कैसे किया जाए. हालात यह हो गए हैं कि आज करीब 3 किलोमीटर का क्षेत्र घातक रसायनों के जमीन में रिसाव के कारण स्थिती संवेदनशील हो चुकी है, जो स्वास्थ्य के लिहाज से किसी भी सूरत में सही नहीं ठहराया जा सकता.

केंद्र नहीं दे रहा मदद :- नगरिय प्रशासन मंत्री बाबूलाल गौर का कहना है कि गैस त्रासदी एक्ट 1985 के अंतर्गत केंद्र सरकार ने गैस पीड़ितों को मदद देने की पूरी जिम्मेदारी ली थी. इसके बावजूद 1999 से अब तक कोई राशि केंद्र सरकार ने नहीं दी है. राज्य सरकार गैस पीड़ितों पर 250 करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है. राज्य सरकार ने 982 करोड़ रुपए की कार्य योजना केंद्र को भेजी है जो मंजूर की जानी चाहिए. उन्होंने कहा कि राज्य सरकार एक स्मारक भी बनाना चाहती है. इसके लिए राज्य सरकार ने 11 करोड़ रुपए भी मंजूर किए हैं.

बहरहाल अफसोस की बात तो यह है कि इतना बड़ा हादसा होने के बाद इसके ज़िम्मेदारों को कोई सजा नहीं मिली सज़ा तो दूर इस हादसे से प्रभावित हुए लोगों की सही न्याय भी नहीं मिला. जबकि इस हादसे में सबसे ज़्यादा प्रभावित ऐसे लोग थे जो रोज़ कुआ खोदने और रोज़ पानी पीने का काम किया करते थे. काफ़ी विरोध के बाद 1992 में भोपाल की एक अदालत ने वारेन एंडरसन के खिलाफ वारंट जारी कर सीबीआई से इस मामले में कार्यवाही करने को कहा था. 2001 से यूनियन कार्बाइड पर मालिकाना डाओ केमिकल्स अमेरिका का है जिसने अभी तक कारखाना परिसर से जहरीला रासायनिक कचरा हटाने में भी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. और आज भी 25 वर्षों से गैस पीड़ित इस ज़ख्म के साथ दर्द भरा जीवन जीने को मजबूर है और मरहम को तरस रहे हैं इसे हमारे देश की विडम्बना कहें या फिर इस देश के निवासियों का दुर्भाग्य, सरकार 11 करोड़ रुपये खर्च कर स्मारक बनाने की बात तो करती है लेकिन भ्रष्टाचार में डूबे सरकारी तंत्र में सुधार लाकर वास्तविक गैस पीड़ितों न्याय दिलाने की दिशा में कोई सकारात्मक कदम नहीं उठा सकती.

November 10, 2009

भोपाल गैस त्रासदी: आम लोगों के लिए खुलेगा युनियन कार्बाइड कारखाना


कमल सोनी >>>> तीन दिसंबर 1984 से लेकर अब तक भोपाल गैस त्रासदी को गुजरे हुए 25 वर्ष होने वाले हैं, लेकिन आज भी इस इलाके में जाने पर लगता है मानों कल की ही बात हो. आज 25 साल बाद भी हर सुबह दुर्घटना वाले दिन की अगली सुबह ही नजर आती है. यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से ज़हरीले गैस रिसाव और रसायनिक कचरे के कहर का प्रभाव आज भी बना हुआ है। बच्चे अपंग होते रहे, मां के दूध में ज़हरीले रसायन पाये जाने की बात भी सामने आई, चर्म रोग, दमा, कैंसर और न जाने कितनी बीमारियां धीमा ज़हर बनकर आज भी गैस प्रभावितों को अपनी चपेट में ले रही हैं।


मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में आज से 25 वर्ष पहले हुए दुनिया के सबसे बड़े औद्योगिक हादसे को लोग अभी तक नहीं भूल पाए हैं, लेकिन अब आम लोग उस यूनियन कार्बाइड कारखाने को करीब से देख सकेंगे, जिससे हुए गैस रिसाव से सैकड़ों लोग मारे गए थे। आगामी 3 दिसंबर को भोपाल गैस त्रासदी को 25 साल पूरे हो जाएंगे। यह कारखाना कैसा है, हादसे के वक्त कहां से गैस रिसी थी, मौत का वह कुआं कौन-सा है जिसमें से कई शव निकाले गए थे, इसे आम लोगों ने अब तक देखा नहीं है। यह कारखाना 20 नवंबर से पांच दिसंबर तक आम जनता के लिए खोल दिया जाएगा। इसके लिए कारखाने से 25 फीट दूर बेरीकेट्स लगाए जाएंगे। प्रदेश के गैस त्रासदी एवं पुनर्वास मंत्री बाबूलाल गौर ने प्रशासनिक अमले के साथ सोमवार शाम कारखाने का निरीक्षण किया।


गौर का कहना है कि कारखाने को आम लोगों के लिए खोलने के पीछे मकसद यह है कि लोग जान सकें कि कारखाने में खतरनाक रासायनिक कचरा नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि विभिन्न वैज्ञानिक संगठन कचरे का परीक्षण कर स्पष्ट कर चुके हैं कि कारखाने में मौजूद अपशिष्ट खतरनाक नहीं है। इतना ही नहीं कारखाना परिसर में लगे वृक्ष और घास-फूस भी अपशिष्ट के खतरनाक नहीं होने की पुष्टि करते हैं।


क्या थी त्रासदी :- मध्य प्रदेश के भोपाल शहर मे 3 दिसम्बर सन् 1984 की रात भोपाल वासियों के लियी काल की रत बनाकर सामने आई इस दिन एक भयानक औद्योगिक दुर्घटना हुई। इसे भोपाल गैस कांड, या भोपाल गैस त्रासदी के नाम से जाना जाता है। ३ दिसम्बर १९८४ को युनियन कार्बाइड कारखाने से अकस्मात मिथाइल आइसोसायनाईट अन्य रसायनों के रिसाव होने से कई जाने गईं थी


न्याय को तरस रहे हैं पीड़ित :- एक नई पीढ़ी तैयार हो गई, सरकारें आई और चली गईं, लेकिन किसी को गैस पीड़ितों की सुध नहीं आई। मुआवजा तो दूर असहाय लोगों को ईलाज के लिए भी तरसना पड़ गया। गैस पीड़ितों के लिए एक केन्द्रीय आयोग गठित होना चाहिए, यह बात 25 सालों के बाद केन्द्र सरकार को समझ में आई है। हालांकि केन्द्रीय आयोग बनने में भी अभी कई पेंच हैं। बहरहाल हालात अभी भी उतने ही खराब हैं, जितने कि हादसे के बाद अगली सुबह में थे। गैस जनित बीमारियों से आज करीब सवा लाख लोग जूझ रहे हैं और प्रभावित लोगों की औसत उम्र महज 46-47 वर्ष रह गई है। टी।बी. एवं कैंसर जैसी भयानक बीमारियां लोगों को काल के गाल में धकेल रही हैं। हैण्डपंप पानी के स्थान ज़हर उगल रहे हैं और मजबूरन लोगों को यही पानी पीना पड़ता है। हालांकि पानी सप्लाई का कुछ जरूर हुआ है, लेकिन अभी कसर बाकी है। पानी सप्लाई कर देना मुद्दा नहीं है, मुद्दा पीड़ितों के दीर्घकालीन अस्तित्व और पर्यावरण से अधिक जुड़ा है। इतने वर्षों के बाद भी सरकार अभी यह फैसला नहीं कर पाई है कि कारखाने के भीतर दबे 10 हजार टन रसायनिक कचरे का निपटान कैसे किया जाए। हालात यह हो गए हैं कि आज करीब 3 किलोमीटर का क्षेत्र घातक रसायनों के जमीन में रिसाव के कारण स्थिती संवेदनशील हो चुकी है, जो स्वास्थ्य के लिहाज से किसी भी सूरत में सही नहीं ठहराया जा सकता।


केंद्र नहीं दे रहा मदद :- गौर ने बताया कि गैस त्रासदी एक्ट 1985 के अंतर्गत केंद्र सरकार ने गैस पीड़ितों को मदद देने की पूरी जिम्मेदारी ली थी। इसके बावजूद 1999 से अब तक कोई राशि केंद्र सरकार ने नहीं दी है। राज्य सरकार गैस पीड़ितों पर 250 करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है। राज्य सरकार ने 982 करोड़ रुपए की कार्य योजना केंद्र को भेजी है जो मंजूर की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार एक स्मारक भी बनाना चाहती है। इसके लिए राज्य सरकार ने 11 करोड़ रुपए भी मंजूर किए हैं।



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October 16, 2009

पंचकल्याण पर्व दीपावली (दीपावली विशेष)

सभी बलोगर मित्रों को कमल सोनी की ओर से दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं..................
भोपाल (कमल सोनी) 16/अक्टूबर/2009/(ITNN)>>>> भारत में पर्व संस्कृति की दीर्घ परंपरा में दीपावली जैसा कोई दूसरा पर्व नहीं है। दीपावली पांच दिनों का श्रृंखलाबद्ध माननीय त्योहार है। कार्तिकमास कृष्णपक्ष की त्रयोदशी, चतुर्दशी तथा अमावस्या और शुक्लपक्ष की प्रतिपदा तथा द्वितीया तक आयोजित यह पर्व केवल आगम-निगम का सम्मेलन ही नही होता बल्कि जीवन के तमाम कर्मपक्ष इन्हीं पांच दिनो में अनुस्यूत हो उठते है। कार्तिक की अमावस्या को दीवाली कहा जाता है। इस दिन देश भर में चौतरफा दीपमालाएं प्रज्जवलित की जाती है। नदी तटों, देव मंदिरों, चौराहों और गलियो में जलते हुए दीपक अमावस्या के निविड़ अंधकार को पराजित कर खिलखिला उठते है। इस दिन घूरे के भी दिन बहुरते है। छोटे-बड़े सभी एक रूप। यह है दीपावली का ममैव पक्ष। भ्रतहरि का कहना है, 'कृतिनाम् अपि स्फुरति एष निर्मल विवेद दीपक:' अर्थात दीपावली मनाने वाले कृतीजन मिट्टी के दीए तो जलाते ही हैं, साथ ही वे अपने विवेक-दीपक भी जला लेते है। दीपावली पंचकल्याण पर्व है। इसे पांच दिनों के श्रृंखलाबद्ध कृत्यों द्वारा सम्पन्न किया जाता है। इसका मुख्य त्योहार है अमावस्या, परन्तु अमावस्या के दो दिन पहले से दो दिन बाद तक यह पर्व मनाया जाता है। दो दिन पहले के पर्व है - धनतेरस और नरक चतुर्दशी।
धनतेरस :- धनतेरस दीपावली की शुरुआत होती है। इस दिन क्रेता-विक्रेताओं का उत्तोजक संगमन होता है। दीपवृक्षों और दीप प्रखंडिकाओं से दुकानें सजाई जाती है। आजकल बिजली की सजावटे कलात्मक बाजारों को चुनौतियां देने की कोशिश कर रही है परन्तु प्राचीनता अपना अस्तित्व कायम रखना चाहती है। ग्लोबल बाजार रहे तो रहे। धनतेरस के बाजार में स्वर्ण, रजत पात्र से लेकर स्टेनलेस स्टील तक के पात्रों की बिक्री हो जाती है। दीपावली को शिष्टाचारी भक्त लगभग आधी रात को क्रीत पात्रों सहित लक्ष्मी पूजन करते है। लक्ष्मी और गणेश की स्थापना करते हैं। बाएं गणेश दाहिने लक्ष्मी। धनतेरस की पूजा का अर्थ ही है लक्ष्मी का आवाहन। गणेश स्थायी सुरक्षा देने वाले देवता माने जाते है। इस प्रकार धनतेरस दीपावली के उत्सव को काफी सघन बना देता है।
नरक चौदस :- इसे नरक चतुर्दशी इसलिए कहा जाता है कि इसी दिन घर का सारा कूड़ा-कतवार बाहर निकालकर एक स्थान पर फेंक देते है। शाम होते-होते कतवार के उस ढेर पर घर के सबसे बड़े दीए को कड़ुवा तेल से भरकर चारों मुंह जला देते है। किसी भी ओर से नरकासुर के आने की संभावना नहीं रह जाती। कार्तिक की कृष्णा चतुर्दशी 'यम' का दिन होती है। यम और यमी की पूजा दीपावली को वैदिक परंपरा से जोड़ देती है। पद्मपुराण, भविष्य पुराण, गरुड़ पुराण और स्कंद पुराण जैसे कई दूसरे पुराणों में दीपावली पर्व की राष्ट्रीय धारा पर बड़ी-बड़ी कथाएं लिखी गई है।
दीपावली :- धनतेरस और नरक चतुर्दशी पूर्व पर्वो के बाद कृषिकर्मा दीपावली आती है। दीपावली को महानिशा और शुभ रात्रि माना गया है। इस रात में सूर्य और चंद्रमा की युति शुक्र की तुला राशि में होती है जो कि भौतिक सुखों और संपन्नता को प्रदान करती हैं। श्रीसूक्त और भविष्यपुराण के अनुसार लक्ष्मीजी का वास बिल्ववृक्ष में माना गया है। दीपावली की रात के तीसरे और चौथे प्रहर में मंत्र और यंत्रों को सिद्ध करके संपन्नता प्राप्त की जा सकती है।
प्रात:काल ही मिट्टी के दीए और काजल पारने की मृत्तिका घटी खरीदे जाते है। दिन में दीपावली का विशेष पकवान बनता है। विशेष इस अर्थ में कि सूरन का भर्ता और नए आलू के साथ नए बैगन की सब्जी अवश्य बनाते है। यहा यह कह देना असंगत न होगा कि सूरन और बैगन आर्यकालीन द्रविड़ों के मुख्य भोग्य थे, जिन्हे वे यम-दिशा में उगाते थे। बाद में आर्यो ने भी इन्हे खाना शुरू कर दिया। दीपावली पर ओदन और उड़द का बड़ा का पकवान निश्चित बनता है। दीपावली पर ऋग्वेदिक आर्यो का सबसे प्रिय खेल द्यूतक्रीड़ा था। महाभारत का पूरा युद्ध ही द्यूत-क्रीड़ा का परिणाम माना गया है। ये सभी कर्म निगमवादी है, परन्तु दीपावली को आगमवादियों ने भी कम महत्व नहीं दिया है। दीपावली की आधी रात को तंत्रसाधना का बहुविधान किया गया है। दीपावली की आधी रात के करीब घंटी में पारा गया काजल पूरे घर को लगाया जाता है। इससे आंख की रोशनी तो बढ़ती है है तांत्रिक साधकों की नजर भी नहीं लगती। दीपावली की सारी रात श्वान निद्रा तक सीमित रहती है क्योंकि उषाकाल होते ही घर की कोई स्त्री शूर्पवादन करते हुए घर के कोने-कोने से दरिद्रता का निष्काषन और ईश्वरता का प्रवेशन करती है।
दीपावली पर प्रचलित कथा :-
भगवान राम अयोध्या लौटें : 14 साल के वनवास के बाद भगवान राम, रावण का वध करकर अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अयोध्या वापस आये थे इसी दिन अयोध्या अपने राजा की वापसी मनाता है, दीपावली के दिन अयोध्यावासियों ने दीप जलाकर भगवान राम का स्वागत किया था एक युद्ध जिसमें भगवान राम ने रावण को मार डाला था
अन्नकूट :- दीपावली की रात बीती और शुक्ल प्रतिपदा लगते ही अन्नकूट की सजावट प्रारंभ हो जाती है। अन्नकूट देवता के भोगोपरांत प्राय: सभी मंदिरों, घरों में दर्शन-पूजन और कथा श्रवण तथा दीपदान का विधान होता है। अन्नकूट के भोग के लिए छप्पन प्रकार के व्यंजन बनते है। अन्नकूट के दिन भगवान को कच्चा भोग लगाया जाता है यानि आज के दिन अनाज के व्यंजन बनाकर भगवान को भोग लगाया जाता है आज के दिन गोवर्धन पूजा भी की जाती है, यही वह दिन है जो कृष्ण इंद्र हार के रूप में मनाया जाता है. आज ही के दिन भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाया था इसीलिये अन्नकूट के दिन कृष्ण मंदिरों में गोवर्धन पूजा का विशेष आयोजन भी किया जाता है
भैयादूज :- दीपावली के पाँच दिन चलने वाले महोत्सव में शामिल है 'भाई दूज' उत्सव। भैयादूज अन्नकूट के दूसरे दिन पड़ता है। हिंदू समाज में भाई-बहन के अमर प्रेम के दो ही त्योहार हैं। पहला है रक्षा बंधन जो श्रावण मास की पूर्णिमा को आता है तथा दूसरा है भाई दूज जो दीपावली के तीसरे दिन आता है। भाई दूज को यम द्वितीया भी कहते हैं। परम्परा है कि रक्षाबंधन वाले दिन भाई अपनी बहन को रक्षा का वचन देकर उपहार देता है और भाई दूज वाले दिन बहन अपने भाई को तिलक लगाकर, उपहार देकर उसकी लम्बी उम्र की कामना करती है। रक्षा बंधन वाले दिन भाई के घर तो, भाई दूज वाले दिन बहन के घर भोजन करना अति शुभ फलदाई होता है।
भाई दूज की कथा : - सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज तथा यमुना का जन्म हुआ। यमुना अपने भाई यमराज से स्नेहवश निवेदन करती थी कि वे उसके घर आकर भोजन करें। लेकिन यमराज व्यस्त रहने के कारण यमुना की बात को टाल जाते थे। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना अपने द्वार पर अचानक यमराज को खड़ा देखकर हर्ष-विभोर हो गई। प्रसन्नचित्त हो भाई का स्वागत-सत्कार किया तथा भोजन करवाया। इससे प्रसन्न होकर यमराज ने बहन से वर माँगने को कहा। तब बहन ने भाई से कहा कि आप प्रतिवर्ष इस दिन मेरे यहाँ भोजन करने आया करेंगे तथा इस दिन जो बहन अपने भाई को टीका करके भोजन खिलाए उसे आपका भय न रहे। यमराज 'तथास्तु' कहकर यमपुरी चले गए।
दीपावली(विशेष संयोग) "लक्ष्मी के साथ सूर्य, शनि को भी पूजें" :- दीपावली पर इस बार तुला संक्रांति और शनि अमावस्या भी पड़ रही है। अतरू जो लोग लोहा या उससे जुड़ा व्यापार करते हैं उनके लिए यह लाभदायक है। ज्योति पर्व पर इस बार जो योग बन रहे हैं, वह सभी के लिए अच्छे हैं। ज्योतिषाचार्य आशु गुरु कहते हैं कि दीपावली शनिवार को पड़ रही है, अतरू शनि से संबंधित लोगों के लिये यह लाभ दायक है। जो लोग शेयर, जमीन, लोहा आदि से जुड़ा व्यापार करते हैं, उनके लिए यह शुभदायक होगी। पूजन सायं 07:22 बजे से 09:15 बजे तक किया जायेगा। इस दौरान वृष लगन होगी। जो लोग सिद्घि करना चाहते हैं उनके लिए रात्रि 01:52 से लेकर 04:05 तक है।
एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने लोगों का भ्रम दूर किया। बताया कि 17 अक्टूबर को ही दीपावली पूजन है, क्योंकि इस दिन दोपहर 12:37 से अमावस्या लग रही है। महालक्ष्मी पूजन रात्रि को ही होता है, इसलिए दूसरे दिन यह तिथि रात्रि में नहीं होगी। उन्होंने बताया कि दक्षिणावर्ती शंख में चांदी का सिक्का और साबुत चावल, गौरीशंकर रुद्राक्ष, स्फटिक श्रीयंत्र को एक साथ रखकर दीपावली पूजन करें। इससे सभी मनोकामना पूर्ण होंगी।
ज्योतिष विभाग की पूर्व अध्यक्ष डा:किरन जेटली ने बताया कि 17 अक्टूबर दोपहर 11:30 बजे से तुला संक्रांति भी है। प्रातरू सूर्य की उपासना से सुख-समृद्घि आती है। इस दिन प्रातरू गेंहू, तांबे का बर्तन, लाल फूल आदि दान करना लाभदायक है। उनके अनुसार प्रदोष काल (संध्या समय) सायं 05:45 से 11:35 बजे तक मुहुर्त सर्वश्रेष्ठ है।
दीपावली की रात्रि को निम्न उपाय भी करें :-
>> इस दिन श्रीयंत्र को स्थापित कर गन्ने के रस और अनार के रस से अभिषेक करके लक्ष्मी मंत्रों का जाप करें।
>> दीपावली की रात्रि को पीपल के पत्ते पर दीपक जलाकर नदी में प्रवाहित करें। उसके दूर जाने की प्रतीक्षा करें। इससे आर्थिक संकट दूर होंगे।
>> लक्ष्मी पूजन के समय अपने बहीखातों व कलम-दवात का पूजन करना चाहिए।
>> दीपावली को रात्रि में हात्थाजोड़ी को सिंदूर में भरकर तिजोरी में रखने से धन में वृद्धि होती है।
>> सात गोमती चक्र और काली कोड़ियों को व्यापार वाले स्थान में रखने से निरंतर व्यापार में वृद्धि होती रहती है।
>> घर पर हमेशा बैठी हुई लक्ष्मीजी की और व्यापारिक स्थल पर खड़ी हुई लक्ष्मीजी की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए।
>> लक्ष्मीजी को गन्ना, अनार, सीताफल अवश्य चढ़ाएं।
>> इस दिन पूजा स्थल में एकाक्षी नारियल की स्थापना करें। यह साक्षात लक्ष्मी का ही स्वरूप माना गया है। जिस घर में एकाक्षी नारियल की पूजा होती हो, वहां लक्ष्मी का स्थाई वास होता है।
>> दीपावली की रात्रि में श्रीसूक्त, कनकधारा स्तोत्र एवं गोपाल सहस्रनाम का पाठ करने से लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है।

October 10, 2009

ओबामा को नोबेल, क्या नोबेल पर भी राजनीति हावी ?

भोपाल (कमल सोनी) 10/अक्टूबर/2009 >>>> अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को वर्ष 2009 का शांति का नोबेल पुरस्कार दिया जाएगा लेकिन सबसे अहम् सवाल यह है कि अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी को नोबेल क्यों नहीं मिला जबकि ओबामा खुद महात्मा गांधी को "रियल हीरो" मानते है ओबामा को वर्ष 2009 का शांति का नोबेल पुरस्कार दिए जाने की घोषणा से फिर एक नया विवाद उठ खडा हुआ है इससे पूर्व भी शांति के लिए दिए जाने वाले नोबेल पुरस्कार पर विवाद उठ चुके हैं वर्षो से इनकी चयन प्रक्रिया पर उंगली उठती रही है। यूं कहें कि शांति के नोबेल पुरस्कार और विवादों का चोली-दामन का साथ है तो गलत न होगा। ख़ास बात तो यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा स्वयं नोबेल शांति पुरस्कार के लिए उनके चयन पर ‘आश्चर्यचकित’ हैं और उन्हें इस पर संदेह है कि क्या वह इस सम्मान के हकदार हैं।
हैरत में डालने वाली एक ख़ास बात तो यह है कि अभी उन्हें पद संभाले हुए एक साल भी नहीं हुआ फिर एक साल में उन्होंने ऐसा क्या कर दिया कि उन्हें 2009 का शांति का नोबेल पुरस्कार दिए जाने की घोषणा कर दी गई इसमें कोई दो मत नहीं कि ओबामा के प्रयास सराहनीय नहीं हैं नोबेल पुरस्कारों के लिए बनी निर्णायक समिति ने अपने बयान में कहा है कि बराक ओबामा को यह पुरस्कार देने का निर्णय उनके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक प्रयासों को विशेष गति देने के लिए किया गया है
इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए ओबामा के चुने जाने की खबर अमेरिकियों के साथ ही शेष विश्व के लोगों के लिए भी चौंका देने वाली ही है क्योंकि उनका नाम न तो संभावितों की सूची में कहीं था और न ही नोबेल शांति पुरस्कार के दावेदारों में उनके बारे में कोई अटकल थी। ओबामा ऐसे तीसरे पदस्थ राष्ट्रपति हैं जिन्हें यह प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला है। वर्ष 1906 में टी. रूजवेल्ट और 1919 में वूड्रो विल्सन को भी नोबेल शांति पुरस्कार मिल चुका है। वर्ष 2002 में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर को भी यह पुरस्कार मिला था।
यहाँ एक ख़ास बात और गौर करने लायक यह है कि अमेरिका को भले ही कई लड़ाइयों के लिए दोषी ठहराया जाता रहा हो, लेकिन शांति के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वालों में सबसे आगे अमेरिकी ही हैं। 1901 में शुरुआत से अब तक करीब दो दर्जन अमेरिकियों को यह पुरस्कार मिल चुका है।
एक और रोचक तथ्य यह है कि ओबामा ने 20 जनवरी 2009 को अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में काम शुरू किया। नोबेल शांति पुरस्कार के नाम लेने की अंतिम तारीख 1 फरवरी 2009 थी। यानी 11 दिन के उनके कार्यकाल पर उन्हें विश्व में अमन स्थापित करने का सम्मान दे दिया गया! यही नहीं, निर्णायकों ने अपने वोट जून में दे दिए थे- यानी तब भी चार माह हुए थे ओबामा के उन प्रयासों को, जो किसी और को तो खैर दिखे तक नहीं, किन्तु नोबेल कमेटी को ‘असाधारण, अद्वितीय’ लगे। सम्मान की घोषणा वाले दिन तक भी वे नौ माह पुराने ही ‘शांति के क्रांतिकारी’ हैं।
अंततः अब हर आदमी के दिल में एक ही सवाल जन्म ले रहा है कि अब कहीं यह पुरस्कार राजनीति से प्रेरित तो नहीं हो गया ?
सन १९८० से शांति के लिए नोबल पुरस्कार विजेताओं की सूची :-
<><><> 2009: यूं एस प्रेसिडेंट बराक ओबामा
<><><> 2008: मर्त्ति आहतिसाड़ी
<><><> 2007: इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज, अल गोरे
<><><> 2006: मुहम्मद युनुस, ग्रामीण बैंक
<><><> 2005: इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेन्सी, मोहमद एल्बरादी
<><><> 2004: वंगारी माथाई
<><><> 2003: शिरीन एबादी
<><><> 2002: फोर्मेर यूं एस प्रेजिडेंट जिमी कार्टर
<><><> 2001: यूनाइटेड नेशन्स, कोफी अन्नान
<><><> 2000: किम डे-ज़ंग
<><><> 1999: मेडेसिंस साँस फ़्रन्तियरर्स
<><><> 1998: जॉन ह्युमे, डेविड त्रिम्ब्ल
<><><> 1997: इंटरनेशनल काम्पैन तो बैन लैंडमाइंस, जोडी विलियम्स
<><><> 1996: कार्लोस फिलिपे ज़िमेनेस बेलो, जोसे रामोस-होर्ता
<><><> 1995: जोसफ रोटब्लाट, पुगवाश कोंफ्रेंस ऑन साइंस एंड वर्ल्ड अफेयर्स
<><><> 1994: यासेर अराफात, शिमोन पेरेस, यित्ज्हक राबिन
<><><> 1993: नेल्सन मंडेला, ऍफ़.डब्ल्यू. दे क्लर्क
<><><> 1992: रिगोबेर्ता मंचू तुम
<><><> 1991: औंग सान सू क्यी
<><><> 1990: मिखाइल गोर्बाचेव
<><><> 1989: 14th दलाई लामा
<><><> 1988: यूएन पीसकीपिंग फोर्सेस
<><><> 1987: ऑस्कर अरिअस सांचेज़
<><><> 1986: एली विएसेल
<><><> 1985: इंटरनेशनल फिजिसियन फॉर द प्रिवेंशन ऑफ़ न्यूक्लियर वार
<><><> 1984: डेसमंड टूटू
<><><> 1983: लेक वालेसा
<><><> 1982: अल्वा मिर्डल, अलफोंसो गार्सिया रोब्ल्स
<><><> 1981: ऑफिस ऑफ़ द यूं एन हाई कमीश्नर फॉर रिफ्यूजी
<><><> 1980: अदोल्फो पेरेज़ एस्कुइवेल

October 2, 2009

क्या गांधी को सिर्फ गोडसे ने मारा ?

आज दो अक्टूबर यानि गांधी जयंती वो दिन जिस दिन अहिंसा के पुजारी ने जन्म लेकर इस धरती को पुण्य किया था लेकिन आज २ अक्टूबर का दिन महज़ एक औपचारिकता बनकर ही रह गया है राजनेता राष्टपिता को श्रद्धा सुमन अर्पित कर गांधी विचारों को अपनाने का संकल्प लेते हैं यह सिलसिला काफी तो समय से चल रहा है कल से फिर धर्म, जात और क्षेत्रीयता के नाम पर देशवासियों को बाँट कर अपने स्वार्थ की रोटियाँ सेकना शुरू कर देगे स्कूल, कॉलेज के छात्र छात्राएं हों या फिर, कामकाजी वर्ग, या फिर व्यवसाई वर्ग, हट व्यक्ति दो अक्तूबर को गाँधी जयंती से ज्यादा छुट्टी के दिन के रूप में जानता हैं । आज की आधुनिक पीढ़ी गाँधी के विचारों से पूरे तरह अनजान है । यही वजह है कि अहिंसा के पुजारी के इस देश में हिंसा अपने चरम पर है स्वदेशी अपनाने का नारा देने वाले गांधी के देशवासी अपनी संस्कृति छोड़ विदेशी को अपनाने में जुटे हुए हैं
गांधी के विचारों से अनजान है यही वजह है कि उनमें धैर्य नही है, आज की हिंसक घटनाओं का सीधा असर देश की ऍम जनता पर पद रहा है लेकिन किसी को क्या ? गांधी जयन्ती तो हर साल आती है ! राजनैतिक पार्टियों एवं अन्य संगठनो का नजरिया बिल्कुल साफ है, मांगे मनवानी हो शहर बंद कर दो, सरकार से नाराजगी है, नेताओ के पूतले फूंक दो, सरकार से बात मनवानी है, बसे फूंक दो । विरोध प्रदर्शन करना है रेलें फूंक दो । हम ऐसे ही हैं और ऐसे ही रहेंगे हमें क्या ? "ये फूंक दो-जला दो प्रथा" गांधी के देश की संस्कृति बनती जा रही है । कौन कहता है गांधी को गोडसे ने मारा, आज हर दिन हर पल, चौक चौराहों से लेकर सदन तक गांधी के विचारों और आदर्शों की क्रमिक हत्या होती है । और वो हत्याएं करने वाले भी हम में से ही एक हैं "जैसे राम से बड़ा राम का नाम" वैसे ही "गांधी से बड़े गांधी के विचार" जिनकी हमारे देश में हर रोज़ हत्या होती है क्या हम कह सकते हैं ? कि - गांधी को सिर्फ गोडसे ने मारा

July 21, 2009

सदी का सबसे लंबा सूर्यग्रहण कल, वैज्ञानिकों में खासा उत्साह


चांद-सितारों और खगोलीय घटनाओं में दिलचस्पी रखने वालों सहित तमाम लोगों खासा उत्साह है, क्योंकि बुधवार २२ जुलाई को इस सदी का सबसे लंबे समय तक चलने वाला खग्रास सूर्यग्रहण देखा जा सकेगा। करीब 360 वर्ष बाद किसी क्षेत्र विशेष में हो रही इस अद्भुत खगोलिया घटना को देखने के लिए पूरे देश में रोमांच की स्थिति है। दिन की शुरुआत के साथ ही शुरू होने वाला यह सूर्यग्रहण पृथ्वी के अलग-अलग स्थानों पर लगभग तीन घंटे 25 मिनिट तक दिखाई देगा।
कब होता है पूर्ण सूर्यग्रहण :- खग्रास सूर्यग्रहण तब होता है, जब चंद्रमा सूर्य के सामने आ जाता है और सूर्य की चमकीली सतह चंद्रमा के कारण ढंक जाती है। खग्रास सूर्यग्रहण को पृथ्वी की सतह से एक पतली पट्टी पर पड़ने वाले स्थानों से ही देखा जा सकता है।
कहाँ कहाँ देखा जा सकेगा खग्रास सूर्यग्रहण :- जिन भारतीय शहरों से खग्रास सूर्यग्रहण देखा जा सकता है, उनमें भावनगर, सूरत, उज्जैन, इंदौर, भोपाल, जबलपुर, वाराणसी, इलाहाबाद, गया, पटना, भागलपुर, जलपाईगुड़ी, गुवाहाटी और डिब्रूगढ़ शामिल हैं। मध्यप्रदेश के भोपाल में पूर्ण सूर्यग्रहण 6.22 से 6.26 बजे के बीच लगभग साढ़े तीन मिनट तक चलेगा। आम लोग भी अपने स्तर पर सूर्यग्रहण का नजारा देख सकें इसके लिए कुछ संस्थाओं ने सोलर फिल्टर चश्मे उपलब्ध करवाने की व्यवस्था की है। मप्र विज्ञान सभा सदस्य के एस तिवारी के अनुसार आंचलिक विज्ञान केंद्र तथा जवाहर विद्यालय से कोई भी न्यूनतम कीमत में सोलर फिल्टर चश्मा प्राप्त कर सकता है। मध्यप्रदेश के जिन शहरों में पूर्ण सूर्यग्रहण दिखेगा उनमें इंदौर, उज्जैन, देवास, सीहोर, खंडवा, विदिशा, रायसेन, भोपाल, होशंगाबाद, इटारसी, सागर, दमोह, नरसिंहपुर, जबलपुर, सतना, मैहर, रीवा, सीधी, शहडोल शामिल हैं।
अध्ययन के लिए विशेष इन्तेजाम :- सदी का सबसे लंबी अवधि का सूर्यग्रहण 22 जुलाई को भोपाल समेत देश के अन्य शहरों में दिखाई देगा। इसके अध्ययन और दर्शन के लिए शासकीय और निजी संस्थाओं ने विशेष इंतजाम किए हैं। रीजनल साइंस सेंटर ने सोमवार से जागरूकता कार्यक्रम की शुरुआत की, वहीं साइंस सेंटर (ग्वालियर) मप्र मंगलवार से तीन दिनी महोत्सव शुरू कर रहा है, जिसमें इसके प्रभाव पर अध्ययन किया जाएगा।
ग्रहण बताएगा सूरज की गर्मी का राज :- इंदौर सहित दुनियाभर में वैज्ञानिकों ने सूर्यग्रहण के दौरान कई प्रयोगों की तैयारी की है। इतना लंबा खग्रास सूर्यग्रहण इसके बाद ठीक 123 वर्ष बाद 13 जुलाई 2132 को दिखेगा। इस ऐतिहासिक खगोलीय घटना के बारे में नेहरू प्लेनेटेरियम के पूर्व निदेशक जे.जे. रावल का कहना है कि प्रभात की वेला में सूर्यग्रहण होने की वजह से ग्रहण के समय शेडाबेक फिनोमिनन स्पष्ट रूप से देखा जा सकेगी और इस अवधि में वायुमंडल में कंपन्न का एहसास होगा। हल्के सफेद-काली पट्टी भी वातावरण में देखी जा सकेंगी। यह सूर्यग्रहण एक भारतीय वैज्ञानिक की 1981 में इंटरनेशनल जर्नल ‘अर्थ, मून एंड प्लेनेट’ में प्रकाशित उस थीसिस को समर्थन देगा जिसमें कहा गया था कि सूर्य के इर्दगिद वलय (घेरे) एवं छोटे-छोटे गृह होने की संभावना है। यह खगोलशास्त्री एवं नेहरू प्लेनेटेरियम, दिल्ली के पूर्व निदेशक जे जे रावल ने विश्व के सामने रखी थी। उन्होंने आगे बताया कि खग्रास सूर्यग्रहण के समय सूर्य के इर्दगिर्द जो रंगपटल (स्पैक्ट्रम ) बनता है, उससे सूर्य के वातावरण के तापमान एवं प्रेशर की जानकारी प्राप्त हो सकती है।
14 इंच के टेलिस्कोप से देखेंगे ग्रहण :- 22 जुलाई को होने वाले सदी के सबसे बड़े सूर्यग्रहण के लिए सभी ओर तैयारियां चल रही हैं। इसे देखने के लिए वैज्ञानिकों ने कई सुझाव दिए और कई जगह विशेष व्यवस्था की गई है। खगोलशास्त्र में रुचि रखने वालों के लिए ग्रहण बड़ी उत्सुकता का विषय है। शहर में ऐसे ही लोगों के लिए सूर्यग्रहण देखने का इंतजाम आईपीएस एकेडमी में किया जा रहा है। यहां १४ इंच के सेलिस्ट्रोन टेलिस्कोप से सूर्यग्रहण लाइव देखा जा सकता है। एकेडमी के आईएसएलटी विभाग के डायरेक्टर प्रो. एम.एल. शर्मा ने बताया यह टेलिस्कोप प्रदेश का सबसे शक्तिशाली टेलिस्कोप है। ज्यादा से ज्यादा लोग इससे सूर्यग्रहण देख सकें इसलिए सीसीडी कैमरे लगाकर स्क्रीन पर भी ग्रहण दिखाया जाएगा।
तारेगना में भी जुडा शोधकर्ताओं का हुजूम :- सूर्यग्रहण पट्टी में ऐतिहासिक खगोलीय घटना का गवाह बनने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त स्थान साबित होने के बाद आर्यभट्ट की धरती तारेगना इसके लिए पूरी तरह तैयार है। दुनिया भर से वैज्ञानिकों का हुजूम अपने पूरे साजो सामान के साथ बिहार के तारेगना स्थान से सूर्यग्रहण का नजारा देखेगा। मुख्यमंत्री समेत विशिष्ट लोगों के लिए अनुमंडल का रेफरल अस्पताल तो अन्य लोगों के लिए तारेगना के गांधी मैदान, सेंट मैरी स्कूल तथा सेंट माइकल स्कूल को तैयार किया गया है। तारेगना में तैयारियों और शहर में बाहरी लोगों के जमघट से स्थानीय लोगों के कौतूहल को पंख लग गए हैं। विभिन्न विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों के वैज्ञानिक और छात्र भी आज शाम तक तारेगना पहुंच जाएंगे। इस सिलसिले में अखिल भारतीय जनविज्ञान नेटवर्क एवं भारत ज्ञान विज्ञान समिति से जुड़े एवं पूर्व राष्ट्रपति डा. ए पी जे अब्दुल कलाम के सहयोगी रहे डा. एम पी परमेश्वरन, नेटवर्क के अध्यक्ष सी पी नारायणन, महासचिव डा. अमित सेनगुप्ता, राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद के वैज्ञानिक शशि आहूजा, भारत ज्ञान विज्ञान समिति के सचिव आशा मिश्र, मुख्य रूप से राजधानी पहुंच गए हैं। स्पेस के डा. विक्रांत नारंग भी 21 की शाम तक तारेगना पहुंच जाएंगे। पटना तथा अन्य जगहों से पहुंच रहे लोगों ने सूर्यग्रहण देखने को स्थानीय लोगों के मकान की छतें भी बुक करा ली हैं। बाहरी लोगों की हलचल और यहां चल रही प्रशासनिक तैयारियों ने पूरे माहौल में उत्सुकता घोल दी है। आर्यभट्ट की धरती का होने का गौरव उनके हावभाव में झलक जाता है।
नासा की रिपोर्ट से सुर्खियों में आया तारेगना :- पर्यटकों का रुख तारेगना की ओर करने में अमेरिका के नेशनल एरोनाटिक एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन [नासा] द्वारा इस सूर्य ग्रहण के संबंध में जारी करीब 200 पृष्ठों की रिपोर्ट ने अहम भूमिका निभाई है। रिपोर्ट में सूर्यग्रहण के संदर्भ में तारेगना की खूबियां गिनाई गई हैं। नासा के मुताबिक तारेगना में बदली छाने की औसत संभावना इलाहाबाद में 77 और बनारस में 71 प्रतिशत के मुकाबले 63 प्रतिशत है। साथ ही धूप की चमक [सनशाईन] का औसत मुंबई के 18 प्रतिशत, इंदौर के 25 प्रतिशत, इलाहाबाद के 34 प्रतिशत के मुकाबले तारेगना में 43 प्रतिशत है। तारेगना में ये दो फैक्टर नेपाल, बांग्लादेश, भूटान एवं चीन से बेहतर हैं जहां ये सूर्य ग्रहण दिखाई देगा। ऐसे में सूर्य ग्रहण के नजारे के लिए यह सबसे बेहतर स्थान है।
घटेगा गुरुत्वाकर्षण :- कहा जाता है कि ग्रहण के दौरान पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण कम हो जाता है। चीन में छह स्थानों पर हाई सेंसिटिव उपकरण लगाए जाएंगे, जो ग्रहण काल के दौरान पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण क्षमता रिकॉर्ड करेंगे।
सूर्यग्रहण देखने के लिए क्या करें :- गत्ते में पिन छेद करके उसे सूर्य की किरणों के सामने रखकर सूर्य की छवि किसी छाया वाली दीवार पर प्रक्षेपित करें। एक छोटे दर्पण को कागज के टुकड़े से ढ़ककर कागज में दो सेंटीमीटर व्यास का छिद्र बनाकर इससे दीवार पर सूर्य की छवि प्रक्षेपित करें। पूर्णता की स्थिति में आप सूर्य को सीधा निहार सकते हैं, मगर लगातार न देखें।
ग्रहण देखने के लिए यह न करें :- धुंआयुक्त ग्लास, रंगीन फिल्म, सनग्लास, नानसिल्वर ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म का इस्तेमाल न करें। टेलीस्कोप या बाइनाकुलर से सूर्य को कभी न देखें। पूर्ण सूर्यग्रहण की दशा को लगातार न देखें।
राशियों पर असर :- ग्रहण का धार्मिक महत्व भी है। मंदिरों में इसके लिए भी विशेष तैयारियां की गई हैं। ग्रहण काल में भगवान की मूर्ति को स्पर्श नहीं किया जाता है। ज्योतिषों के अनुसार ग्रहण का कुछ राशियों में शुभ तो कुछ राशियों में अशुभ फलदायक रहेगा कुछ राशियों में मिश्रित फल मिलेंगे
मेष: स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव, दुर्घटना की संभावना
वृष: रुके काम बनेंगे। वाणी पर संयम रखें।
मिथुन: खर्च अधिक, चिंताएं बढ़ेंगी
कर्क: कोर्ट के मामलों में सतर्क रहें, वाहन सावधानी से चलाएं।
सिंह: अधिकारियों से विवाद होगा। लेनदेन नहीं करें।
कन्या: आर्थिक लाभ होगा। शुभ कार्य होंगे।
तुला: मिलेजुले प्रभाव होंगे। पदोन्नति हो सकती है।
वृश्चिक: परिवार में मतभेद उभरेंगे। काम रुक सकते हैं।
धनु: समय कष्टप्रद रहेगा। वाहन सावधानी से चलाएं।
मकर: स्वास्थ्य प्रभावित होगा। संतान की चिंता बढ़ेगी।
कुंभ: शत्रु शांत होंगे। काम बन सकते हैं।
मीन: मिश्रित फल मिलेंगे। धैर्य बना रहा तो फायदा होगा।

June 5, 2009

विश्व पर्यावरण दिवस - ३८ सालों से इस परम्परा का बखूबी पालन कर रहे हैं |


आज हम ३८ वां विश्व पर्यावरण दिवस मना रहे हैं पिछले ३८ सालों से इस परम्परा का बखूबी पालन कर रहे हैं लेकिन इसके कितने बेहतर परिणाम मिले यह किसी से छिपा नहीं है विश्व पर्यावरण दिवस (WED) की शुरुआत यूनाइटेड नेशंस इनवायरमेंट प्रोग्राम के तहत यूं.एन एसेम्बली द्वारा 1972 में की गई थी वर्ष 1972 से प्रतिवर्ष 5 जून को पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा है। और इस साल इस आयोजन की थीम है-'आपके ग्रह को आपकी जरूरत है! जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए एक हों'। साथ ही इसका मुख्य उद्देश्य आम जनमानस में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता लाना था हालाकि इस दिशा में कुछ हद तक सफलता ज़रूर मिली लेकिन क्या इसे सराहनीय कहा जा सकता है ..... ? क्या आज जो परिणाम हमारे सामने है उन्हें आशानुरूप कहा जा सकता है ..... ? नहीं
पूरी दुनिया के मुकाबले हिमालय ज्यादा तेज़ गति से गर्म हो रहा है एक आंकड़े के मुताबिक गत 100 वर्षों में हिमालय के पश्चिमोत्तर हिस्से का तापमान 1.4 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है जो कि शेष विश्व के तापमान में हुए औसत इजाफे (0.5-1.1 डिग्री सेल्सियस) से अधिक है। रक्षा शोध एवं विकास संस्थान (डीआरडीओ) और पुणे विश्वविद्यालय के भूगर्भ विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों ने क्षेत्र में बर्फबारी और बारिश की विविधता का अध्ययन किया और पाया कि एक और बढ़ती गर्मी के कारण सर्दियों की शुरुआत अपेक्षाकृत देर से हो रही है तो दूसरी और बर्फबारी में भी कमी आ रही है। शोधकर्ताओं का कहना है कि पश्चिमोत्तर हिमालय का इलाका पिछली शताब्दी में 1.4 डिग्री सेल्सियस गर्म हुआ है जबकि दुनिया भर में तापमान बढ़ने की औसत दर 0.5 से 1.1 डिग्री सेल्सियस रही है। “अध्ययन का सबसे रोचक निष्कर्ष यह रहा कि पिछले तीन दशकों के दौरान पश्चिमोत्तर हिमालय क्षेत्र के अधिकतम और न्यूनतम तापमान में तेज इजाफा हुआ जबकि दुनिया के अन्य पर्वतीय क्षेत्रों जैसे कि आल्प्स और रॉकीज में न्यूनतम तापमान में अधिकतम तापमान की अपेक्षा अधिक तेजी से वृद्धि हुई है।” अध्यान के लिए इस क्षेत्र से संबंधित आंकड़े भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) स्नो एंड अवलांच स्टडी इस्टेब्लिशमेंट (एसएएसई) मनाली और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मीटरोलॉजी से जुटाए गए थे।
जलवायु परिवर्तन के कारण अनेक दुष्परिणाम सामने आ रहे है। यदि यह सब ऐसे ही चलता रहा, तो हमारी पृथ्वी को आग का गोला बनते देर न लगेगी। और तब क्या होगा इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती जिस तरह जलवायु परिवर्तन के कारण डायनासोर धरती से अचानक विलुप्त हो गए। ठीक उसी तरह जलवायु परिवर्तन के कारण अन्य जीव-जंतुओं पर भी ऐसा ही खतरा मंडरा रहा है। एक अनुमान के मुताबिक, 2050 तक पृथ्वी के 40 फीसदी जीव-जंतुओं का खात्मा हो जाएगा! इतना ही नहीं जलवायु परिवर्तन का खासा असर इंसानों पर भी पड़ने वाला है जिससे हम अनभिज्ञ नहीं है लेकिन हाँ सतर्क भी नहीं
आज पीढ़ी दर पीढ़ी सुविधाभोगी होती जा रही है। स्कूल जाने के लिए भी आप में से कई बाइक की जिद करते हैं। साइकिल चलाना शान के खिलाफ लगता है। वास्तव में, कुल ऊर्जा खपत का पांचवां हिस्सा हम निजी वाहनों के प्रयोग व सरकारी और बसों आदि के संचालन में ही धुआं कर देते हैं!
जिंदा रहने के लिए सांस लेना जरूरी है, लेकिन फैक्ट्रियों और वाहनों की रासायनिक धुँए से हवा में लगातार कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा बढ़ रही है जो जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारण है । एक रिसर्च के मुताबिक आने वाले सौ सालों में वायुमंडल में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा मौजूदा स्तर की तीन गुना हो जाएगी। तब हर किसी को ऑक्सीजन मास्क पहनने की ज़रुरत पड़ेगी
दूसरी और सडकों के निर्माण और उद्योगों के विस्तार के चलते अंधाधुंध पेड़ों की कटाई से वर्षा का प्रभावित होना भी जलवायु परिवर्तन का एक विशेष कारण रहा है परिणाम स्वरुप धरती के जलस्तर में भी गिरावट आ रही है पूरे देश में मौजूदा पानी किल्लत यही दर्शाती है
आज ज़रुरत है 5 जून के वास्तविक महत्व को समझने की और पर्यावरण के संरक्षण के प्रति खुद को संकल्पित करने की पर्यावरण संरक्षण दिवस साल में एक बार महज़ एक औपचारिकता के रूप में मानाने का दिन नहीं है बल्कि स्वयं को दूसरों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्रेरित करने का है किसी ने सच ही कहा है "हम बदलेंगे जग बदलेगा, हम सुधरेंगे जग सुधरेगा" यदि पूरे साल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम किया जाय ऐसे आयोजन किये जाएँ जहां आमजनमानस में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता लाइ जा सके पेड़ों की कटाई करने की अपेक्षा ज़्यादा से ज्यादा मात्रा में नए पेड़ और उद्यान लगाये जाएँ धरती के जल स्तर को संतुलित करने के लिए इमारतों, घरों और सडकों का निर्माण "वाटर हारवेस्टिंग" प्रणाली के तहत किया जाये उद्योगों का रासायनिक कचरा नष्ट करने की विधी विकसित की जाए जो सीधे तौर पर पर्यावरण को इतना नुकसान न पहुंचा सकें सामान्य तौर पर हो वाहनों के प्रयोग में कमी लाइ जाये तो जलवायु में होने वाले इस क्रमिक परिवर्तन को रोका जा सकता है ग्लोबल वार्मिंग पर विजय हासिल की जा सकती है

May 31, 2009

नशामुक्ति का का सबसे आसान उपाय



बात जब किसी की प्रियता की की जाए तो वह उसे बेहद पसंद करता है लेकिन जब बात हित की की जाये तो उसे नापसंद करता है आज तम्बाकू निषेध दिवस है यह दिन नशामुक्ति से प्रेरणा देने के लिए मनाया जाता है तम्बाकू एक धीमा ज़हर है जो इसका सेवन करने वाले को धीरे धीरे मौत के मुंह में ले जाता है एक आंकड़े के अनुसार हर साल भारत में लगभग ८ लाख नए केंसर के मामले सामने आते हैं जिनमें से तकरीबन ३.२ लाख मामले मुंह और गले के केंसर से सम्बंधित होते हैं
हर साल हम ३१ मई को तम्बाकू निषेध दिवस मनाते है लेकिन इस धीमे ज़हर से समाज को मुक्त कर पाने में हम कितने सफल रहे हैं इसका जवाब हर कोई जानता है आज हम फिर तम्बाकू निषेध दिवस मना रहे हैं आज देश का अधिकतर नौजवान यहाँ तक की देश के नौनिहाल भी इस चुटकी भर ज़हर की चपेट में आ रहे हैं खास बात तो यह है कि उपयोग में आसान और सुविधाजनक होने के कारण समय दर समय तम्बाकू का प्रचलन भी बढा है मौजूदा हालत और बदलते परिवेश और एकल परिवार व्यवस्था में माता पिटा का अपने बच्चों पर ज़्यादा ध्यान न दे पाने के कारण एक आत्मबलहीन पीढी तैयार हो गई है जो अपने हर समय अपनी प्रियता की बात ही सोचती है और अपने हित के प्रति उसका कोई ध्यान ही नहीं रहता
विश्व स्वास्थ्य संगठन के सहयोग से इस बारे में ‘इण्ड-केन-006’ नामक सर्वेक्षण विश्व तम्बाकू निषेध दिवस से पहले जारी की गई रिपोर्ट में भविष्य की भयावह तस्वीर का खुलासा किया गया है। 66 हजार लोगों पर किए गए इस सर्वे में रतलाम में पता चला कि 12 फीसदी स्कूली बच्चे तम्बाकू का नियमित सेवन करते हैं। इस बात से साफ़ अंदाजा लगाया जा सकता है कि आने वाला समय कितना भयावह होगा
ऐसे में साल में एक दिन औपचारिकता मात्र के रूप में तम्बाकू निषेध दिवस मनाना कितना उचित है वास्तव में नशा किसी भी रूप में हो बेहद घातक होता है हर व्यक्ति का किसी मादक पदार्थ को लेने के पीछे मकसद भी अलग अलग होता है लेकिन मकसद चाहे जो हो नुकसान तो उठाना ही पङता है पहले कोई व्यक्ति तम्बाकू का सेवन करता है फिर तम्बाकू उसका सेवन करने लगती हैं किसी भी तरह के नशे से मुक्ति के लिए सिर्फ एक ही उपाय है वह है संयम
वैसे तो संयम कई समस्याओं का समाधान है लेकिन जहां तक नशामुक्ति का सवाल है संयम से बेहतर और कोई दूसरा विकल्प नहीं है हाँ सेल्फ मोटिवेशन भी नशामुक्ति में बेहद कारगर है या फिर किसी को मोटिवेट करके या किसी के द्वारा मोटिवेट होके भी नशे से मुक्त हुआ जा सकता है लेकिन यदि तम्बाकू का नशा करने वाला यदि संयम अपनाए तो इस पर जीत हासिल कर सकता है जब कभी तम्बाकू का सेवन करने की तीव्र इच्छा हो तो संयम के साथ अपना ध्यान किसी अन्य काम में लगा लें ज़्यादातर तम्बाकू को भुलाने की कोशिश करें वास्तव में यदि व्यक्ति हितों के प्रति जागरुक हैं तो वह किसी भी नशे की चपेट में आ ही नहीं सकता और यदि आ भी जाए तो थोडा सा संयम और सेल्फ मोटिवेशन उसे इस धीमे ज़हर से मुक्त कर सकता है तो आज के दिन महज़ एक परम्परा के रूप में तम्बाकू निषेध दिवस मनाने के बजाय तम्बाकू और इसके घातक परिणामो से हम अपने करीबी और अपने मित्रों को परिचित करायें यदि कोई आपका करीबी तम्बाकू या किसी नशे की लत का शिकार है तो उसे मोटिवेट करके उसे संयम का रास्ता बताएं और नशे से मुक्त होने में उसकी मदद करें
कैसे छोड़ें तम्बाकू की आदत? :-
- तम्बाकू छोड़ने लिए आपको एक दिन तय कर लेना चाहिए कि इस दिन से तम्बाकू बंद।
- इसके अपने दोस्तों और पारिवारिक डॉक्टर की भी मदद लें।
- सिगरेट से जुड़ी चीजों को दूर रखें।
- अगर सिगरेट ज्यादा पीने की आदत पड़ ही चुकी है तो भी उसे पीने से पहले छोटी कर लें।
- धीमे जहर के सेवन न करने के प्रति खुद को मोटिवेट करें

May 4, 2009

राखी सावंत का स्वयंबर: मात्र १४ हज़ार, कम से कम ४-५ लाख प्रपोसल तो आते


राखी सावंत के स्वयंबर वाले रियलटी शो में मात्र १४ युवकों ने ही अपनी दिलचस्पी दिखाई है कहने का तात्पर्य यह है कि जब कभी राखी सावंत किसी स्टेज शो में अपने जलवे बिखेरती हैं तो कम से कम इससे चार और पांच गुना भीड़ उमड़ती है इतना बड़ा भारत देश इतने सारे युवा लेकिन राखी को पत्नी बनाने में मात्र १४ हज़ार लोगों ने ही रुची दिखाई न जाने उनमे से ऐसे कितने होंगे जो मात्र पब्लिसिटी के लिए इस स्वयंबर में हिस्सा ले रहे हैं और यदि उनमें से राखी ने किसी से ब्याह रचा भी लिया तो दाम्पत्य जीवन कितने दिन चलेगा ये तो उपरवाला ही जानता है बहरहाल राखी के स्टेज शो जब इतनी तादाद में लोग दिलचस्पी दिखाते हैं तो फिर शादी करके जीवनसंगिनी बनाने में क्या आपत्ती हो सकती है ?
बात दरअसल यह है हर युवा हॉट और बोल्ड प्रेमिका की ख्वाहिश रखता है लेकिन जब बात पत्नी की आती है तो संस्कारिक, पारिवारिक मूल्यों को समझने वाली और कामकाजी लड़की चाहिए क्योंकि शादी के बाद यदि पत्नी को समाज या फिर परिवार वालों के लिए खुद को बदलना पड़े या फिर पत्नी अपनी मन पसंद के कपडे पहने या फिर अपनी इच्छाओं के के लिए खर्च करने में कोई संकोच न करे तो फिर मियाँ बीबी की तू तू मैं मैं तो होनी है और बात बढ़ने में और तलाक़ होने में भी समय नहीं लगता अर्थात राखी सावंत के बोल्ड सीन और उनका डांस लगभग सभी युवा पसंद करते हैं पर राखी सावंत से ब्याह रचा कर घर बसाना हर कोई नहीं चाहता मात्र १४ हज़ार लोगों की संख्या इसी भावना को प्रर्दशित करती है राखी सावंत एक अभिनेत्री होने के नाते परदे पर आइटम नंबर से लेकर किसी की पत्नी या बहू का किरदार बखूबी निभा सकती हैं लेकिन क्या वास्तविक जीवन में एक कुशल पत्नी या बहू बन सकती हैं ? इस रियलटी शो ने ये सवाल ज़रूर खडा कर दिया है ?
बहरहाल राखी सावंत की खूबसूरती और उनकी बाकी सारी खूबियों को देखते हुए १४ हज़ार का आंकडा बेहद ही अपमान जनक है पूरे भारत से कम से कम ४-५ लाख लोग तो अपना प्रपोसल भेजते

April 23, 2009

मध्यप्रदेश की १३ लोकसभा सीटों पर औसतन मात्र ४७.३% मतदान

१५ वीं लोकसभा के लियी आज दूसरे चरण में मध्यप्रदेश की २९ में से १३ लोकसभा क्षेत्रों में मतदान शाम ५ बजे संम्पन्न हुआ छुट पुट घटनाओं तथा कुछ जगहों पर चुनाव के बहिष्कार की घटनाओं को छोड़ मतदान आमतौर पर शांतिपूर्ण तरीके से संम्पन्न हुआ मुख्य चुनाव आयुक्त जे एस माथुर ने बताया कि मध्यप्रदेश की १३ लोकसभा सीटों पर औसतन ४७.३% मतदान हुआ है सबसे ज़्यादा मतदान छिंदवाडा लोकसभा क्षेत्र से था जहां मतदान का प्रतिशत ६३.३ रहा वहीं सबसे कम खजुराहो लोकसभा क्षेत्र में मतदान का प्रतिशत ४०.२ रहा कुल ४७.३% औसतन मतदान में पुरुषों का प्रतिशत ५२.२ तथा माहिलाओं का प्रतिशत ४१.८ रहा जिन १३ संसदीय क्षेत्रों में मतदान होगा उनमें खजुराहो, सतना, रीवा, सीधी, शहडोल, जबलपुर, मंडला, बालाघाट छिंदवाडा, होशंगाबाद, विदिशा, भोपाल, बैतूल शामिल हैं चुनाव आयोग ने कुल चार मतदान केन्द्रों त्योंथर, सिमरिया, नरता(उदयपुरा), रमखिरिया(उदयपुरा) में पुनः मतदान होने की संभावना जतायी है कटनी में पीठासीन अधिकारी ड्यूटी के दौरान शराब के नशे में पाए जाने पर उसे तत्काल प्रभाव से हटा दिया गया


कहाँ कितना मतदान
बालाघाट - ५०.८%, बेतूल - ४४%, भोपाल - ४२.६%, छिंदवाडा - ६३.३%, होशंगाबाद - ४७.४%, जबलपुर - ४५.२%, खजुराहो - ४०.२%, मंडला - ४८.१%, रीवा - ४९.८%, सतना - ५०.७%, शहडोल - ४६.३%, सीधी - ४५.६%, विदिशा - ४३.२%


बहरहाल इन चुनावों में पूरे प्रदेश से चुनाव बहिष्कार की भी खबरें आती रहीं हैं चुनाव बहिष्कार की घटनाओं और मतदान के इस गिरते स्तर के बारे आप क्या कहना चाहेंगे ?

April 22, 2009

एक रिसर्च - दुनिया भर की मुख्य नदियों के जल स्तर में भारी गिरावट दर्ज

दुनिया भर की मुख्य नदियों के जल स्तर में गिरावट दर्ज की गई है एक अध्ययन में निकले निष्कर्षों के मुताबिक़ जलवायु परिवर्तन की वजह से नदियों का जल स्तर जल स्तर घाट रहा है और आगे इसके भयावह परिणाम सामने आएंगे अमेरिकन मीटियरॉलॉजिकल सोसाइटी की जलवायु से जुड़ी पत्रिका ने वर्ष 2004 तक, पिछले पचास वर्षों में दुनिया की 900 नदियों के जल स्तर का विश्लेषण किया है जिसमें यह तथ्य निकलकर आया है कि दुनिया की कुछ मुख्य नदियों का जल स्तर पिछले पचास वर्षों में गिर गया है यह अध्ययन अमेरिका में किया गया है अध्ययन के अनुसार इसकी प्रमुख वजह जलवायु परिवर्तन है पूरी दुनिया में सिर्फ़ आर्कटिक क्षेत्र में ही ऐसा बचा है जहाँ जल स्तर बढ़ा है और उसकी वजह है तेज़ी से बर्फ़ का पिघलना भारत में ब्रह्मपुत्र और चीन में यांगज़े नदियों का जल स्तर अभी भी काफ़ी ऊँचा है मगर चिंता ये है कि वहाँ भी ऊँचा जल स्तर हिमालय के पिघलते ग्लेशियरों की वजह से है. भारत की गंगा नदी भी गिरते जल स्तर से अछूती नहीं है उत्तरी चीन की ह्वांग हे नदी या पीली नदी और अमरीका की कोलोरेडो नदी दुनिया की अधिकतर जनसंख्या को पानी पहुँचाने वाली इन नदियों का जल स्तर तेज़ी से गिर रहा है अध्ययन में यह भी पता चला है कि दुनिया के समुद्रों में जो जल नदियों के माध्यम से पहुँच रहा है उसकी मात्रा भी लगातार कम हो रही है इसका मुख्य कारण नदियों पर बाँध बनाना तथा खेती के लिए नदियों का मुँह मोड़ना बताया जा रहा है लेकिन ज़्यादातर विशेषज्ञ और शोधकर्ता गिरते जल स्तर के लिए जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं उनका मानना है कि बढ़ते तापमान की वजह से वर्षा के क्रम में बदलाव आ रहा है और जल के भाप बनने की प्रक्रिया तेज़ हो रही है. मध्यप्रदेश की जीवनदायिनी नर्मदा का भी जल स्तर काफी तेज़ी से गिर रहा है जिसका मुख्य कारण नर्मदा के दोनों तटों पर घटते वन्य क्षेत्र और जलवायु परिवर्तन माना जा रहा है विशेषज्ञों ने प्राकृतिक जल स्रोतों की ऐसी क़मी पर चिंता ज़ाहिर करते हुए कहा है कि दुनिया भर में लोगों को इसकी वजह से काफ़ी परेशानियों का सामना करना पड़ेगा. उनका कहना है कि जैसे जैसे भविष्य में ग्लेशियर या हिम पिघलकर ग़ायब होंगे इन नदियों का जल स्तर भी नीचे हो जाएगा.

April 18, 2009

फिर चले जूते - असम में कांग्रेसी सांसद पर चले जूते

फिर चले जूते लेकिन इस बार मामला कुछ और है इस बार न तो किसी पत्रकार ने किसी नेता पर जूता चलाया और न ही किसी पार्टी की किसी कार्यकर्ता ने अपनी नेता पर घटना असम की है जहाँ मतदाताओं ने सांसद पर जूते चलाये हैं असम के कौनबारी ग्राम में
नाराज मतदाताओं ने शुक्रवार को धुब्री लोकसभा सीट से कांग्रेस के मौजूदा सांसद पर जूते फेंके और पथराव कर दिया। सांसद अनवर हुसैन जब ग्राम के निकट गौरीपुर में एक चुनावी सभा को संबोधित कर रहे थे तो मतदाताओं ने उन्हें निशाना बनाया। मतदाता वहां एक
पुल का निर्माण करने का वादा नहीं निभाने को लेकर हुसैन से नाराज थे इसलिए उन्होंने सांसद पर जूते फेंके और पथराव किया। साथ ही वहां की जनता में इस बात से भी रोष व्याप्त था संसद सदस्य के तौर पर अपने पांच साल के कार्यकाल के दौरान वह एक बार भी
उनके क्षेत्र में नहीं आए थे।

April 17, 2009

इलेक्ट्रौनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की विश्वसनीयता संदेह के घेरे में


यूं तो चुनाव आते ही इलेक्ट्रौनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की विश्वसनीयता उसकी सत्यता और पारदर्शिता पर कई सवाल उठाये जाते रहे हैं इसी तारतम्य में एक बार फिर इलेक्ट्रौनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की विश्वसनीयता संदेह के घेरे में आ गई है लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है जब इलेक्ट्रौनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की विश्वसनीयता को लेकर मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय जबलपुर में एक जनहित याचिका दायर की गई है जिसे माननीय न्यायालय ने विचारार्थ स्वीकार कर लिया गया है
याचिका कर्ता शेलेन्द्र प्रधान और अनिल चावला ने द्वारा प्रस्तुत याचिका में कहा गया है कि इलेक्ट्रौनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की कभी भी किसी निष्पक्ष एजेंसी द्वारा जाँच नहीं की गई है हालाकि इससे पूर्व वर्ष १९९० में इलेक्ट्रौनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की जांच के सम्बन्ध में विचार किया गया था याचिका कर्ता का कहना है कि विगत १९ वर्षों में एक बार भी इन इलेक्ट्रौनिक वोटिंग मशीन की जांच नहीं कराइ गई साथ ही याचिका कर्ताओं ने यह भी तर्क दिया है कि दो दशक पूर्व विकसित तकनीक को आज सुरक्षित और विश्वसनीय मानने का कोई तर्कसंगत या वैज्ञानिक आधार नहीं बनता साथ ही पिछले कुछ वर्षों में विकसित हुई हैकिंग तकनीकी भी सुरक्षित इलेक्ट्रौनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के लिए खतरा है
याचिका के साथ भोपाल के एक मतदान केंद्र के ग्यारह मतदाताओं के शपथ पत्र संलग्न किये गए हैं इन शपथ पत्रों में मतदाताओं ने कहा है कि २००८ के विधानसभा चुनाव में उन्होंने शैलेन्द्र प्रधान के पक्ष में मतदान किया था लेकिन शैलेन्द्र प्रधान को तीन ही वोट मिले यह ईवीएम की सत्यता पर एक सवालिया निशान है
वैज्ञानिकों की राय :- याचिकाकर्ताओं ने याचिका के साथ अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वैज्ञानिकों टाडा युग्यिकोंदो, एडम्स स्टपल फील्ड, एवियल दी रुबिन, डेन एस वेलेच का वह शोध पत्र दाखिल किया है जिसमें यह दावा किया गया है कोई भी पूर्ण सुरक्षित ईवीएम मशीन नहीं बनाई जा सकती साथ ही विकसित देश और वैज्ञानिकों के कथन के अनुसार कोई भी मशीन पूरी तरह से त्रुटि रहित नहीं बनाई जा सकती वैज्ञानिकों का कहना है कि त्रुटी की संभावना चले एक लाख में एक हो या फिर १० लाख में एक लेकिन वह कभी शून्य नहीं हो सकती
कैसे होता है अन्य देशों में मतदान :- याचिका में कहा गया है कि विकसित देशों में विकसित देशों में वोटिंग मशीन में वोट डालने के बाद मतदाता के लिए यह सुनिश्चित कर लेने की व्यवस्था होती है कि कि उसका मत उसी प्रत्याशी को गया है जिसका उसने बटन दबाया है इसके लिए प्रत्येक मतदाता को वोटिंग मशीन से एक प्रिंट आउट मिलता है जिसमें उसके द्वारा चनित प्रत्याशी का नाम मुद्रित होता है मतदाता उसी प्रिंट आउट को एक अन्य मतपेटी में डाल देता है ऐसे में किसी भी असमंजस या विवाद की स्थिति में मतपेटी के आधार पर पुनः गणना की जा सकती है याचिका कर्ता के अनुसार भारत में मतदाता के पास यह जानने का कोई तरीका नहीं कि उसका मत उसी प्रत्याशी को गया है जिसका उसने बटन दबाया है
क्या है ईवीएम ? :- इलेक्ट्रौनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) जैसा की नाम से ही पता चलता है कि ऐसी मशीन जिसका प्रयोग मतदान के लिए होता है समय, पैसा और कर्मचारियों की बचत के उद्देश्य से देश में इलेक्ट्रौनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के ज़रिये मतदान प्रारंभ हुआ इलेक्ट्रौनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) मुख्यतः दो भाग में होती है पहला बैलेट यूनिट जहां मतदाता से समक्ष प्रत्याशियों के नाम उनका चुनाव चिन्ह और ठीक उसके बगल में एक बटन होता है जिसे दबाकर वह अपना पसंदीदा प्रत्याशी चुनता है दूसरा भाग कंट्रोल यूनिट होता है जिसका कंट्रोल पीठासीन अधिकारी के पास होता है इलेक्ट्रौनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) स्वतंत्र और बैटरी से संचालित होती है मशीन के कंट्रोल यूनिट पर एक रिजल्ट बटन होता जो की पूरी तरह से सील होता है मतदान संपन्न होने के बाद मतगणना स्थल पर इस रिजल्ट बटन को दबाकर परिणाम प्राप्त कर लिया जाता है आवश्यकता पड़ने पर परिणाम का प्रिंट आउट भी लिया जा सकता है
बहरहाल दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में इलेक्ट्रौनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की विश्वसनीयता उसकी सत्यता और पारदर्शिता के लिए कोई विशेष व्यवस्था भी आवश्यक है बार बार इलेक्ट्रौनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की विश्वसनीयता उसकी सत्यता और पारदर्शिता यदि सवालों के घेरे में आती है तो यह मतदाता पर भी नकारात्मक प्रभाव छोड़ती है इसी को दृष्टिगत रखते हुए मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग और मध्यप्रदेश मुख्य चुनाव अधिकारी तथा ईवीएम के निर्माताओं को इस सम्बन्ध में जवाब देने हेतु छेः सप्ताह का समय दिया है

April 16, 2009

बीजेपी के सिपाही ने आडवाणी पर फेंकी चप्पल

फिर चली चप्पल, मप्र के कटनी जिले में एक चुनावी सभा को संबोधित करने पहुंचे भाजपा के वरिष्ठ नेता और पीएम इन वेटिंग लालकृष्ण आडवाणी पर पार्टी के ही एक नाराज कार्यकर्ता ने चप्पल फेंक दी। कटनी में लाल कृष्ण आडवाणी की सभा के दौरान बीजेपी के कार्यकर्ता व कटनी जिले के पूर्व जिला अध्यक्ष पावस अग्रवाल ने पहले तो धक्का मुक्की की उसके बाद अपने साथ लाये लकडी के चप्पल आडवाणी पर फेंक दी हांलाकि यह चप्पल आडवाणी को नहीं लगी व् आडवानी इसके बाद सहज दिखे तथा इस घटना पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की चप्पल फेंकने वाले व्यक्ति को पुलिस ने हिरासत में ले लिया है
गौरतलब है की इससे पूर्व भी हाल ही में जूता फेंकने की घटना गृह मंत्री पी. चिदंबरम के साथ हो चुकी है कांग्रेस ने इस घटना की निंदा की है
मप्र विधानसभा स्पीकर ईश्वर दास रोहाणी के साथ आडवाणी यहां एक चुनावी सभा को संबोधित करने पहुचें थे। इस घटना के बाद पूरे इलाके में अफरातफरी मच गई। पावस अग्रवाल ने कहा कि आडवाणी की कथनी और करनी में अंतर वे पार्टी के नीतियों और पार्टी के कार्यकलापों से कुछ दिनों से नाराज़ थे

April 10, 2009

अपराधियों की राजनीति में बढ़ती भागीदारी



राजनीति में अपराधियों की भागीदारी देश के लिए बेहद चिंता का विषय है १४ वीं लोकसभा में ९६ ऐसे सांसद हैं जिन पर अपराधिक मामले दर्ज हैं राजनेता हमेशा यह कहकर बच निकलते हैं कि उन पर लगाए आरोप किसी राजनीतिक साजिश का हिस्सा है लेकिन इन मामलों में गैर इरादतन ह्त्या, और आत्महत्या के लिए उकसाने वाले ८४ मामले हैं इसके अलावा लूटपाट के १७, अपहरण के ११, जबरन वसूली के २८, बलात्कार १ मामले शामिल हैं जो किसी भी राजनीतिक साजिश का हिस्सा नहीं लगते राजनीतिक दलों में मार्च २००३ के कोर्ट के फैसले को लेकर बेहद परेशानी है जिसमें प्रत्याशियों को उनके नामांकन पत्र में आपराधिक मामलों, जमा पूंजी, देनदारियों और शैक्षणिक योग्यताओं का ब्योरा देना ज़रूरी कर दिया गया था लेकिन इसके बाद भी राजनीतिक दलों के वायदे और उनके घोषणा पत्र से राजनीति के अपराधीकरण और राजनीति में बाहुबलियों की भागीदारी में रोक लगाने जैसे अहम् मुद्दे गायब हैं ख़ास बात तो यह भी हयाई कि कोई भी राजनीतिक पार्टी दागियों और अपराधियों से अछूती नहीं है
इस बीच दो अहम् फैसले जो सामने आये उससे आम जनता ने थोड़ी राहत महसूस की जब पटना हाई कोर्ट ने पप्पू यादव और सुप्रीम कोर्ट ने संजय दत्त के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी
हालाकि आज के समय में जनता से देश के दागी नेताओं की असलियत छिपी नहीं है १४ लोकसभा में चाहे कितने ही दागी सांसद क्यों न हों लेकिन १५ लोकसभा में होने वाले चुनावों में यदि को बाहुबली या आपराधिक प्रवृत्ती का कोई उम्मीदवार खडा होता है तो जनता को अपने मताधिकार का सही प्रयोग करते हुए इन बाहुबलियों और अपराधियों को वोट नहीं देना चाहिए
१४ लोकसभा में दागी सांसदों की स्थिति



राज्यवार दागी सांसद


April 8, 2009

अभिव्यक्ति का नया माध्यम - जूता

मंगलवार को कांग्रेस मुख्यालय नई दिल्ली में गृहमंत्री पी. चिदंबरम की प्रेस कांफ्रेंस में वो बाकया सामने आया जिसने कुछ माह पूर्व इराक़ में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश की प्रेस कांफ्रेंस की याद दिला दी कांग्रेस मुख्यालय में दैनिक जागरण के पत्रकार जरनैल सिंग ने गृह मंत्री पर जूता दे मारा दैनिक जागरण को भी इससे बहुत हैरानी हुई और उसने इस घटना की निंदा भी की साथ ही घटना को नैतिक पत्रकारिता के खिलाफ बताते हुए संस्थान अनुशासनात्मक कार्यवाही करने की बात भी कही लेकिन क्या किसी कार्यवाही का औचित्य बनता है जब पी. चिदंबरम ने स्वयं कह दिया कि जरनैल सिंह ने भावनाओं में बहाकर सब कुछ किया स्वयं जरनैल भी यही बात स्वीकारते हुए कहते हैं कि "मेरा तरीका ज़रूर गलत था पर में भावावेश में था" सिक्खों को न्याय नहीं मिला दरअसल जरनैल सिंह ८४ दंगो के मामले में जगदीश टाइटलर को सीबीआई द्वारा क्लीन चित दिए जाने पर खफा थे हालांकि कांग्रेस ने सार्वजनिक रूप से उन्हें माफ़ करने की घोषणा कर दी लेकिन बात यहाँ अभिव्यक्ति की आती है भले वह विरोध स्वरुप ही क्यों न हो इराकी पत्रकार जैदी ने जब अपना जूता बुश पर फैंका तो उसका इरादा बिष के मुंह पर मारना था एक बार निशाना चुका तो फिर दूसरा जूता फैंका और यह सब करके वह अपना विरोध जता रहा था
इराकी पत्रकार की प्रतिक्रया बर्बादी पर भडास थी जबकी जरनैल का जूता प्रकरण अपने समाज को न्याय न मिलाने का विरोध हालांकि इस घटना के बाद टाइटलर और सज्जन का टिकट कतना तो पक्का हुआ कांग्रेस ने पहले ही इसके संकेत दे दिए क्यूंकि एन चुनाव के वक्त वह इस मामले को बेवजह टूल नहीं देना चाहते
बहरहाल पत्रकारिता के नज़रिए से देखा जाए तो यह घटना पत्रकारिता को कलंकित करती है पहले ही विवादों में घिरे मीडिया पर एक नया दाग है जरनैल वहां एक प्रतिष्ठित अखबार के प्रतिष्ठित पत्रकार की हैसियत से गए थे वहां जहां कोई आम इंसान नहीं पहुँच सकता था और एक पत्रकार होने के नाते उन्हें किसी जाती या धर्म विशेष तक अपनी विचारधारा को सीमित नहीं करना चाहिए यह घटना कहीं न कहीं पत्रकारिता के गिरते स्तर का भी प्रतीक है
बहरहाल उस घटना के बाद राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ गईं हैं जैदी के जूते की कीमत लाखों डॉलर लगाईं गई थी तो शिरोमणि अकाली दल ने भी जरनैल के जुटी की कीमत २ लाख लगा दी यह भी संभव है कि अकाली दल उन्हें चुनाव लड़ने की पेशकश करे
लेकिन पत्रकारिता के नज़रिए से न देखा जाए तो जैदी और जरनैल के ये जूता प्रकरण अभिव्यक्ति का माध्यम ज़रूर बन गए हैं

April 7, 2009

कुकुरमुत्तों की तरह पैदा हो गए राजनीतिक दल

<><><>(कमल सोनी)<><><> एकता ही शक्ति है का नारा देने वाले हमारे देश के नेता किस तरह से आम जनता को बाँट रहे हैं इसका सीधा अनुमान देश में निरंतर बढ़ती राजनीतिक दलों की संख्या से लगाया जा सकता है अपने व्यक्तिगत स्वार्थ और अपना प्रभुत्व कायम रखने के लिए इन नेताओं ने पूरे देश को धर्म, जाती, आरक्षण, क्षेत्रीयता और प्राशासनिक आधारों पर बाँट रखा है और वास्तव में जनता को देश, समाज, धर्म और अपने अधिकारों के प्रति गंभीर चिंतन - मनन का मौका ही न मिले जनता सही-गलत, उचित-अनुचित, में स्वयं फैसला न कर सके जनता के सामने असमंजस और भ्रम की स्थिति बनी रहे और इन नेताओं की स्वार्थ की रोटियाँ सिकती रहें यही मुख्या वजह है की हमारे देश में कुकुरमुत्तों की तरह राजनितिक पार्टियां पैदा हो गई हैं और निरंतर इनकी संख्या में इजाफा भी हो रहा है सुशासन की बात करने वाले इन राजनितिक दलों में अनुशासन का घोर आभाव नज़र आता है
दुनिया के अधिकांशतः लोकतांत्रिक राष्ट्रों में चाहे वहां राष्ट्रपति पद्धति का ही लोकतंत्र क्यों न हो उन देशों में दो से चार राजनीतिक दल नज़र आते हैं अगर कहीं इनकी संख्या ज़्यादा भी हो तो वहां धर्म, जाती, सम्प्रदाय और क्षेत्रीयता जैसी कोई बात नहीं होती और वे सभी राष्ट्रीय दल होते हैं उदहारण के लिए फ्रांस में लगभग दर्ज़न भर राजनितिक दल हैं लेकिन वहां राष्ट्रपति पद्धति का लोकतंत्र होने के कारण वह ज़्यादा साफ़ पाक नज़र आता है भारत की तरह ही जापान में भी गठबंधन की राजनीति चलती है परन्तु वहां सभी राष्ट्रीय पार्टियां हैं अमेरिका में भी दो दलीय व्यवस्था है ब्रिटेन में तें दल हैं लेकिन मुख्या संघर्ष दो दलों के बीच ही होता हैं यही वजह है कि इन देशों का लोकतंत्र भारतीय लोकतंत्र के मुकाबले ज़्यादा मजबूत और साफ़ सुथरा है हमारे महान भारतीय लोकतंत्र की तरह इन देशों में सरकार बनाने की कावायद के चलते सांसदों की खरीद फरोख्त नहीं होती और न ही किसी गठबंधन का घटक दल किसी मुद्दे विशेष पर समर्थन वापस लेकर मध्यावधि चुनाव जैसे हालात पैदा करता और न ही इन देशों की राजनीति और सत्ता अवैध कमाई का साधन हैं
लेकिन ठीक इसके विपरीत हमारे देश में राजनीति का व्यापारीकरण हो गया यहाँ नेता अपने, अपने परिवार और अपने परिचितों का उद्धार करने के लिए आते हैं दूसरा अंग्रेज़ चले गए और अपनी नीति छोड़ गए "फूट डालो और राज करो" यह नीति हमारे देश के नेताओं का सबसे बड़ा हथियार है कोई इसका प्रत्यक्ष तो कोई आप्रत्यक्ष रूप से इस्तेमाल करता है ऐसा नहीं है कि संवैधानिक व्यवस्था में कोई सार्थक बदलाव लाकर इस समस्या का कोई हल नहीं निकाला जा सकता सब संभव है लेकिन ऐसा होने पर इन नेताओं की अवैध कमाई, दबंगता और बाहुबल पर अंकुश लग जायेगा जो स्वयं ये राजनेता नहीं चाहते क्यूंकि कानून बनाने वाले भी तो यही हैं
मौजूदा हालत तो ये हैं कि जिसका जहां वर्चस्व होता है वो वहीं अपनी राजनीति का शो रूम खोलकर बैठ जाता है किसी राष्ट्रीय राजनीतिक दल ने अपने किसी नेता की बात नहीं मानी तो नेताजी अपने समर्थकों समेत पार्टी से अलग होकर नई पार्टी बना लेते हैं और फिर वही राष्ट्रीय दल अपनी ही पार्टी से अलग हुए नेता के दरवाजे पर सरकार बनाने के लिए हाथ जोड़े समर्थन मांगता फिरता है और क्षेत्रीय दल समर्थन देने की नाम पर किसी मंत्रालय की डिमांड कर देते हैं अब यहाँ योग्यता का कोई प्रश्न ही नहीं उठता सरकार बनाने के लिए राष्ट्रीय दल मजबूर होता है क्षेत्रीय दलों की बात मानने के लिए उदाहरण के लिए बीजेपी से अलग हुई उमा भारती ने भारतीय जनशक्ति पार्टी बना ली शरद पवार ने कांग्रेस से अलग होकर राष्ट्रवादी कांग्रेस का गठन कर लिया तो करुणाकरण ने कांग्रेस से अलग होकर केरल कांग्रेस बना ली ये तो महज़ उँगलियों पर गिन लेने वाले चाँद उदाहरण ही हैं देश में ऐसी कोई पार्टी नहीं बची जो इस राजनीतिक उथल-पुथल से अछूती हो चुनाव नज़दीक आते ही ये उथल-पुथल और बढ़ जाती है दूसरी और दुगनी रफ्तार से कषेत्रीय दलों की संख्या और सक्रियता बढ़ रही है जिन पार्टियों का प्रभाव तीन-चार जिलों तक सीमित रहता है वह पार्टी खुद को राष्ट्रीय पार्टी घोषित कर देती है जिस पार्टी की पास छेह से सात सांसद भी हो गए उस पार्टी का प्रमुख खुद को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर देता है
सबसे दुखद पहलू तो ये है कि टेलीविजन, फिल्मी सितारों और राजनीति से संन्यास ले चुके खिलाड़ियों की राजनीति में भूमिका बढ़ रही है दबंगों. बाहुबलियों और अपराधियों की भी अच्छी खासी भीड़ है इस बीच हाल ही में दिए गए दो महत्वपूर्ण फैसलों में जनता ने तब थोड़ी राहत महसूस की जब सुप्रीम कोर्ट ने संजय दत्त और पटना हाई कोर्ट ने पप्पू यादव के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी
आज देश के राजनितिक गलियारों में जो उठा-पटक मची है और उससे जो राजनीतिक परिद्रश्य उभरकर आता है यह अपने आप में बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण लगता है और भविष्य में भारतीय लोकतंत्र के लिए अच्छे संकेत कतई नहीं देता चुनाव आयोग में भी मान्यता संबन्धी नियम कड़े नहीं होने के कारण पार्टियों को क्षेत्रीय स्टार पर मान्यता तो मिल ही जाती है
बहरहाल देश की राजनीतिक पार्टियों की संख्या की बात करें तो वर्ष २००४ के आम चुनावों में देश में ६ राष्ट्रीय दल और ३६ क्षेत्रीय दल थे वहीं गैर मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों की संख्या १७३ थी लेकिन इस बार के चुनावों में राष्ट्रीय पार्टियों की संख्या ७ और क्षत्रिय दलों की संख्या ४४ है गैर मान्यता प्राप्त दलों की संख्या में भी इजाफा हुआ है इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि आज देश की जनता के सामने किस तरह से भ्रम और असमंजस की स्थिति बनी हुई है

March 30, 2009

अडवाणी के प्रचार के लिए बीजेपी ने खरीदे kEY WORDS ...............

इस बार के लोकसभा चुनाव में सभी राजनितिक दलों का रुझान हाई टेक चुनाव प्रचार की और बढ़ता दिखा रहा है और इन राजनितिक दलों में सबसे आगे है बीजेपी बीजेपी ने अपने नेता लालकृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किया है साथ ही भाजपा अडवाणी फॉर पी. एम् के लिए जमकर प्रचार कर रही है इसके लिए उन्होंने गूगल के साथ करार किया है जिसके तहत जिस वेबसाईट पर गूगल एडसेंस के विज्ञापन हैं वहां फ्रंट "अडवाणी फॉर पी. एम्" का एक विज्ञापन आपको नज़र तो आयेगा ही साथ ही गूगल से एक करार किया है जिसके तहत उसने गूगल सर्च इंजन पर पीएम मनमोहन सिंह के साथ सोनिया गांधी और राहुल गांधी आदि को सर्च करने पर गूगल के लैंडिंग पेज के दाईं ओर आडवाणी की तस्वीर के साथ उसे लिखा मिलेगा, 'क्या आपका भी यही सपना है। 21वीं सदी भारत की सदी हो। आडवाणी फार पीएम।' या फिर इसके अलावा "LK Advani's Forum" या फिर "Bloggers For LK Advani" लिंक मिल जायेंगी इन विज्ञापनो के माध्यम से आडवाणी को निर्णायक सरकार चलाने लायक चेहरे के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है खबरों के अनुसार गूगल सूत्रों से कुछ समाचार पत्रों और समाचार चेनलों ने जानकारी जुताई है कि इस करार के तहत भाजपा ने अपनी प्रमुख प्रतिद्वंद्वी पार्टी कांग्रेस की सोनिया, राहुल, मनमोहन, कांग्रेस, सपा और बसपा सहित करीब 850 की-वर्ड्स खरीदे हैं। इन 850 की-वर्ड्स को सर्च करते ही परिणामों पर आडवाणी के विज्ञापन भी चिपके चले आएंगे।बहरहाल इन की वर्ड्स खरीदने के पीछे चुनाव प्रचार के अलावा और क्या मंशा हो सकती है यह तो पार्टी ही जाने लेकिन इतना तो सच है कि इस चुनाव में प्रचार माइक से लेकर माउस तक जा पहुंचा है

March 26, 2009

लोकसभा चुनाव - फिर चलेगा ट्रिपल डब्ल्यू का जादू |

ये ट्रिपल डबल्यू क्या है ? ये ट्रिपल डबल्यू ? आप नहीं जानते हम बताते हैं...........
लोकसभा चुनाव का बिगुल बज गया है। सभी दल अपने अपने सियासी वीरों और धुरंदरों को चुनावी आखाडे में उतार रहे हैं सियासी वीरों ने अपने समर्थकों के बीच जाना और उनकी भीड़ जुटाना शुरू कर दिया है पार्टियों के अंदरूनी राजनीती और कलह भी खुलकर सामने आ रही है आरोप प्रत्यारोपों का दौर जमकर चल रहा है निर्वाचन आयोग के नदिशों को ताक पर रखकर खबरों में बनाने और विवाद या कोई बखेडा खडा करने के लिए पार्टियों के उम्मीदवार जुटे हुए हैं लेकिन इस बीच ट्रिपल ''डब्ल्यू के फार्मूले का रंग भी चढाने लगा है कई राजनीतिक धुरंधरों ने अपने "खास लोगों को ट्रिपल ''डब्ल्यू के फार्मूले पर चलने को इशारा कर दिया है, ताकि मतदान तक चुनावी माहौल उनके पक्ष में बन सके।
तू डाल-डाल, मैं पात-पात। यह कहावत सियासी वीरों पर बिल्कुल फिट बैठती है। इधर चुनाव आयोग राजनीतिज्ञों को अनुशासित करने और निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है, बंदिशें लगा रहा है, लेकिन उधर चुनावी कुरुक्षेत्र में कूदे सूरमा भी कुर्सी के लिए सारे हथकंडे अपना रहे हैं। वो कहते हैं न कुर्सी के लिए कुछ भी करेगा बस संसद जैसे तैसे की राह बन जाए राजनितिक गलियारों में भी इस बात की खूब चर्चा है कि आने वाले दिनों में ट्रिपल डब्लू का जादू जमकर चलेगा आखिर ये ट्रिपल डब्ल्यू है क्या ?..........ट्रिपल डब्ल्यू...... यानि वाइन, वुमेन और वेल्थ जिसका जादू राजनेताओं और उनके खासमखास समर्थकों के सिर चढ़कर बोलेगा। आखिर एक एक वोट कीमती जो होता है और वोट की कीमत मतदाता से ज्यादा हमारे देश के राजनेता समझते हैं
चुनावी अखाडे में मल्लयुद्ध करने उतरे ये धुरंधर आने वाले दिनों में वह सारे हथकंडे आजमाएंगे, जो उनकी संसद की राह आसान करे । जीत के लिए वह ट्रिपल ''डब्ल्यू का भरपूर इस्तेमाल करेंगे। यानी मतदाताओं को लुभाने के लिए वाइन परोसी जाएगी। चुनावी सभाओं में भीड़ जुटाने के लिए वुमेन यानी फिल्मी अभिनेत्रियों का सहारा लिया जाएगा। अब बारी आती है वेल्थ की। तो चुनाव प्रचार के दौरान मतदाताओं को पैसे देकर वोट मँगाने की घटनाएँ तो हामारे देश में ऍम बात है और फिर वुमेन और वाइन भी तभी संभव है, जब वेल्थ यानी दौलत होगी। चुनावी सभाओं के लिए पॉलिटीशियन जब पैसा लुटाएगा तो वह चाहेगा कि पब्लिक भी हो। मतलब साफ है कि १५वीं लोकसभा के लिए होने वाले चुनावों में कुर्सी हासिल करने सियासी वीर कुछ भी करने को तैयार हैं, जिन्हें न तो समाज मान्यता देता, न मतदाता और न चुनाव आयोग ही स्वीकार करेगा। लेकिन करें भी क्या कुर्सी का जो सवाल है

March 23, 2009

सजीं मटकों और सुराहियों की दुकानें



गर्मी के मौसम में मटके का ठंडा जल मिल जाए तो क्या बात है ? बदलते दौर में आज भी मटके के पानी की ठंडक के सभी कायल हैं मटके और सुराही के ठंडे पानी में जो मज़ा है वह फ्रिज के पानी में कहाँ गर्मी के मौसम की दस्तक देते ही बाज़ारों में मटकों और सुराहियों की दुकाने भी सजाने लगी हैं जहां बदलते दौर में ठंडे पाने के लिए फ्रिज और मशीनों का प्रचलन बढा है वहीं मटकों की अहमियत भी कम नहीं हुई लेकिन इनके स्वरुप में ज़रूर परिवर्तन आ रहा है यदि आप बाज़ारों में सजी इन मटकों की दूकान पर जाएँ तो आपको स्वयं समझ आ जायेगा इन दिनों बाज़ारों में डिजाइनर मटके और सुराहियाँ ग्राहकों क लुभा रही है पानी को ठंडा रखने के लिए घरों से लेकर आफिस तक की ज़रुरत बन चुके छोटे बड़े सभी साइज़ के मटके बाज़ारों में उपलब्ध हैं लेकिन इस बार रंग बिरंगे मटके बाज़ारों की रौनक बढा रहे हैं व्यापारियों के अनुसार काले रंग के मटके ज़्यादा डिमांड में रहते हैं कुछ व्यापारियों का मानना है कि पानी को ठंडा रखने में सुराही का कोई मुकाबला नहीं साथ ही लाने ले जाने में सुविधाजनक होने के कारण इनकी बिक्री 45 से 55 प्रतिशत तक होती है ख़ास बात यह है कि बाजारों में ग्राहकों की सुविधा को देखते हुए नल लगे मटके और सुराहियाँ उपलब्ध हैं साथ ही कई मटके और सुराहियों का निर्माण अलग तरह की मिट्टी से किया जाता है ताकि पानी को ज्यादा देर तक ठंडा रखा जा सके
क्या हैं मटके के पानी के फायदे :- गर्मी के मौसम में मटके और सुराहियों के पानी पीने के बहुत फायदे हैं ख़ास बात तो यह है कि यह पानी नेचुरल ठंडा होता है साथ ही कभी भी शरीर को नुक्सान नहीं पहुचाता तेज़ धूप में घूमने के बाद यदि फ्रिज का ठंडा पानी पी लिया जाये तो यह बेहद नुक्सान करता है वहीं मटके का ठंडा पानी तन - मन को शीतलता प्रदान करता है साथ ही इस परम्परागत तरीके को इस्तेमाल करके बिजाली की बचत भी हो जाती है

March 18, 2009

मध्यप्रदेश : लोकसभा चुनाव के लिए बीजेपी की तीसरी सूची जारी - तीन सीटों पर अभी कोई फैसला नहीं |

<><><>(कमल सोनी)<><><> भाजपा की केंद्रीय चुनाव समिति ने मंगलवार को मध्यप्रदेश में आगामी लोकसभा चुनावों के लिए अपने उम्मीदवारों की तीसरी सूची जारी कर दी है भाजपा ने तीसरी सूची में कुल ६ उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं इस सूची को मिलाकर मध्यप्रदेश की कुल २९ संसदीय सीटों में से २६ सीटों पर उम्मीदवारों घोषित कर दिए हैं जबकि तीन सीटों छिन्दवाडा, खजुराहो और सीधी सीट पर अभी भी असमंजस बरकरार है खबरों के मुताबिक इन तीनो सीटों पर उम्मीदवार चुनने का फैसला पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह करेंगे खबरों में तो यह भी है तीन सीटें भाजश की वजह से रोकी गई हैं
गौरतलब है कि कभी भाजपा नेता लालकृष्ण आडवानी पर पक्षपात पूर्ण रवैये का आरोप लगाकर भाजपा से अलग हुई उमा भारती ने प्रधानमंत्री पद के लिए आडवानी की उम्मीदवारी का खुले तौर पर समर्थन किया है और अपने इस आशय का पत्र भी उन्होंने ने एल के. आडवानी को लिखा है समझा जा रहा है कि भाजश नेत्री उमाभारती के बीजेपी के प्रति नरम रवैये के मद्देनज़र बीजेपी केंद्रीय चुनाव समिति ने पध्याप्रदेश की तीन सीटों को पेंडिंग में दाल दिया है
दूसरी और वर्त्तमान में मध्यप्रदेश विधान सभा में मंत्री पद संभाल रहे नेताओं में से तीन मंत्रियों गौरीशंकर बिसेन, राजेंद्र शुक्ल तथा रंजना बघेल को लोकसभा चुनाव मैदान में उतारने का विचार चुनाव समिति कर रही थी लेकिन कोई भी लोकसभा चुनाव मैदान में उतरने के लिए तैयार नहीं था पार्टी ने इन मंत्रियों की बात मानते हुए उन्हें इस शर्त पर चुनाव मैदान में नहीं उतारा कि पार्टी उनकी जगह जिसे उम्मीदवार घोषित करेगे उस उम्मीदवार को जितने का जिम्मा उनका ही होगा



कौन कौन कहाँ से ? :-

BETUL - JYOTI DHURVE
BALAGHAT - K.D.DESHMUKH
REWA - CHANDRAMANI TRIPATHI
MANSAUR - LAKSHMI NARAYAN PANDE
DHAR - MUKAM SINH KIRADE
SHAHDOLE - NARENDRA MARAVI
MURENA - NARENDRA SINH TOMER
BHIND - ASHOK ARGAL
GWALIOR - YASHODHRA RAJE
GUNA - NAROTTAM MISHRA
SAGAR - BHUPENDRA SINGH
TIKAMGARH - VIRENDRA KUMAR KHATIK
DAMOH - SHIVRAJ SINGH LODHI
SATNA - GANESH SINGH
JABALPUR - RAKESH SINGH
MANDLA - FAGGAN SINGH KULASTE
HOSHANGABAD - RAMPAL SINGH
VIDISHA - SUSHMA SWARAJ
BHOPAL - KAILASH JOSHI
RAJGARH - LAKSHMAN SINGH
DEWAS - THAWAR CHAND GAHLOT
UJJAIN - SATYANARAYAN JATIYA
INDORE - SUMITRA MAHAJAN
KHANDWA - NAND KUMAR SINGH CHAUHAN
RATLAM - DILIP SINGH BHURIA
KHARGONE - MAKHAN SINGH

March 17, 2009

लोकसभा चुनाव 2009 : सट्टा बाज़ार की सरगर्मी बढीं


<><><>(कमल सोनी)<><><> देश में १५ लोकसभा के लिए होने वाले चुनाव की तारीखें घोषित हो चुकी हैं उसके बाद से ही सट्टा बाज़ार की सरगर्मियां भी बढ़ गई हैं देश, प्रदेश और क्षेत्रीय स्तर के राजनितिक समीकरण पर सट्टे लगने लगे हैं खबरों के मुताबिक सभी संभावित समीकरणों पर अब तक करीब 1200 करोड़ रुपए का सट्टा लग चुका है। किस पार्टी को कितनी सीटें मिलेंगी और यूपीए व एनडीए गठबंधन में से कौन बनाएगा सरकार। कौन बनेगा प्रधानमंत्री सत्ता की चाबी किस दल के हाथों में होगी कौन सा दल किस गठबंधन को बाहर से समर्थन देगा क्या होगा सीटों का बंटवारा इन सभी के रेट तय हो गए हैं और उनमें लगातार उतार चढाव भी जारी है ख़ास बात तो यह है कि सट्टे बाजों ने मान लिया है कि बसपा और थर्ड फ्रंट चुनाव परिणाम आने के बाद यूपीए को समर्थन देगा। खबरों में यह है कि अब तक 1200 करोड़ रुपए का सट्टा लोकसभा चुनाव के संभावित परिणाम पर लग चुका था। माना तो यह भी जा रहा है कि 16 मई को मतगणना के दिन तक यह रकम बढ़ कर 14 हजार करोड़ तक पहुंच जाएगी। हलाकि प्रधानमंत्री पद के लिए सट्टेबाजों ने भाव नहीं खोले हैं।
किसके कितने भावः :- १५ लोकसभा के लिए कुल 543 लोकसभा सीटों के लिए चुनाव होने हैं यह चुनाव देश भर में पांच चरणों में सम्पान होंगे यूपीए और एनडीए गठबंधन में से कौन सत्ता में आयेगा । इसका भाव हाल ही में सट्टेबाजों ने खोला था। सट्टेबाजों ने शुरुआत में ही यूपीए गठबंधन का 72 पैसे का भाव खोला था, जो घटाकर को 64 पैसे हो गया। दूसरी और एनडीए का भाव 1 रुपए 60 पैसे खुला था, जो अब घटाकर 1 रुपए 50 पैसे हो गया है।
सट्टेबाजों का अनुमान :- १५ लोकसभा के लिए कुल 543 लोकसभा सीटों के लिए चुनाव होने हैं आम चुनाव में सटोरियों की अनुमान है कि कांग्रेस 150-152 सीटें जीत सकती है। दूसरी और भाजपा 125-140 और मायावती की पार्टी बसपा 35-40 सीटों पर जीत हासिल कर सकती है।

March 8, 2009

खुशखबरी : कमला नेहरू प्राणि उद्यान इंदौर में सफ़ेद बाघिन सीता ने तीन शावकों को जन्म दिया |


<><><>(कमल सोनी)<><><> वन्य प्राणियों और उनके संरक्षण के प्रति जागरुक और रुची रखने वालों के लिए यह खबर दिल को सोकूं देने वाली है जब मुझे यह खबर मिली तो मुझे भी बेहद हर्ष हुआ मध्यप्रदेश के इंदौर में पहली बार कमला नेहरू प्राणि उद्यान में एक सफेद बाघिन ने तीन शावकों को जन्म देकर वन्य प्रेमियों में खुशी की लहर फैला दी है। आधिकारिक सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार सफेद बाघिन सीता ने कल रात तीन शावकों को जन्म दिया। लगातार विलुप्त होती वन्यप्राणियों की संख्या तथा तेज़ी से घटती सफ़ेद बाघों की संख्या के बीच इस खबर से कमला नेहरू प्राणी उद्यान इंदौर में खुशी की लहर दौड़ गई सीता को पिछले वर्ष मई में औरगांबाद से यहां लाया गया था। तीनों शावक स्वस्थ हैं। जानकारी मिली है की इंदौर के प्राणी उद्यान में करीब 14 वर्षा बाद शावकों ने जन्म लिया है। उन्होंने बताया कि सफेद बाघों की यह प्रजाति विलुप्ति होने की कगार पर हैं और ऐसे में तीन सफेद बाघों का जन्म लेना हर्ष की बात है। ऐसा मध्य प्रदेश में पहली बार हुआ है। इससे पूर्व भी बाघों की घटती संख्या पर लगाम कसने वन विहार भोपाल और पन्ना टाइगर रिसर्व काफी समय से प्रयासरत हैं इसी तारतम्य में वन विहार भोपाल में वन्यप्राणियों के संरक्षण तथा उनके प्रति आमजनमानस में रुची लाने के उद्देश्य से "वन्य प्राणी एडाप्शन योजना" चलाई गई है यह योजना भी खासी लोकप्रिय होती रही है दूसरी और पन्ना टाइगर रिसर्व भी घटते बाघों के लेकर चिंतित है जिसके लिए पन्ना में एक मात्र बाघिन के लिए दुल्हन ली गई है शेर के लिए नै दुल्हन शेरनी को बांधवगढ राष्ट्रीय उद्यान से पन्ना नेशनल पार्क टाईगर रिजर्व में लाया गया है ताकि बाघों की संख्या में इजाफा हो सके इसके अलावा पन्ना में एक और बाघिन लाने की दिशा में प्रयास किये जा रहे हैं दूसरी बाघिन कान्हा राष्ट्रीय उद्यान से लाइ जायेगी बहरहाल वन्य प्राणियों की निरंतर घटती संख्या के मद्देनज़र यह खबर बेहद खुश करने वाली तो है ही लेकिन वन्य प्राणियों को संरक्शान दिया जाना बेहद आवश्य है साथ ही उनके अवैध शिकार पर भी रोकथाम लगाने की आवश्यकता है

March 2, 2009

शाही होगा इस बार का लोकसभा चुनाव - १० हज़ार करोड़ से अधिक खर्च होने का अनुमान

<><><>(कमल सोनी)<><><> एक और पूरी दुनिया आर्थिक संकट से जूझ रही है तो दूसरी और आगामी लोकसभा चुनाव में सभी पार्टियां दिल खोलकर खर्चे करेंगी इस बार के चुनाव अमेरिकी चुनावों से भी महंगे होंगे चुनाव आयोग ने चुनाव की तारीखों की भी घोषणा कर दी है इस बार आम सत्ता का महाकुम्भ पांच चरणों में संपन्न होगा चुनाव की घोषणा होते ही राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई है
देश पर छाए आर्थिक संकट के बावजूद विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा लोकसभा चुनावों के दौरान पानी की तरह पैसा बहाए जाने के आसार हैं। सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (सीएमएस) द्वारा कराए गए सर्वे के मुताबिक अप्रैल-मई में प्रस्तावित आम चुनावों का कुल खर्च करीब दस हजार करोड़ रुपए आ सकता है। और यह तो सिर्फ लोकसभा चुनाव का ही खर्चा है लोकसभा चुनाव के साथ कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव भी संपन्न होंगे उनका व्यय अलग होगा यह राशि अमेरिका के अब तक के सबसे महंगे बताए जा रहे इस बार के राष्ट्रपति चुनावों में उम्मीदवारों द्वारा किए गए 1.8 अरब डॉलर (करीब 8000 करोड़ रुपए) के खर्च से भी कहीं ज्यादा है। खास बात तो यह है अमेरिका के राष्ट्रपति चुनावों में इतना खर्च लगभग एक साल में किया गया लेकिन देश में होने वाले लोकसभा चुनाव में १०हज़ार करोड़ से अधिक राशिः मात्र दो से ढाई माह में ही खर्च कर दी जायेगी अमेरिका के राष्ट्रपति चुनावों में 4000 करोड़ रु बराक ओबामा ने किये थे वहीं 1200 करोड़ रु हिलेरी क्लिंटन ने खर्च किये थे और 2000 करोड़ रु जॉन मेक्केन ने व्यय किये थे इसके अलावा 800 करोड़ रु अन्य खर्चे हुए थे
दोगुना से ज्यादा महंगे चुनाव :- वर्ष 2004 में भारत में 14 वीं लोकसभा के लिए हुए पिछले आम चुनाव में कुल 4500 करोड़ रु व्यय हुए थे और इस बार यह राशिः बढ़कर 10 हज़ार करोड़ रु होने का अनुमान है ‘वोट के बदले नोट’ का खेल :- सर्वे में जारी रिपोर्ट के मुताबिक दस हजार करोड़ रुपए का एक चौथाई हिस्सा यानि करीब 2500 करोड़ रुपए उम्मीदवारों द्वारा अनाधिकृत तरीके से वोटरों को दिए जाने के आसार हैं। कर्नाटक व आंध्रप्रदेश में बड़े पैमाने पर वोटों की खरीद-फरोख्त हो सकती है।
कौन करेगा कितना खर्च :-
चुनाव आयोग : 1300 करोड़ रु.
केंद्रीय व राज्य एजेंसियां : 700 करोड़ रु.
पार्टी फंड : 1650 करोड़ रु. जिनमें क्षेत्रीय दलों के उम्मीदवार : 1000 करोड़ रुपए खर्च करेंगे।
केंद्रीय स्तर के उम्मीदवार : 4350 करोड़ रु.
मतदाताओं को लुभाने : 2500 करोड़ का खर्च होगा
कब कब हुआ कितना खर्च :-
वर्ष 1991 आम चुनाव :- 1700 करोड़ रु
वर्ष 1996 आम चुनाव :- 2200 करोड़ रु
वर्ष 1998 आम चुनाव :- 3200 करोड़ रु
वर्ष 2004 आम चुनाव :- 4500 करोड़ रु

लोकसभा के महा-कुम्भ की घोषणा - आचार संहिता लागू

<><><>(कमल सोनी)<><><> चुनाव आयोग ने 15 लोकसभा के महा-कुम्भ की घोषणा कर दी है इसके साथ ही चुनाव आचार संहिता भी लागू हो गई है 15 लोकसभा के महा-कुम्भ पांच चरणों में संपन्न होगा घोषणा होते ही आचार संहिता तत्काल प्रभाव से लागू कर दी गई है। 15 लोकसभा के महाकुम्भ में चुनाव आयोग ने वोटिंग के लिए फोटो पहचान पत्र ज़रूरी होगा इसके लिए आयोग ने सख्त रवैया अपनाने के निर्देश जारी किये हैं साथ ही देश भर में 8,28,000 पोलिंग बूथ बनाए जायेंगे पांच चरणों में होने वाले इन चुनावों के लिए 11 लाख इलेक्ट्रौनिक वोटिंग मशीनों की आवश्यकता होगी चुनाव आयोग ने कहा है कि किसी भी आकस्मिक स्थिति की आशंका के मद्देनज़र 13.66 लाख इलेक्ट्रौनिक वोटिंग मशीनों की व्यवस्था की गई है चुनाव में देश भर से 71 करोड़ से ज़्यादा मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे और दो जून से पहले सरकार का गठन कर लिया जाएगा। इन चुनावों के दौरान 99 सीटों पर परिसीमन का असर दिखेगा। 84 सीटें सुरक्षित हैं।
पांच चरणों में होगा महाकुम्भ :-
>>>>> 16 अप्रैल को चुनावों का पहला चरण होगा। इस चरण में 124 सीटों के लिए वोटिंग कराई जाएगी।
>>>>> चुनावों का दूसरा चरण 23 अप्रैल को होगा। इसके तहत 141 सीटों पर मतदान होगा।
>>>>> 30 अप्रैल को होने वाले तीसरे चरण के मतदान में 107 सीटों पर उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला होगा।
>>>>> मतदान का चौथा चरण सात मई को होगा जिसमें 85 सीटों पर मतदान कराये जायेंगे
>>>>> पांचवां चरण 13 मई को होगा। इनमें 86 सीटों पर वोट डाले जाएंगे।
>>>>> वोटों की गिनती 16 मई को होगी।
>>>>> 2 जून के पहले लोकसभा का गठन हो जायेगा
कहाँ कितने चरणों में होंगे मतदान :-
>>>>> उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में सभी पांच चरणों में मतदान होगा जबकि बिहार में चार चरणों में चुनाव कराए जाएंगे।
>>>>> महाराष्ट्र तथा प. बंगाल में तीन चरणों में चुनाव होंगे।
>>>>> अरूणाचल प्रदेश, झारखंड, मध्यप्रदेश तथा पंजाब में दो चरणों में ये महाकुम्भ संपन्न होगा
>>>>> इन लोकसभा चुनावों के साथ ही अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और उड़ीसा में विधानसभा चुनाव भी कराए जाएंगे।
>>>>> इसके अलावा बाकी के राज्यों में एक चरण में चुनाव संपन्न होंगे
इससे पहले, आम चुनावों के कार्यक्रम को अंतिम रूप देने के लिए चुनाव आयोग की बैठक हुई। निर्वाचन सदन में हुई इस बैठक में मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी, दोनों आयुक्त नवीन चावला और एसवाई कुरैशी तथा आयोग के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया।

February 28, 2009

अब मध्यप्रदेश के चार बड़े शहरों में चलेंगी एयर कंडीशन वोल्वो सिटी बस

<><><>(कमल सोनी)<><><> मध्यप्रदेश के चार बड़े शहरों में एयर कंडीशन वोल्वो सिटी बसे चलाई जायेंगी यदि सब कुछ ठीक ठाक चला तो आगामी तीन चार माह में एयर कंडीशन वोल्वो सिटी बसे प्रदेश के चार बड़े शहरों की सडकों में दौडेंगी नगरीय प्रशासन मंत्र बाबूलाल गौर ने भोपाल में पत्रकारों से बातचीत के दौरान यह बात कही उन्होंने बताया कि जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीनीकरण मिशन के अंतर्गत विभिन्न परियोजनाओं की स्वीकृति हेतु पर्यवेक्षण समिति की एक बैठक दिनांक २६/०२/2009 को आहूत की गई थी जिसमें प्रदेश के चार बड़े शहरों इंदौर, भोपाल, जबलपुर और उज्जैन के लिए कुल ५२५ एयर कंडीशन वोल्वो सिटी बसे स्वीकृत हो गई हैं
बाबूलाल गौर ने बताया कि इन बसों के लिए लगभग ५० प्रतिशत भारत सरकार का अनुदान है तथा २० प्रतिशत प्रदेश सरकार से अनुदानित होगा तथा ३० प्रतिशत हिस्सा बस आपरेटरों को लगाना होगा प्रदेश के लिए स्वीकृत कुल ५२५ बसों की लागत २०५ करोड़ रु है इससे पूर्व भी प्रदेश के चार शहरों में स्टार सिटी बसे संचालित हैं जिनमें बसे बस आपरेटरों ने ख़रीदी थी लेकिन इस बार ऐसा नहीं है दूसरी तरफ बसों के लिए आपरेटर के चयन के लिए अगले एक सप्ताह के भीतर निविदाएँ आमंत्रित किये जाने की भी खबरें हैं उमीदें लगाईं जा रही हैं कि आगामी चार पांच माह के भीतर ये बसे प्रदेश के चार नादे शहरों की सडकों पर दौड़ती नज़र आयेंगी हलाकि आगामी लोक सभा चुनाव के मद्देनज़र आचार संहिता लग जाने से विभागीय कर्यप्रानाली में किसी अड़चन से भी इनकार नहीं किया जा सकता
तीन तरह की होंगी बसे :- नगरीय प्रशासन मंत्री बाबूलाल गौर ने पत्रकारों को जानकारी देते हुए बताया कि ये बसे कुल तीन तरह की होंगी
लो फ्लोर ऐ.सी. - लागत ७० लाख
लो फ्लोर नॉन ऐ.सी. :- लागत ४० लाख
स्टैण्डर्ड :- ३० लाख
प्रदेश में कुल ५२५ बसें खरीदे जायेंगी कुल लागत ---- २०५ करोड़ रुपये
कहाँ कितनी बसे :-
१ > राज़धानी भोपाल
लो फ्लोर ऐ.सी --- ५० बसे
लो फ्लोर नॉन ऐ.सी. --- ५० बसे
स्टैण्डर्ड --- १२५ बसे
कुल बसे ------- २२५
२ > इंदौर
लो फ्लोर ऐ.सी --- २० बसे
लो फ्लोर नॉन ऐ.सी. --- ३० बसे
स्टैण्डर्ड --- १२५ बसे
कुल बसे ------- १७५
३ > जबलपुर
लो फ्लोर ऐ.सी --- २५ बसे
स्टैण्डर्ड --- ५० बसे
कुल बसे ------- ७५
४ > उज्जैन
लो फ्लोर ऐ.सी --- १० बसे
स्टैण्डर्ड --- ४० बसे
कुल बसे ------- ५०
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