February 27, 2010

दुराचार पर सदाचार की विजय और विजय पर रंगों से उत्सव मनाने का पर्व - होली



(कमल सोनी)>>>> होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण भारतीय त्योहार है. यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है. रंगों का त्योहार कहा जाने वाला यह पर्व वैसे तो पांच दिनों का हॉट है लेकिन मुख्य रूप से दो दिन मनाया जाता है. पहले दिन को होलिका जलायी जाती है, जिसे होलिका दहन भी कहते है. दूसरे दिन, जिसे धुरड्डी, धुलेंडी, धुरखेल या धूलिवंदन कहा जाता है, लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते हैं, ढोल बजा कर होली के गीत गाये जाते हैं, और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भूल कर गले मिलते हैं और फिर से दोस्त बन जाते हैं. एक दूसरे को रंगने और गाने-बजाने का दौर दोपहर तक चलता है. इसके बाद स्नान कर के विश्राम करने के बाद नए कपड़े पहन कर शाम को लोग एक दूसरे के घर मिलने जाते हैं, गले मिलते हैं और मिठाइयाँ खिलाते हैं. राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का संदेशवाहक भी है. राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही, पर इनको उत्कर्ष तक पहुँचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है. फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं. होली का त्योहार वसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है. उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है. इस दिन से फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है. खेतों में सरसों खिल उठती है. बाग-बगीचों में फूलों की आकर्षक छटा छा जाती है. पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य सब उल्लास से परिपूर्ण हो जाते हैं. खेतों में गेहूँ की बालियाँ इठलाने लगती हैं. किसानों का ह्रदय ख़ुशी से नाच उठता है. बच्चे-बूढ़े सभी व्यक्ति सब कुछ संकोच और रूढ़ियाँ भूलकर ढोलक-झाँझ-मंजीरों की धुन के साथ नृत्य-संगीत व रंगों में डूब जाते हैं. चारों तरफ़ रंगों की फुहार फूट पड़ती है.

क्यों मनाई जाती है होली ? :- होली क्यों मनाई जाती है ? इस पर कई कथाएं भी प्रचलित हैं. होली एक सामाजिक पर्व है. और यह भारत में ही नहीं बल्कि विश्व के कई देशों में मनाया जाता है. यह रंगों से भरा रंगीला त्योहार, बच्चे, वृद्ध, जवान, स्त्री-पुरुष सभी के ह्रदय में जोश, उत्साह, खुशी का संचार करने वाला पर्व है. यह एक ऐसा पर्व है जिसे संपूर्ण विश्व में किसी ना किसी रूप में मनाया जाता है. इसके एक दिन पहले वाले सायंकाल के बाद भद्ररहित लग्न में होलिका दहन किया जाता है. इस अवसर पर लकडियां, घास-फूस, गोबर के बुरकलों का बडा सा ढेर लगाकर पूजन करके उसमें आग लगाई जाती है. वैदिक काल में इस पर्व को नवात्रैष्टि यज्ञ कहा जाता था. उस समय खेत के अधपके अन्न को यज्ञ में दान करके प्रसाद लेने का विधान समाज में व्याप्त था. अन्न को होला कहते है, इसी से इसका नाम होलिकोत्सव पडा. वैसे होलिकोत्सव को मनाने के संबंध में अनेक मत प्रचलित है. कुछ लोग इसको अग्निदेव का पूजन मानते हैं, तो कुछ इसे नवसंम्बवत् को आरंभ तथा बंसतामन का प्रतीक मानते हैं. इसी दिन प्रथम पुरुष मनु का जन्म हुआ था. अतः इसे मंवादितिथि भी कहते हैं.

प्रचलित कथाएं :- बसंतोत्सव रंगों के पर्व होली पर कई कथाएं भी प्रचलित हैं. जिनमे सबसे ज्यादा प्रचलित कहानी है, हिरण्यकशिपु की. माना जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था. अपने बल के दर्प में वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था. उसने अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी. हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद ईश्वर भक्त था. प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने ईश्वर की भक्ति का मार्ग न छोड़ा. हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था. कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती. हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे. आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया. ईश्वर भक्त प्रह्लाद की याद में इस दिन होली जलाई जाती है. प्रतीक रूप से यह भी माना जता है कि प्रह्लाद का अर्थ आनन्द होता है. वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका (जलाने की लकड़ी) जलती है और प्रेम तथा उल्लास का प्रतीक प्रह्लाद (आनंद) अक्षुण्ण रहता है.

प्रह्लाद की कथा के अतिरिक्त यह पर्व राक्षसी ढुंढी, राधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी जुड़ा हुआ है. कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं. कुछ लोगों का यह भी मानना है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का वध किया था. इसी खु़शी में गोपियों और ग्वालों ने रासलीला की और रंग खेला था. होली खेलते राधा और कृष्णहोली भारत के सबसे पुराने पर्वों में से है. यह कितना पुराना है इसके विषय में ठीक जानकारी नहीं है लेकिन इसके विषय में इतिहास पुराण व साहित्य में अनेक कथाएँ मिलती है. इन कथाओं पर आधारित साहित्य और फ़िल्मों में अनेक दृष्टिकोणों से बहुत कुछ कहने के प्रयत्न किए गए हैं. लेकिन हर कथा में एक समानता है कि असत्य पर सत्य की विजय और दुराचार पर सदाचार की विजय और विजय को उत्सव मनाने की बात कही गई है. होली का त्योहार राधा और कृष्ण की पावन प्रेम कहानी से भी जुडा हुआ है. वसंत के सुंदर मौसम में एक दूसरे पर रंग डालना उनकी लीला का एक अंग माना गया है. मथुरा और वृन्दावन की होली राधा और कृष्ण के इसी रंग में डूबी हुई होती है. बरसाने और नंदगाँव की लठमार होली तो प्रसिद्ध है ही देश विदेश में श्रीकृष्ण के अन्य स्थलों पर भी होली की परंपरा है. यह भी माना गया है कि भक्ति में डूबे जिज्ञासुओं का रंग बाह्य रंगों से नहीं खेला जाता, रंग खेला जाता है भगवान्नाम का, रंग खेला जाता है सद्भावना बढ़ाने के लिए, रंग होता है प्रेम का, रंग होता है भाव का, भक्ति का, विश्वास का. होली उत्सव पर होली जलाई जाती है अंहकार की, अहम् की, वैर द्वेष की, ईर्ष्या मत्सर की, संशय की और पाया जाता है विशुद्ध प्रेम अपने आराध्य का, पाई जाती है कृपा अपने ठाकुर की.

कंस और पूतना की कथा :- पूतनावधकंस ने मथुरा के राजा वसुदेव से उनका राज्य छीनकर अपने अधीन कर लिया स्वयं शासक बनकर आत्याचार करने लगा. एक भविष्यवाणी द्वारा उसे पता चला कि वसुदेव और देवकी का आठवाँ पुत्र उसके विनाश का कारण होगा. यह जानकर कंस व्याकुल हो उठा और उसने वसुदेव तथा देवकी को कारागार में डाल दिया. कारागार में जन्म लेने वाले देवकी के सात पुत्रों को कंस ने मौत के घाट उतार दिया. आठवें पुत्र के रूप में कृष्ण का जन्म हुआ और उनके प्रताप से कारागार के द्वार खुल गए. वसुदेव रातों रात कृष्ण को गोकुल में नंद और यशोदा के घर पर रखकर उनकी नवजात कन्या को अपने साथ लेते आए. कंस ने जब इस कन्या को मारना चाहा तो वह अदृश्य हो गई और आकाशवाणी हुई कि कंस को मारने वाले तो गोकुल में जन्म ले चुका है. कंस यह सुनकर डर गया और उसने उस दिन गोकुल में जन्म लेने वाले हर शिशु की हत्या कर देने की योजना बनाई. इसके लिए उसने अपने आधीन काम करने वाली पूतना नामक राक्षसी का सहारा लिया. वह सुंदर रूप बना सकती थी और महिलाओं में आसानी से घुलमिल जाती थी. उसका कार्य स्तनपान के बहाने शिशुओं को विषपान कराना था. अनेक शिशु उसका शिकार हुए लेकिन कृष्ण उसकी सच्चाई को समझ गए और उन्होंने पूतना का वध कर दिया. यह फाल्गुन पूर्णिमा का दिन था अतः पूतनावध की खुशी में होली मनाई जाने लगी.

कई रंग होली के :- बसंतोत्सव पर्व होली के कई रंग हैं. यानि होली अलग अलग रूपों में माने जाती है. ब्रज के बरसाना गाँव में होली एक अलग तरह से खेली जाती है जिसे लठमार होली कहते हैं. यहाँ की होली में मुख्यतः नंदगाँव के पुरूष और बरसाने की महिलाएं भाग लेती हैं, क्योंकि कृष्ण नंदगाँव के थे और राधा बरसाने की थीं. नंदगाँव की टोलियाँ जब पिचकारियाँ लिए बरसाना पहुँचती हैं तो उन पर बरसाने की महिलाएँ खूब लाठियाँ बरसाती हैं. पुरुषों को इन लाठियों से बचना होता है. और साथ ही महिलाओं को रंगों से भिगोना होता है. नंदगाँव और बरसाने के लोगों का विश्वास है कि होली की लाठियों से किसी को चोट नहीं लगती है. अगर चोट लगती भी है तो लोग घाव पर मिट्टी मलकर फ़िर शुरु हो जाते हैं. इस दौरान भाँग और ठंडाई का भी ख़ूब इंतज़ाम होता है. होली उत्तर भारत के अलावा अन्य प्रदेशों मे भी मनाई जाती है, हाँ थोड़ा बहुत रुप स्वरुप बदल जाता है. जैसे हरियाणा की धुलन्डी. हरियाणा मे होली के त्योहार मे भाभियों को इस दिन पूरी छूट रहती है कि वे अपने देवरों को साल भर सताने का दण्ड दें. इस दिन भाभियां देवरों को तरह तरह से सताती है और देवर बेचारे चुपचाप झेलते है, क्योंकि इस दिन तो भाभियों का दिन होता है. देवर अपनी प्यारी भाभी के लिये उपहार लाता है. इसके अलावा होली का एक और रंग है. वह है, बंगाल का बसन्तोत्सव. गुरु रबीन्द्रनाथ टैगोर ने होली के ही दिन शान्तिनिकेतन मे वसन्तोत्सव का आयोजन किया था, तब से आज तक इस यहाँ बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है. पूरे बंगाल मे इसे ढोल पूर्णिमा अथवा ढोल जात्रा के तौर पर भी मनाया जाता है, लोग अबीर गुलाल लेकर मस्ती करते है. श्रीकृष्ण और राधा की झांकिया निकाली जाती है. महाराष्ट्र में रंग पंचमी और कोंकण का शिमगो प्रसिद्द हैं. महाराष्ट्र और कोंकण के लगभग सभी हिस्सों मे इस त्योहार को रंगों के त्योहार के रुप मे मनाया जाता है. मछुआरों की बस्ती मे इस त्योहार का मतलब नाच,गाना और मस्ती होता है. इसके अलावा पंजाब का होला मोहल्ला भी होली मानाने का अपना ही अंदाज़ है. पंजाब मे भी इस त्योहार की बहुत धूम रहती है. सिक्खों के पवित्र धर्मस्थान श्री अनन्दपुर साहिब मे होली के अगले दिन से लगने वाले मेले को होला मोहल्ला कहते है. सिखों के लिये यह धर्मस्थान बहुत ही महत्वपूर्ण है. साथ ही तमिलनाडु की कामन पोडिगई जो कि कामदेव को समर्पित होता है. इसके पीछे भी एक किवदन्ती है. प्राचीन काल मे देवी सती (भगवान शंकर की पत्नी) की मृत्यू के बाद शिव काफी क्रोधित और व्यथित हो गये थे. इसके साथ ही वे ध्यान मुद्रा मे प्रवेश कर गये थे. उधर पर्वत सम्राट की पुत्री भी शंकर भगवान से विवाह करने के लिये तपस्या कर रही थी. देवताओ ने भगवान शंकर की निद्रा को तोड़ने के लिये कामदेव का सहारा लिया. कामदेव ने अपने कामबाण के शंकर पर वार किया. शंकर भगवान को बहुत गुस्सा आया कि कामदेव ने उनकी तपस्या मे विध्न डाला है इसलिये उन्होने अपने त्रिनेत्र से कामदेव को भस्म कर दिया. अब कामदेव का तीर तो अपना काम कर ही चुका था, सो पार्वती को शंकर भगवान पति के रुप मे प्राप्त हुए. उधर कामदेव की पत्नी रति ने विलाप किया और शंकर भगवान से कामदेव को जीवित करने की गुहार की. ईश्वर प्रसन्न हुए और उन्होने कामदेव को पुनर्जीवित कर दिया. यह दिन होली का दिन होता है. आज भी रति के विलाप को लोक संगीत के रुप मे गाया जाता है और चंदन की लकड़ी को अग्निदान किया जाता है ताकि कामदेव को भस्म होने मे पीड़ा ना हो. साथ ही बाद मे कामदेव के जीवित होने की खुशी मे रंगो का त्योहार मनाया जाता है.

आधुनिकता का रंग :- होली रंगों का त्योहार है, हँसी-खुशी का त्योहार है, लेकिन होली के भी अनेक रूप देखने को मिलते है. प्राकृतिक रंगों के स्थान पर रासायनिक रंगों का प्रचलन, भांग-ठंडाई की जगह नशेबाजी और लोक संगीत की जगह फ़िल्मी गानों का प्रचलन इसके कुछ आधुनिक रूप हैं. लेकिन इससे होली पर गाए-बजाए जाने वाले ढोल, मंजीरों, फाग, धमार, चैती और ठुमरी की शान में कमी नहीं आती. अनेक लोग ऐसे हैं जो पारंपरिक संगीत की समझ रखते हैं और पर्यावरण के प्रति सचेत हैं. इस प्रकार के लोग और संस्थाएँ चंदन, गुलाबजल, टेसू के फूलों से बना हुआ रंग तथा प्राकृतिक रंगों से होली खेलने की परंपरा को बनाए हुए हैं, साथ ही इसके विकास में महत्वपूर्ण योगदान भी दे रहे हैं. रासायनिक रंगों के कुप्रभावों की जानकारी होने के बाद बहुत से लोग स्वयं ही प्राकृतिक रंगों की ओर लौट रहे हैं. होली की लोकप्रियता का विकसित होता हुआ अंतर्राष्ट्रीय रूप भी आकार लेने लगा है. बाज़ार में इसकी उपयोगिता का अंदाज़ इस साल होली के अवसर पर एक अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठान केन्ज़ोआमूर द्वारा जारी किए गए नए इत्र होली है से लगाया जा सकता है.

होली की शुभकामनाएं ..........

खेलें इको फ्रेंडली होली........(होली विशेष)



(कमल सोनी)>>>> यदि आप इस बार होली को किसी नए अंदाज़ में सेलीब्रेट करना चाहते हैं. तो रंगों के इस त्यौहार को इको फ्रेंडली बनायें. होली ऐसी हो जिसमें ज्यादा से ज़्यादा प्राकृतिक रंगों का प्रयोग हो. सबसे ज्यादा अप होली को तभी इंजॉय कर सकेंगे जब वह सूखी होगी. इससे आप जल सरंक्षण भी कर सकते हैं. गौर करें गर्मी की दस्तक होली से ही प्रारम्भ होती है. साथ ही गर्मी की दस्तक के पहले ही जलस्तर गिरावट आने लगती है जो कि एक चिंता का विषय है. इसके फलस्वरूप पानी में रंग मिलाकर हजारों लीटर पानी बर्बाद कर देने से पानी की समस्या और विकराल हो सकती है. पानी की कमी को देखते हुए लोगों को चाहिए कि वह सूखी होली खेलें. इस तरह वह जल संरक्षण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे. हालांकि कई सामाजिक संस्थाएं और आमजन इस दिशा में लोगों को जागरूक करने का प्रयास कर रहे हैं. पानी की बर्बादी रोकने के लिए सबको मिल-जुलकर प्रयास करने होंगे. वर्तमान जलसंकट को देखते हुए लोगों को होली की उमंग भारी पड़ सकती है एक अनुमान के मुताबिक उमंग व उल्लास के साथ रंगों से सराबोर होकर होली मनाने पर एक शहर में एक दिन में 1 करोड़ 52 लाख 57 हजार 946 लीटर पानी अतिरिक्त खर्च होता है. होली खेलने वालों ने अगर प्राकृतिक रंग या गुलाल से होली खेली तो कुल 36 लाख 95 हजार 518 लीटर पानी की बचत होगी. आज भी कुछ लोग हैं जो प्रकृति से प्राप्त फूल-पत्तियों व जड़ी-बूटियों से रंग बना कर होली खेलते हैं. उनके अनुसार इन रंगों में सात्विकता होती है और ये किसी भी तरह से हानिकारक नहीं होते. विशेषज्ञों के अनुसार सामान्य तौर पर नहाने में 20 लीटर पानी प्रतिदिन प्रति व्यक्ति खर्च होता है. सूखे रंग या गुलाल से होली खेलने के पश्चात 40 लीटर पानी खर्च होगा पर अगर यही होली कैमिकल युक्त रंगों से खेली जाती है तो रंग छुड़ाने व नहाने में 60 लीटर पानी की खपत होगी. साथ ही पानी मिले रंगों से जो पानी बर्बाद होगा वो अलग.

जल है तो कल है :- जल बचाने के लिए आमजनमानस को स्वयं विचार करना होगा. क्योंकि जल है तो कल है. हमें स्वयं इस बात पर गौर करना होगा कि रोजाना बिना सोचे समझे हम कितना पानी उपयोग में लाते हैं. यहाँ खास बात यह गौर करने लायक है कि आगामी २२ मार्च “विश्व जल दिवस” है. जी हाँ पानी बचाने के संकल्प का दिन. पानी के महत्व को जानने का दिन और पानी के संरक्षण के विषय में समय रहते सचेत होने का दिन. आँकड़े बताते हैं कि विश्व के १.४ अरब लोगों को पीने का शुद्ध पानी नही मिल रहा है. प्रकृति जीवनदायी संपदा जल हमें एक चक्र के रूप में प्रदान करती है, हम भी इस चक्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. चक्र को गतिमान रखना हमारी ज़िम्मेदारी है, चक्र के थमने का अर्थ है, हमारे जीवन का थम जाना. प्रकृति के ख़ज़ाने से हम जितना पानी लेते हैं, उसे वापस भी हमें ही लौटाना है. हम स्वयं पानी का निर्माण नहीं कर सकते अतः प्राकृतिक संसाधनों को दूषित न होने दें और पानी को व्यर्थ न गँवाएँ यह प्रण लेना आज के दिन बहुत आवश्यक है. यह दिवस हमें होली के दिन भी पानी बचाने का संदेश दे रहा है. आज हमें एक अहम सवाल खुद से पूछने की आवश्यकता है. कि क्या आप पूरा एक दिन बिना पानी के गुजारने की कल्पना कर सकते हैं ? जाहिर है नहीं. पानी अनमोल है, इसलिये संकल्प करें कि इस होली पर पानी बचाकर न सिर्फ़ आप अपने बल्कि समूचे विश्व को एक नए रंग में रंग देंगे.

मंडावा की सूखी होली की बात ही अलग :- मंडावा की सूखी होली में जयपुर, दिल्ली व बंबई ही नहीं विदेशों से भी सैलानी यहां आते हैं. यहां की होली में ना फुहड़पन, ना कीचड़, ना पानी और ना ही पक्का रंग, फिर भी रंग ऐसा चढ़े की छुटाए ना छूटे. चेहरे पर लगाया जाता है तो सिर्फ अबीर-गुलाल. पक्के रंग व पानी के प्रयोग पर पब्लिक का प्रतिबंध है. सूखी व शालीन होली की यह परंपरा करीब सौ साल से चली आ रही है. कुछ सालों से यहां होली पर पर्यटकों की संख्या भी बढ़ने लगी है.

स्वयं अपने घर पर बनायें प्राकृतिक रंग :- होली रंगों का त्योहार है जितने अधिक से अधिक रंग उतना ही आनन्द, लेकिन इस आनन्द को दोगुना भी किया जा सकता है प्राकृतिक रंगों से खेलकर, पर्यावरण मित्र रंगों के उपयोग द्वारा भी होली खेली जा सकती है और यह रंग घर पर ही बनाना एकदम आसान भी है. इन प्राकृतिक रंगों के उपयोग से न सिर्फ़ आपकी त्वचा को कोई खतरा नहीं होगा, परन्तु रासायनिक रंगों के इस्तेमाल न करने से कई प्रकार की बीमारियों से भी बचाव होता है.

ऐसे बनायें लाल रंग :-
<<*>> लाल गुलाब की पत्तियों को अखबार पर बिछाकर सुखा लें, उन सूखी पत्तियों को बारीक पीसकर लाल गुलाल के रूप में उपयोग कर सकते हैं जो कि खुशबूदार भी होगा.
<<*>> रक्तचन्दन (बड़ी गुमची) का पावडर भी गुलाल के रूप में उपयोग किया जा सकता है, यह चेहरे पर फ़ेसपैक के रूप में भी उपयोग होता है.
<<*>> रक्तचन्दन के दो चम्मच पावडर को पाँच लीटर पानी में उबालें और इस घोल को बीस लीटर के पानी में बड़ा घोल बना लें… यह एक सुगन्धित गाढ़ा लाल रंग होगा.
<<*>> लाल हिबिस्कस के फ़ूलों को छाया में सुखाकर उसका पावडर बना लें यह भी लाल रंग के विकल्प के रूप में उपयोग किया जा सकता है.
<<*>> लाल अनार के छिलकों को मजीठे के पेड़ की लकड़ी के साथ उबालकर भी सुन्दर लाल रंग प्राप्त किया जा सकता है.
<<*>> टमाटर और गाजर के रस को पानी में मिलाकर भी होली खेली जा सकती है.

पीला रंग :-
<<*>> दो चम्मच हल्दी को चार चम्मच बेसन के साथ मिलाकर उसे पीला गुलाल के रूप में उपयोग किया जा सकता है.
<<*>> अमलतास और गेंदे के फ़ूलों की पत्तियों को सुखाकर उसका पेस्ट अथवा गीला रंग बनाया जा सकता है.
<<*>> दो चम्मच हल्दी पावडर को दो लीटर पानी में उबालें, गाढ़ा पीला रंग बन जायेगा.
<<*>> दो लीटर पानी में 50 गेंदे के फ़ूलों को उबालने पर अच्छा पीला रंग प्राप्त होगा…

हरा रंग :-
<<*>> गुलमोहर, पालक, धनिया, पुदीना आदि की पत्तियों को सुखाकर और पीसकर हरे गुलाल के रूप में उपयोग किया जा सकता है.
<<*>> किसी भी आटे की बराबर मात्रा में हिना अथवा दूसरे हरे रंग मिलाकर भी हरे गुलाल के रूप में उपयोग किया जा सकता है.
<<*>> एक लीटर पानी में दो चम्मच मेहंदी को घोलने पर भी हरे रंग का प्राकृतिक विकल्प तैयार किया जा सकता है.

नीला :-
<<*>> एक लीटर गरम पानी में चुकन्दर को रात भर भिगोकर रखें और इस बैंगनी रंग को आवश्यकतानुसार गाढ़ा अथवा पतला किया जा सकता है.
<<*>> 15-20 प्याज़ के छिलकों को आधा लीटर पानी में उबालकर गुलाबी रंग प्राप्त किया जा सकता है.
<<*>> नीले गुलमोहर के फ़ूलों को सुखाकर उसके पावडर द्वारा तैयार घोल से भी अच्छा नीला रंग बनाया जा सकता है.
<<*>> नीले गुलमोहर की पत्तियों को सुखाकर बारीक पीसने पर नीला गुलाल भी बनाया जा सकता है.

भगवा रंग :-
<<*>> हल्दी पावडर और चन्दन पावडर को मिलाकर हल्का नारंगी पेस्ट बनाया जा सकता है.
<<*>> परम्परागत रूप से जंगलों में पाये जाने वाले टेसू के फ़ूलों को उबालकर भी नारंगी केसरिया रंग प्राप्त किया जाता है.

ऐसे खेलें होली :-
<<*>> अधिक से अधिक सूखे रंगों से होली खेलें, अधिक से अधिक प्राकृतिक रंगों से होली खेलें, आजकल प्राकृतिक रंग आसानी से बाजार में उपलब्ध होते हैं.
<<*>> होली खेलने से पहले पूरे शरीर और खासकर बालों पर अच्छी तरह से तेल मालिश कर लें या किसी लोशन का लेप लगा लें, इससे होली खेलने के बाद बालों और त्वचा का रंग छुड़ाने में आसानी होगी.
<<*>> होली खेलने से पहले नाखून को पॉलिश कर लें, ताकि होली खेलने के बाद भी वे वैसे ही चमकते हुए दिखेंगे और उसकी अधिक सफ़ाई नहीं करना पड़ेगी.
होली की शुभकामनाएं ..........

February 26, 2010

खंड-खंड होते देश में सुरक्षा के बढ़ते खतरे ?



(कमल सोनी)>>>> पूरी दुनिया में शायद भारत ही एक मात्र ऐसा देश है. जहाँ धर्मवाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद, नक्सलवाद और आतंकवाद अपने पैर पसार रहा है. और आज स्थिति यह है कि इसका नियंत्रण एक चुनौती बन गया है. परिणामस्वरूप एक ओर जहां देश टुकड़ों में बाँट रहा है. तो दूसरी ओर आतंरिक और बाहरी सुरक्षा के खतरे भी देश में बढ़ रहे हैं. एक तरफ चीन भारत में घुसपैठ की कोशिशों को अंजाम देता है तो दूसरी तरफ पकिस्तान सीमा पर गोलीबारी की आड लेकर आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम दे रहा है. इस मामले में बाग्लादेश भी पीछे नहीं है. इन सबके बावजूद देश के राजनेता सिवाय खोखली राजनीती के अलावा कोई ठोस कदम नहीं उठा रहे. बल्कि इसी धर्मवाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद, नक्सलवाद और आतंकवाद का सहारा ले अपने राजनैतिक स्वार्थ की रोटियां सेंकने में लगे हुए हैं. देश की जनता भी सब जानती है. अब वह जागरूक हो रही है. यही वजह है कि मुंबई में हुए आतंकी हमले के बाद जिस तरह से जनता इन राजनेताओं के खिलाफ सड़क पर उतरकर आई. लेकिन राजनेताओं ने इससे कोई सबक लिया इसके कोई प्रमाण अब तक नहीं मिले. धर्मवाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद पर राजनीती होती रही. आज भले ही वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने आतंरिक और बाहरी सुरक्षा के मद्देनज़र सिर्फ चार फीसदी बढ़ोतरी करते हुए बजट 2010-11 में रक्षा के लिए 1,47,344 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं. लेकिन सुरक्षा के दृष्टिकोण से बजट निर्धारित कर देना ही काफी नहीं होता. इसमें कोई दो मत नहीं कि आज हम जिस दुनिया में जी रहे हैं. वह पूरी तरह से अस्थिर है. और हम भी इस अस्थिरता के साये में जीने को मजबूर हैं.

आजादी के बाद 1947 में जिस नए भारत की कल्पना की गई थी. क्या आज हम उस कल्पना पर खरे उतरे हैं ? यह एक अहम सवाल है. इतने लंबे अरसे के बाद देश में 'एकता की भावना' खोती हुई नज़र आ रही है. परिणाम स्वरुप धर्मवाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद, नक्सलवाद जैसी समस्याएँ बढ़ीं हैं. लेकिन इनके समाधान के लिए ज़्यादा से ज़्यादा बंद कमरे में बैठकें आयोजित कर फैसले कर लिए जाते हैं. लेकिन इन फैसलों पर अमल नहीं किया जाता. बाबरी विध्वंस और गोधरा कांड जैसे गंभीर मामलों पर आयोग गठित कर दिए जाते हैं. और सालों की जाँच प्रक्रिया के बाद इन आयोगों की रिपोर्ट ही कटघरे में खड़ी हो जाती है. इन समस्याओं का एक मुख्य कारण यह भी रहा कि देश में जातीय और भाषाई अस्मिता पुनः सतह पर आ गई. जिसके बाद महाराष्ट्र में जातिवाद से प्रेरित नारे, जाती और क्षेत्रीयता के आधार पर लोगों से मारपीट, तेलंगाना मुद्दा इत्यादि उभर कर सामने आये. इन सबके बीच पड़ोसी मुल्कों से जेहाद के नाम पर देश में आतंकवाद को बढ़ावा देने से देश की आतंरिक और बाहरी सुरक्षा पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं. जिस विषय पर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है. देश में हिंदूवादी संगठनों का जन्म हों और उनका राजनितिक सपोर्ट होना भी कई सवाल जन्म लेता है. कुछ राजनेताओं का मानना है कि हिन्हुवादी संगठनो के जन्म के पीछे मुस्लिम आबादी में बढोत्तरी, पड़ोसी मुल्कों से गैरकानूनी घुसपैठ, और मुस्लिम अलगाववाद कारण रहे हैं. लेकिन इन सब का क्या ? कहीं न कहीं देश आतंरिक रूप से बंटता और कमजोर होता जा रहा है. धर्मवाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद को बढ़ावा मिल रहा है. और वोट बैंक की राजनीती अभी भी जारी है. कोई राजनैतिक दल प्रत्यक्ष रूप से धर्म, क्षेत्र और जाति का सहारा लेकर वोट बैंक की राजनीती कर रहा है. तो कोई अप्रत्यक्ष रूप से. लेकिन इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है देश के उस जनता को जो कमाने-खाने और आगे बढकर देश हित में कुछ करना चाहते हैं.

वोट बैंक की राजनीती का ही नतीजा है, कि पिछले दो दशकों में मुस्लिम समुदाय में से सबसे ज़्यादा संख्या में आतंकवादी और अलगाववादी उभरकर सामने आये हैं. मालेगांव धमाको के बाद एटीएस ने हिंदू आतंकवाद की बात कही थी. हिंदू आतंकवाद जैसी कोई चीज़ इस देश में है, या नहीं इस पर संदेह अभी भी बरकरार है. लेकिन कहीं न कहीं यह भी वोट बैंक की राजनीती का ही नतीज़ा है. इस बात में कोई संदेह नहीं कि देश में कुछ लोग जेहादी विचारधारा से प्रभावित हुए हैं. और देश में अपनी गतिविधियां चला रहे हैं. सिमी जैसे संगठन ऐसी ही विचारधारा की उपज है. लेकिन देश के आम मुस्लिम और इन जेहादियों में ज़मीन-आसमान का फर्क दिखता है. लेकिन इन सबसे दोनों समुदायों के बीच जो दरार पैदा हुई है. भले ही वह आतंकवाद न हो. लेकिन देश में सम्प्रदायिक विभाजन जैसी संभावनाएं ज़रूर उत्पन्न हुई हैं. इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता.

यहाँ बात हिंदू या मुस्लिम की ही नहीं है. भारत के ऊतर पूर्व के नगा क्षेत्रों में सबसे पहले अलगाववाद की आग लगी थी. जिसके बाद यह आसाम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल तक फ़ैली. इन क्षेत्रों में अलगाववाद के पीछे यहाँ के निवासियों की उपेक्षा तो है ही साथ ही पड़ोसी मुल्कों से इस चिंगारी को भडकाने में मदद भी हैं. आसाम भी वर्षों तक बंगलादेशी घुसपैठ, अल्फा विद्रोह और उसके विदेशी संबंधो के चलते अशांत रहा है. अब जम्मू काश्मीर है. हालांकि भारत-बंगलादेश के बीच हुए समझौते के बाद आसाम में स्थिति में कुछ सुधार हुआ है.

भारत के अंदर एक अलग भारत नहीं होना चाहिए. यह समस्या धीरे-धीरे विकराल रूप धारण करती जा रही है. इस समस्या का निदान नौकरशाही से नहीं हो सकता. अराजकता का क्रम अगर आगे चलता रहा. तो आने वाले समय में हमें और भी कई परेशानियों का सामना करना पड़ेगा, इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. आज भी भारत आर्थिक और सामाजिक तौर पर विभाजित है. दो धर्मो के बीच की खाई, शहरी और ग्रामीण जनता के बीच की खाई तथा क्षेत्रवाद की खाई को पाटना इतना आसान नहीं होगा. भारत में भले ही हाल ही के वर्षों में आर्थिक सुधारों ने रफ़्तार पकड़ी हो. लेकिन इसके अलावा दूसरे मोर्चे पर पर आतंरिक अराजकता के साथ बाहरी खतरे ने नई चिंताओं को जन्म दे दिया है. इन सभी समस्याओं का समाधन तभी संभव है जब कुशल राजनीतिक नेतृत्व, आर्थिक वृद्धी तथा सैन्य ताकत में बढोत्तरी के साथ-साथ नागरिकों की एकजुटता जो क्षेत्रवाद, धर्मवाद, और जातिवाद से परे हो.

February 22, 2010

डीएलएफ-आईपीएल : खेल या खेल का व्यावसाय ?

(कमल सोनी)>>>> डीएलएफ-आईपीएल एक खेल नहीं खिलवाड है. इसका सीधा अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब आईपीएल के तीसरे संस्करण के लिए बोली लगे जा रही थी. तब किसी भी टीम ने पाकिस्तानी खिलाडियों को नहीं चुना. यकीनन इससे पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड और पाकिस्तानी खिलाडियों की बेइज्जती हुई है. दरअसल भारत पकिस्तान के बीच मौजूदा तनाव की कीमत इन पाकिस्तानी खिलाडियों को चुकानी पडी है. लेकिन एक अहम सवाल यहाँ जन्म लेता है कि जिस देश में क्रिकेट एक जूनून की तरह है. वहाँ इस खेल को सरहदों में बांधना कितना उचित है. हलाकि इस खिलवाड की कीमत सिर्फ पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड और पाकिस्तानी खिलाडियों को ही नहीं चुकानी पडी. बल्कि शाहरुख, अमिताभ, आमिर खान, समेत कई बड़ी हस्तियों को भी इसकी कीमत चुकानी पडी. जब इस खिलवाड पर राजनीति हावी हुई. जिसके बाद शिवसेना ने वोट बैंक की राजनीती करनी शुरू की. और यह सिलसिला अभी भी जारी है. चारों तरफ से आरोप प्रत्यारोपों का दौर चल रहा है. और तमाम वॉलीवुड हस्तियों को शिवसैनिकों के गुस्से का सामना करना पड़ रहा है.

पाकिस्तानी खिलाडियों के साथ जो कुछ भी हुआ वह कम नहीं है. भारत पकिस्तान मौजूदा तनाव के मद्देनज़र पहले पाकिस्तानी खिलाडियों से पीसीबी से अनापत्ति प्रमाण पात्र लेन को कहा गया. जब उन्होंने अनापत्ति प्रमाण पत्र ले लिया. तो उनसे सरकार से एनओसी लें. खिलाडियों के एनओसी ले लेने के बाद उनसे कहा गया कि वे भारत से वीजा ले लें. जब उन्होंने वीजा के लिए आवेदन किया तो उन्हें कहा गया कि यदि उन्हें आईपीएल में चुन लिए जाएगा तो उन्हें वीजा मिल जायेगा. जिसके बाद आईपीएल ने ११ पाकिस्तानी खिलाडियों को उन खिलाडियों की सूची में शामिल कर लिया जिनकी बोली लगाईं जानी थी. जिसके बाद बोली लगी तो सभी पाकिस्तानी खिलाड़ी इस बात का इन्तेज़ार करते रहे कि कौन उन्हें खरीदेगा. लेकिन किसी भी पाकिस्तानी खिलाड़ी पर किसी भी टीम ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. यकीनन यह पाकिस्तानी खिलाडियों के लिए ही नहीं बल्कि एक खेल के लिए भी अपमानजनक है.

बीसीसीआई और टीम मालिकों ने झाडा पल्ला :- इस पूरे घटना क्रंम के बाद जब चौतरफा आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ तो बीसीसीआई और आईपीएल टीम मालिकों ने इस विवाद से अपना पल्ला झाड लिया. बीसीसीआई और आईपीएल टीम मालिक अलग अलग तर्क दे रहे हैं. बीसीसीआई का कहना है कि आईपीएल एक अलग संस्था है. उसका बीसीसीआई से कोई लेना देना नहीं है. आईपीएल के सभी फैसले लेने के लिए वह स्वतंत्र है. दूसरा टीम मालिकों ने भी अपने को शुद्ध व्यावसायी दर्शाते हुए कहा कि भारत पाकिस्तान के मौजूदा हालत यही दर्शाते हैं कि दोनों देशों के रिश्तों का कोई भरोसा नहीं. ऐसे में वे अपनी पूंजी ऐसे खिलाडियों पर नहीं लगा सकते जो उनके लिए असमय संकट पैदा कर दें. हलकी यह सच भी है कि टेम मालिकों के लिए आईपीएल सिर्फ एक टूर्नामेंट न होकर एक धंधा है. और धंधे में भावनाओं की नहीं सिर्फ मुनाफे की जगह होती है. उन्हें किसी खिलाड़ी के जस्बात और किसी देश के अपमान से कोई मतलब नहीं. ऐसे में पाकिस्तानी क्रिकेटरों के साथ सहानुभूति के अलावा उनके पास कुछ और नहीं था. खेल मंत्री एमएस गिल ने भी आईपीएल को क्रिकेट में एक व्यापारिक आंदोलन करार देते हुए यह कह दिया कि सरकार इसमें कुछ नहीं कह सकती. हालाकि गृह मंत्री पी चिदंबरम ने अपने एक बयान में कहा था कि आईपीएल में पाकिस्तानी खिलाडियों को मौक़ा दिया जाना चाहिए था. इस कदम से क्रिकेट का नुक्सान हुआ है.

पहले से नहीं की स्थिति साफ़ :- मुबई हमलों के बाद पहले ही साफ कर दिया गया था कि पाकिस्तानी खिलाडियों की खेल पाना संभव नहीं होगा. लिहाजा बगैर पाकिस्तानी खिलाडियों के आईपीएल साउथ अफ्रिका में अपनी पूरी चमक धमक के साथ संपन्न हुआ. लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ. यदि आईपीएल की तरफ से पहले ही यह कह दिया जाता कि किसी भी पाकिस्तानी खिलाड़ी को आईपीएल में खेलने की अनुमति नहीं मिलेगी. तो शायद यह विवादास्पद स्थिति निर्मित नहीं होती. हलाकि पाकिस्तानी खिलाडियों के बिना अब यह तमाशा कितनी चमक धमक के साथ होगा यह देखना बेहद दिलचस्प होगा.

बहलहाल भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में पहले भी कडूआहट और मिठास का सिलसिला चलता रहा है. और आगे भी चलता रहेगा. जब कभी कोई बड़ा आतंकी हमला होता है. भारत पाकिस्तान के रिश्तों में कडूआहट आ जाती है. और समय के साथ बातचीत का दौर भी शुरू हो जाता है. फिर कभी भारत पकिस्तान मैत्री मैच खेल दोनों देशों में मधुरता लाने का प्रयास करते हैं. लेकिन फिर इन प्रयासों पर आतंकी संगठन पानी फेर देते हैं. और दोनों देशों के बीच कडूआहट आ जाती है. लेकिन दोनों देशो के बीच की इस तपिश को राजनीतिक रंग न देते हुए इसे मैदान से दूर रखा जाना चाहिए. क्योंकि अभी राष्ट्र मंडल खेलों का आयोजन होगा वहाँ भी पाकिस्तानी टीम आयेगी. इसके बाद क्रिकेट वर्ल्ड कप आयोजन भी भारत में ही होना है. इसके लिए भी पाकिस्तानी क्रिकेट टीम आयेगी. इसीलिये यह ज़रूरी है कि यदि कहीं कि आग जल रही है. तो खोखली राजनीति से प्रेरित होकर उस पर घी डालने के बजाय उस पर पानी डाला जाए तो ज़्यादा बेहतर होगा.

February 20, 2010

असिस्टेड सुसाइड, 'ह्त्या या मदद' ?


(कमल सोनी)>>>> किसी को आत्महत्या में मदद करना 'हत्या है या फिर सहायता' इस विषय पर एक नई बहस छिड़ गई है. असिस्टेड सुसाइड को लेकर इसके समर्थकों और विरोधियों में वैचारिक मतभेद उभरकर सामने आये हैं. आत्म ह्त्या में मदद करने वाले भाले ही अपने परिचितों, रिश्तेदारों और दोस्तों की मौत आसान बना रहे हों. लेकिन इसको लेकर कई विवाद हैं. लोगों का यह भी कहना है कि असिस्टेड सुसाइड एक ह्त्या है. लोगों का कहना है कि असिस्टेड सुसाइड को कानूनी मान्यता मिल जाने पर इसका दुरुपयोग होने लगेगा. और अपराधी इस कानून का सहारा लेकर बच निकलेंगे. हालाकिं विश्व में कई देश ऐसे हैं. जहां असिस्टेड सुसाइड को कानूनी मान्यता है. स्विटज़र लैंड को इस मामले में सबसे आगे जाना जाता है. इसके अलावा बेल्जियम, कनाडा, चीन और अमेरिका में भी असिस्टेड सुसाइड को कानूनी मान्यता है. इसके अलावा दुनिया भर की कई संस्थाएं भी असिस्टेड सुसाइड का समर्थन करती हैं.

असिस्टेड सुसाइड सही या गलत :- असिस्टेड सुसाइड यानी आत्म ह्त्या में मदद करना सही है या गलत इसको लेकर विवाद है. विवाद का मुख्य कारण एक निजी समाचार चैनल की एंकर गोसलिंग है . जिसने अपने प्रेमी को आत्महत्या में मदद की थी. गोसलिंग ने स्वीकार किया है कि उन्होंने दर्द से पीड़ित प्रेमी को आत्महत्या में मदद कर उसे हमेशा के लिए राहत दी है. मामला यह है कि गोसलिंग का प्रेमी घातक बीमारी एड्स से पीड़ित था. गोसलिंग का कहना है कि "कुछ समय पहले मेरे प्रेमी ने मुझसे एग्रीमेंट किया था. जिसमें लिखा है कि जब उसे बहुत दर्द हो और मौत के अलावा कोई रास्ता न हो तो में उसे मौत की नींद सुला दूं. और मैंने जो कुछ भी किया एग्रीमेंट के तहत किया."

असिस्टेड सुसाइड को लेकर कोई सहमति दर्शा रहा है तो कोई असहमत हैं. नेशनल काउन्सिल फॉर पैलियातिव केयर, एज कंसर्न, हेल्प द होस्पीशीज इत्यादि के किये गए सर्वे में ३७३३ डॉ. को शामिल किया गया. जिसमें ६५ फेआसदी डॉ. ने आत्महत्या में मदद को गलत करार दिया है. उन्होंने यह भी कहा कि इसे कानूनी मान्यता दिया जाना गलत है. वहीं दूसरी और अमेरिका में १५६० नर्सों पर किये गए सर्वे में यह तथ्य निकलकर सामने आया है कि "दर्द से मौत के करीब पहुंचे मरीज़ के लिए यह सही है. उनका कहना है कि गंभीर रूप से बीमार, और मरणासन्न स्थिति में यदि कोई मरीज हो. या फिर उसके शारीरिक अंगों एन काम करना बंद कर दिया हो ऐसी स्थिति में उसे दर्द से छुटकारा दिलाना पाप नहीं है. कुछ लोगों ने असिस्टेड सुसाइड को "ह्त्या का लाइसेंस" करार दिया है.

कई देशो में है कानूनी मान्यता :- बेल्जियम में सुसाइड के लिए आवेदन कर अनुमति मंगाने के इजाजत है. वह व्यक्ति जो बीमार है, और वयस्क है और उसकी बीमारी का कोई उपचार न हो सकता हो, ऐसी स्थिति में यदि मरीज के साथ दो डॉ. सहमती प्रमाण पत्र दे. तो असिस्टेड सुसाइड की अनुमति मिल सकती है. विपरीत कनाडा में भी असिस्टेड सुसाइड और सुसाइड करना जुर्म नहीं है बल्कि अपने शरीर को किसी तरह की कोई क्षति पहुँचाना अपराध ज़रूर है. वहीं चीन तथा अमेरिका के तीन राज्यों में भी असिस्टेड सुसाइड के लिए अनुमति लेने का प्रावधान है. इन मामलों में स्विट्जरलैंड सबसे आगे है. लोग जाकर मर्सी किलिंग, असिस्टेड सुसाइड, सुसाइड के लिए स्विट्जरलैंड जाते हैं. यही वजह है कि स्विट्जरलैंड को दुनिया का सुसाइड पॉइंट कहा जाता है.

बदल सकता है आत्महत्या का मददगार कानून :- स्विट्जरलैंड सरकार जल्द ही अपने देश के एक विवादित कानून में संशोधन कर सकती है जिसके तहत लोगों को आत्महत्या करने में मदद मिलती है। सरकार ने अब इसमें बदलाव की ठान ली है और संशोधन के प्रस्ताव पेश किए जा रहे हैं। दरअसल, इस नीति के तहत गम्भीर रूप से बीमार लोगों को डॉक्टरी सलाह पर आत्महत्या करने का हक दिया गया है। लेकिन इसकी आड़ में ऎसे लोगों को अपना जीवन खत्म करने में मदद की जा रही है जो गम्भीर रोगी नहीं हैं।

इस विषय में आपके क्या विचार हैं ?