April 17, 2010

'विश्व धरोहर दिवस' (18 अप्रैल विशेष)

* ऐतिहासिक महत्त्व को समझाता 'विश्व धरोहर दिवस'
(कमल सोनी)>>>> 18 अप्रैल को पूरे विश्व में विश्व धरोहर दिवस मनाया जाता है. इस दिवस को मानाने का मुख्य उद्देश्य भी यहे है कि पूरी दुनिया में ऐतिहासिक महत्व की धरोहरों के संरक्षण के प्रति जागरूकता लाइ जा सके. धरोहर अर्थात मानवता के लिए अत्यंत महत्व की जगह, जो आगे आने वाली पीढि़यों के लिए बचाकर रखी जाएँ, उन्हें विश्व धरोहर स्थल के रूप में जाना जाता है. ऐसे महत्वपूर्ण स्थलों के संरक्षण की पहल यूनेस्को ने की थी. जिसके बाद एक अंतर्राष्ट्रीय संधि जो कि विश्व सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर संरक्षण की बात करती है के 1972 में लागू की गई. तब विश्व भरा के धरोहर स्थलों को मुख्यतः तीन श्रेणियों में शामिल किया गया. पहला प्राकृतिक धरोहर स्थल, दूसरा सांस्कृतिक धरोहर स्थल और तीसरा मिश्रित धरोहर स्थल. इनके बारे में हम आगे बात करेंगे. लेकिन पहले यह जन लें कि विश्व धरोहर दिवस की शुरुआत कब हुई. विश्व धरोहर दिवस की शुरुआत 18 अप्रैल 1982 को हुई थी जब इकोमास संस्था ने टयूनिशिया में अंतरराष्ट्रीय स्मारक और स्थल दिवस का आयोजन किया. इस कार्यक्रम में कहा गया कि दुनियाभर में समानांतर रूका से इस दिवस का आयोजन होना चाहिए. इस विचार का यूनेस्को के महासम्मेलन में भी अनुमोदन कर दिया गया और नवम्बर 1983 से 18 अप्रैल को विश्व धरोहर दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की गई.

विश्व धरोहरों में भारत महत्वपूर्ण स्थान पर :- विश्व धरोहरों के मामले में भारत का दुनिया में महत्वपूर्ण स्थान है और यहां के ढाई दर्जन से अधिक ऐतिहासिक स्थल, स्मारक और प्राचीन इमारतें यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल हैं. हर साल 18 अप्रैल को मनाया जाने वाला विश्व धरोहर दिवस 26 साल से निरंतर विश्व की अद्भुत, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों के महत्व को दर्शाता रहा है. भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों का जिक्र करें तो ऐसे बहुत से स्थानों का नाम जहन में आता है जिन्हें विश्व धरोहर सूची में महत्वपूर्ण स्थान हासिल है लेकिन मुहब्ब्त के प्रतीक ताजमहल और मुगलकालीन शिल्प की दास्तां बयान करने वाले दिल्ली के लालकिले ने इस सूची को भारत की ओर से और भी खूबसूरत बना दिया है. ताजमहल को पिछले वर्ष कराए गए एक विश्वव्यापी मतसंग्रह के दौरान दुनिया के सात अजूबों में अव्वल नंबर कार रखा गया था. विश्व धरोहर सूची में शामिल भारत की अजंता की गुफाएं 200 साल पूर्व की कहानी कहती नजर आती हैं लेकिन इतिहास के कान्नों में धीरे-धीरे ये भुला दी गईं और बाद में बाघों का शिकार करने वाली एक ब्रिटिश टीम ने इनकी फिर खोज की. विश्व धरोहर सूची में शामिल एलोरा की गुफाएं दुनिया भर को भारत की हिन्दू, बौध्द और जैन संस्कृति की कहानी बताती हैं. ये गुफाएं लोगों को 600 और 1000 ईस्वीं के बीच के इतिहास से रूबरू कराती हैं. भारत को विश्व धरोहर सूची में 14 नवंबर 1977 में स्थान मिला. तब से अब तक 27 भारतीय स्थलों को विश्व धरोहर स्थल के रूप में घोषित किया जा चुका है. इसके अलावा फूलों की घाटी को नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क के एक भाग रूप में इस सूची में शामिल कर लिया गया है.

ऐतिहासिक दिल्ली :- दिल्ली की संस्कृति यहां के लंबे इतिहास और भारत की राजधानी रूप में ऐतिहासिक स्थिति से पूर्ण प्रभावित रहा है. यह शहर में बने कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्मारकों से विदित है. भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग ने दिल्ली शहर में लगभग 1200 धरोहर स्थल घोषित किए हैं, जो कि विश्व में किसी भी शहर से कहीं अधिक है. और इनमें से 175 स्थल राष्ट्रीय धरोहर स्थल घोषित किए हैं. पुराना शहर वह स्थान है, जहां मुगलों और तुर्क शासकों ने कई स्थापत्य के नमूने खडए किए हैं, जैसे जामा मस्जिद (भारत की सबसे बड़ी मस्जिद) और लाल किला. दिल्ली में फिल्हाल तीन विश्व धरोहर स्थल हैं – लाल किला, कुतुब मीनार और हुमायुं का मकबरा. अन्य स्मारकों में इंडिया गेट, जंतर मंतर (१८वीं सदी की खगोलशास्त्रीय वेधशाला), पुराना किला (१६वीं सदी का किला). बिरला मंदिर, अक्षरधाम मंदिर और कमल मंदिर आधुनिक स्थापत्यकला के उदाहरण हैं.

आगरा का किला :- आगरा का किला एक यूनेस्को घोषित विश्व धरोहर स्थल है, जो कि भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के आगरा शहर में स्थित है। इसे लाल किला भी कहा जाता है। इसके लगभग 2.5 कि.मी. उत्तर-पश्चिम में ही, विश्व प्रसिद्ध स्मारक ताज महल स्थित है। इस किले को चहारदीवारी से घिरी प्रासाद (महल) नगरी कहना बेहतर होगा। यह भारत का सबसे महत्वपूर्ण किला है। भारत के मुगल सम्राट बाबर, हुमायुं, अकबर, जहांगीर, शाहजहां व औरंगज़ेब यहां रहा करते थे, व यहीं से पूरे भारत पर शासन किया करते थे। यहां राज्य का सर्वाधिक खजाना, सम्पत्ति व टकसाल थी। यहां विदेशी राजदूत, यात्री व उच्च पदस्थ लोगों का आना जाना लगा रहता था, जिन्होंने भारत के इतिहास को रचा।

साँची का स्तूप :- सांची भारत के मध्य प्रदेश राज्य के रायसेन जिले, में स्थित एक छोटा सा गांव है। यह भोपाल से ४६ कि.मी. पूर्वोत्तर में, तथा बेसनगर और विदिशा से १० कि.मी. की दूरी पर मध्य-प्रदेश के मध्य भाग में स्थित है। यहां कई बौद्ध स्मारक हैं, जो तीसरी शताब्दी ई.पू से बारहवीं शताब्दी के बीच के काल के हैं। सांची में रायसेन जिले की एक नगर पंचायत है। यहीं एक महान स्तूप स्थित है। इस स्तूप को घेरे हुए कई तोरण भी बने हैं। यह प्रेम, शांति, विश्वास और साहस के प्रतीक हैं। सांची का महान मुख्य स्तूप, मूलतः सम्राट अशोक महान ने तीसरी शती, ई.पू. में बनवाया था। इसके केन्द्र में एक अर्धगोलाकार ईंट निर्मित ढांचा था, जिसमें भगवान बुद्ध के कुछ अवशेष रखे थे। इसके शिखर पर स्मारक को दिये गये ऊंचे सम्मान का प्रतीक रूपी एक छत्र था।

विश्व धरोहर में शामिल हो सकता है मध्यप्रदेश का भोजपुर शिवालय :- भोजपुर के शिव मंदिर का नाम जल्दी ही वर्ल्‍ड हेरिटेज में जुड़ सकता है. अगर ऐसा होता है, तो मध्‍यप्रदेश और भारत की कीर्ति में भी वृद्धि होगी. अब जबकि भोजपुर के शिव मंदिर को भी विश्व धरोहर में शामिल करने की कवायद तेज हो चली है, ऐसे में अगर यूनेस्को की मुहर इस पर लग जाती है, तो रायसेन जिला विश्व का एकमात्र ऐसा जिला होगा, जिसमें तीन विश्व धरोहरें होंगी. चंदेल वंश के राजा भोज द्वारा ग्यारहवीं शताब्दी में निर्मित भोजपुर का शिव मंदिर एक ऐतिहासिक धरोहर है. भोजपुर मंदिर की देखरेख कर रहे पुरातत्व अधिकारियों द्वारा 29 जनवरी को एक प्रस्ताव तैयार कर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई), नई दिल्ली को भेजा गया है. इसमें प्रमुख रूप से इस बात को दर्शाया गया है कि इस तरह का अनूठा शिव मंदिर विश्‍व में इकलौता है. इतना विशाल शिवलिंग दुनिया भर में कहीं नहीं है. शिव मंदिर में रोजाना औसतन तीन से चार हजार पर्यटक एवं श्रद्धालु दर्शन के लिए आते है. छुट्टी के दिन यह तादाद बढ़ कर पांच हजार तक हो जाती है. भोजपुर का शिव मंदिर अगर विश्व धरोहर में शामिल हो जाता है, तो रायसेन जिले का नक्‍शा ही बदल जायगा क्योंकि जिले में दो विश्व धरोहर पूर्व से ही मौजूद हैं. इसमें सांची एंव भीमबैठका के जिले में स्थित होने के कारण विश्‍व पटल पर अपनी अलग पहचान कायम करने वाले रायसेन जिले के राजस्व में बढ़ोतरी होगी. वर्ल्‍ड हेरिटेज में भोजपुर शिवालय को शामिल कराए जाने के प्रयासों के मद्देनजर मंदिर के आस-पास अतिक्रमण को हटाया जाएगा.

ग्‍यारहवीं शताब्‍दी में हुआ निर्माण :- महाभारत में वर्णित पवित्र वेतवा नदी के तट पर स्थित इस मंदिर का निर्माण ग्यारहवीं शताब्‍दी में चंदेश राजा भोज ने कराया था. विश्व में सर्वाधिक विशालकाय इस शिवलिंग की ऊचांई लगभग 22 फीट और जलेहरी 12X12 फीट की आंकी गई है. 600 फीट लंबाई का मिट्टी से निर्मित रपटा, जो मंदिर से सटा हुआ है, अब तक पूर्ण रूप से सुरक्षित है. उत्‍कीर्ण चट्टानें दुनिया भर में केवल इस मंदिर के अंदर है, जिनमें मंदिर निर्माण के समय का मंदिर का डिजाईन मंदिर के अंदर चट्टान पर अब भी स्पष्‍ट दिखाई देता है. इतना विशाल शिवलिंग भारत ही नहीं, वल्कि दुनिया में भी कहीं नहीं है.

धरोहरों की श्रेणियाँ :- विश्व की धरोहरों को मुख्यतः तीन श्रेणियों में बांटा गया है. पहला प्राकृतिक धरोहर स्थल, दूसरा सांस्कृतिक धरोहर स्थल और तीसरा मिश्रित धरोहर स्थल.

(१) प्राकृतिक धरोहर स्थल - ऐसी धरोहर भौतिक या भौगोलिक प्राकृतिक निर्माण का परिणाम या भौतिक और भौगोलिक दृष्टि से अत्यंत सुंदर या वैज्ञानिक महत्व की जगह या भौतिक और भौगोलिक महत्व वाली यह जगह किसी विलुप्ति के कगार पर खड़े जीव या वनस्पति का प्राकृतिक आवास हो सकती है.

(२) सांस्कृतिक धरोहर स्थल - इस श्रेणी की धरोहर में स्मारक, स्थापत्य की इमारतें, मूर्तिकारी, चित्रकारी, स्थापत्य की झलक वाले, शिलालेख, गुफा आवास और वैश्विक महत्व वाले स्थान; इमारतों का समूह, अकेली इमारतें या आपस में संबद्ध इमारतों का समूह; स्थापत्य में किया मानव का काम या प्रकृति और मानव के संयुक्त प्रयास का प्रतिफल, जो कि ऐतिहासिक, सौंदर्य, जातीय, मानवविज्ञान या वैश्विक दृष्टि से महत्व की हो, शामिल की जाती हैं.

(३) मिश्रित धरोहर स्थल - इस श्रेणी के अंतर्गत् वह धरोहर स्थल आते हैं जो कि प्राकृतिक और सांस्कृतिक दोनों ही रूपों में महत्वपूर्ण होती हैं.

यूनेस्को द्वारा स्वीकृत भारत के विश्व धरोहर स्थल :- भारत को विश्व धरोहर सूची में 14 नवंबर 1977 में स्थान मिला. तब से अब तक २७ भारतीय स्थलों को विश्व धरोहर स्थल के रूप में घोषित किया जा चुका है. आने वाले समय में कुछ और धरोहरों को विश्व धरोहार की सूची में स्थान मिल सकता है.

<<>> आगरे का किला, उत्तर प्रदेश
<<>> अजंता की गुफाएँ, महाराष्ट्र
<<>> साँची के बौद्ध स्तूप, मध्य प्रदेश
<<>> चंपानेर पावागढ का पुरातत्व पार्क, गुजरात
<<>> छत्रपति शिवाजी टर्मिनस, महाराष्ट्र
<<>> गोवा के पुराने चर्च गोवा
<<>> एलीफैन्टा की गुफाएँ, महाराष्ट्र
<<>> एलोरा की गुफाएँ, महाराष्ट्र
<<>> फतेहपुर सीकरी, उत्तर प्रदेश
<<>> चोल मंदिर, तमिलनाडु
<<>> हम्पी के स्मारक, कर्नाटक
<<>> महाबलीपुरम के स्मारक, तमिलनाडु
<<>> पट्टाडक्कल के स्मारक, कर्नाटक
<<>> हुमायुँ का मकबरा दिल्ली
<<>> काजीरंगा राष्ट्रीय अभ्यारण्य, असम
<<>> केवलदेव राष्ट्रीय अभ्यारण्य, राजस्थान
<<>> खजुराहो के मंदिर एवं स्मारक, मध्य प्रदेश
<<>> महाबोधी मंदिर, बोधगया, बिहार
<<>> मानस राष्ट्रीय अभ्यारण्य, असम
<<>> भारतीय पर्वतीय रेल पश्चिम बंगाल
<<>> नंदादेवी राष्ट्रीय अभ्यारण्य एवं फूलों की घाटी, उत्तरांचल
<<>> कुतुब मीनार, दिल्ली
<<>> भीमबटेका, मध्य प्रदेश
<<>> लाल किला, दिल्ली
<<>> कोणार्क मंदिर, उड़ीसा
<<>> सुंदरवन राष्ट्रीय अभ्यारण्य, पश्चिम बंगाल
<<>> ताजमहल, उत्तर प्रदेश

April 12, 2010

राईट टू एजुकेशन: क्या बच्चों को दिला पायेगा शिक्षा का अधिकार ?


* पैसा आया आड़े, राज्यों ने फैलाए हाथ ?
(कमल सोनी)>>>> चाहे केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकारें एक तरफ तो शिक्षा के लिए धन की कमी नहीं आने देने के बात कहती हैं तो दूसरी तरफ राईट टू एजुकेशन क़ानून को लागू करने में धन के अभाव की बात कहते हुए केन्द्र और राज्य सरकारे आमने सामने खादी है. राईट टू एजुकेशन एक्ट 1 अप्रैल से पूरे भारत में लागू तो हो गया. साथ ही शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू होने के बाद भारत उन 130 से अधिक देशों की सूची में शामिल भी हो गया है, जो बच्चों को नि:शुल्क और आवश्यक शिक्षा उपलब्ध कराने की कानूनी गारंटी प्रदान करते हैं. लेकिन अब सरकार के सामने नई चुनौतियां सामने आने लगीं हैं. देश के राज्यों ने पैसे का आभाव बताते हुए केंद्र के सामने अरबों रुपये की मांग कर दी है. मध्यप्रदेश समेत देश के ११ राज्यों ने केन्द्र से पैसों की मांग की है. परिणामस्वरूप केन्द्र सरकार को इस क़ानून को लागू करवाने में पसीना आ रहा है. वैसे भी शिक्षा अधोसंरचना में कमी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है लेकिन राज्यों का केन्द्र के सामने हाथ फैलाना राईट टू एजुकेशन एक्ट की रह में रोडे अटका रहा है. हालांकि सभी राज्य सरकारें इस क़ानून को लागू करवाने के लिए केंद्र सरकार के साथ होने के बात कर रही हैं लेकिन धन का आभाव बताते हुए असमर्थता भी व्यक्त कर रही हैं. राज्यों का कहना है कि इस कानून को लागू करने में होने वाले खर्च में केन्द्र अपना प्रस्तावित हिस्सा ५५ प्रतिशत से बढ़ाकर ७५-९० प्रतिशत के बीच रखे. बिहार का तो यह कहना है कि केन्द्र शत प्रतिशत राशि वाहन करे. एक अनुमान के मुताबिक़ इस ऐतिहासिक क़ानून को लागू करने में आने वाले पांच सालों में १.७१ लाख करोड रुपये का खर्च आएगा. यहे मुख्य वजह है कि राज्य सरकारों ने केन्द्र के सामने हाथ फैलाये हैं.

क्या हैं चुनौतियां :- क्या सिर्फ कानून बन जाने से देश भर के बच्चों की मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का रास्ता तय हो जाएगा ? निश्चित रूप से नहीं. और फिर यदि देश में कानून बनाने और उसके अमल करने के इतिहास पर गौर करें तो भय सिर्फ इसी बात का लगता है कि कहीं यह क़ानून भी कागजों में ही न रह जाए. शिक्षा का अधिकार कानून लागू होते ही सरकार के सामने नई नई चुनौतियां है. 1५ लाख नए शिक्षकों की भर्ती, नए स्कूल बनाना, स्कूलों में क्लासरूम बढ़ाना, शिक्षकों को प्रशिक्षण देना, निजी स्कूलों के लिए क़ानून को सख्ती से लागू करना. देश के दूर दराज़ के इलाके जहां शिक्षा का परिदृश्य और वहा की जमीनी हकीकत किसी से छिपी नहीं हैं वहाँ क़ानून का सख्ती से पालन करवाना. अपने आप में किसी चुनौती से कम नहीं है. इतना ही नहीं दूर दराज़ के क्षेत्रों की शालाओं में शिक्षकों की अनुपस्थिति, अभिभावकों की उदासीनता, सही पाठय़क्रम का अभाव, अध्यापन में खामियां, अव्यवस्था, भ्रष्टाचार इत्यादि कई खामियां है जो राईट टू एजुकेशन एक्ट के अमल में रोडे अटका सकती हैं. भले ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यह कह दिया हो कि 'सब हो जाएगा और कानून के अमल में धन की कमी आड़े नहीं आने दी जाएगी' लेकिन यकीन जाने तो चुनौतियों की सूची बहुत लंबी है. और फिर शिक्षा के लिए बजट में इतना प्रावधान करना सरकार भी सरकार के लिए इतना आसान नहीं होगा.

सरकार ने भी स्वीकारी चुनौतिया :- अब एक अहम सवाल यह उठता है कि क्या यह कानून वास्तव में हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार दिला पायेगा ? राईट टू एजुकेशन एक्ट महज़ लागू कर देना ही काफी नहीं है. सरकार के समक्ष इसके अमल का असली इम्तिहान तो अब शुरू हो गया है. स्वयं मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल भी इसे बड़ी चुनौती माना है. उन्होंने कहा, 'सभी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना बड़ी चुनौती है. इसीलिए अब हर राज्य के शिक्षा सचिवों को अलग-अलग बुला कर उनसे मशविरा किया जाएगा.' केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल का दावा तो यह है कि इससे देश के करीब एक करोड़ बच्चों को फायदा होगा. उनके अनुसार इससे छह से 14 वर्ष के बीच की उम्र के इन बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा पाने का अधिकार मिल जाने से शिक्षा हासिल करके अपनी और अपने परिवार की गरीबी दूर करने और विकास की मुख्यधारा में शामिल हो पाने का नया अवसर मिलेगा. मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 को लागू करने की जिम्मेदारी केंद्र और राज्य सरकारों के अलावा न्यायपालिका और शैक्षिक प्रशासन की भी होगी.

क्या कह रहे हैं राज्य :-

राजस्थान :- प्रमुख सचिव स्कूल शिक्षा डॉ. ललित पवारने कहा कि राज्य धनराशी की भागीदारी में ७५:२५ की भागीदारी चाहता है.
गुजरात :- शिक्षामंत्री रमनलाल वोरा ने कहा कि राज्यों को फंडिग में ४५ प्रतिशत की भागीदारी के लिए कहने का कोई मतलब नहीं है, फंडिग ७५:२५ के अनुपात में होनी चाहिए.
महाराष्ट्र :-कानून को लागू करने के लिए तैयार है. राज्य में पर्याप्त संख्या में मानावाबल उपलब्ध है तथा यहाँ शिक्षको की कमी की कोई विशेष समस्या नहीं है. इससे ६ से १४ वर्ष की आयु के लगभग १.३७ लाख बच्चो को फ़ायदा मिलेगा जो कभी स्कूल नहीं गए है.
मध्यप्रदेश :- शिक्षा को अनिवार्य करने के लिए राज्य को १३ हजार करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी. यह राशि केंद्र सरकार को बहन करनी चाहिए. प्रदेश में इसके लिए १.२५ लाख अतिरिक्त शिक्षको की भी जरुरत होगी.
तमिलनाडू :- स्कूल शिक्षा थंगम थेनारासु के अनुसार शिक्षको की कोई कमी नहीं है. राज्य को सिर्फ एक हजार और शिक्षको की आवश्यकता होगी.
अरुणाचल प्रदेश : शिक्षामंत्री बोसीराम सिराम के अनुसार अच्छे शिक्षको की कमी एक बड़ी समस्या है.
उतरप्रदेश :- मुख्यमंत्री मायावती ने केंद्र पर आरोप लगाया है. कि कानून को लागू करने के लिए धन की व्यवस्था न कर केंद्र इस कानून को लागू करने में व्यावहारिक दिक्कतों को अनदेखा कर रहा है. राज्य के वित्तीय हालात ऐसे नहीं है. कि कानून को लागू करने की लागत को वहन कर सके.
बिहार :- इस अधिनियम को लागू करने के लिए बिहार को ३.३० लाख और शिक्षको तथा १.८ लाख अतिरिक्त क्लासरुम्स की आवश्यकता होगे. मानव संसाधन मंत्री कानून को लागू करने के लिए राज्य को २० हजार करोड़ की जरुरत होगी.
पश्चिम बंगाल :- शिक्षा मंत्री पार्थ डे का कहना है कि हम केंद्र-राज्य में ७५:२५ अनुपात की भागीदारी चाहते है. सरकार एक लाख शिक्षको की भर्ती कर रही है तथा ५०% भर्ती हो चुकी है. निजी स्कूलों का रोना रोया कि हम उन्हें कोटा आरक्षण के लिए बाध्य नहीं कर सकते.
उडीसा :- स्कूल शिक्षा मंत्री प्रताप की मांग है कि फंडिंग ९०:१० के अनुपात में की जाए. इस कानून को लागू करने के लिए उड़ीसा को १६०० करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी. उड़ीसा जैसा गरीब राज्य इस धनराशि को वहन नहीं कर सकता.
आन्ध्र प्रदेश :- राज्य के शिक्षा मंत्री डीएमवी प्रसाद राव ने कहा हम कानून लागू करने के लिए तैयार है. राज्य में शिक्षको की कोई कमी नहीं है क्योकि कुछ स्थानों में उनकी अधिकता है.

क्या है शिक्षा का अधिकार कानून :- भारत आज विश्व की एक प्रमुख आर्थिक महाशक्ति है. चीन के बाद सबसे तेज आर्थिक विकास दर हमारी है. हमारे यहाँ दुनिया का दूसरे नंबर का सबसे बड़ा और गतिशील व मजबूत उपभोक्ता बाजार मौजूद है. इन तमाम तमगों के बीच अशिक्षा हमारी एक बड़ी भयावह सच्चाई है. अब एक अप्रैल से देश के 6-14 आयुवर्ग के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देना कानूनी रुप से सरकार के लिए जरुरी हो जाएगा. यह सब कुछ संभव हो रहा है बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार एक्ट-2009 की वजह से. केंद्र सरकार ने इस बिल पर पिछले साल ही अपनी मुहर लगा दी थी और तय किया था कि एक अप्रैल 2010 को इसे पूरे देश में लागू कर दिया जाएगा. अनामांकित एवं शाला से बाहर बच्चों के लिए विशेष प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की जायेगी. किसी भी बच्चे को कक्षा 8 तक फेल करने पर प्रतिबंध भी लगा दिया गया है. तो दूसरी और शिक्षा सत्र के दौरान कभी भी प्रवेश दिया जाएगा. यह कानून स्कूलों में शिक्षक और छात्रों के अनुपात को सुधारने की बात करता है. मसलन अभी कई स्कूलों में सौ-सौ बच्चों पर एक ही शिक्षक हैं. लेकिन इस कानून में प्रावधन है कि एक शिक्षक पर 40 से अधिक छात्र नहीं होंगे. शालाओं में बच्चों को शारीरिक दण्ड देने एवं मानसिक रूप से प्रताड़ित करना पूर्णत: प्रतिबंधित कर दिया गया है. इस कानून के अनुसार राज्य सरकारों को बच्चों की आवश्यकता का ध्यान रखते हुए लाइब्रेरी, क्लासरुम, खेल का मैदान और अन्य जरूरी चीज उपलब्ध कराना होगा. शिक्षकों का गैर शिक्षकीय कार्य में लगाना प्रतिबंधित कर दिया गया है. यानि अब शिक्षकों को गैर शिक्षकीय कार्यों में नहीं लगाया जायेगा. कानून के मुताबिक बिना मान्यता के किसी भी स्कूल का संचालन नहीं होगा.

क्या है क़ानून में कमियां :- शिक्षा विदों का कहना है कि इस कानून में 0-6 आयुवर्ग और 14-18 के आयुवर्ग के बीच के बच्चों की बात नहीं कई गई है. जबकि संविधान के अनुछेच्द 45 में साफ शब्दों में कहा गया है कि संविधान के लागू होने के दस साल के अंदर सरकार 0-14 वर्ग के आयुवर्ग के बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा देगी. हालांकि यह आज तक नहीं हो पाया. वहीं अंतराष्ट्रीय बाल अधिकार समझौते के अनुसार 18 साल तक की उम्र तक के बच्चों को बच्चा माना गया है. जिसे 142 देशों ने भी स्वीकार किया है. भारत भी उनमें से एक है. ऐसे में 14-18 आयुवर्ग के बच्चों को शिक्षा की बात इस कानून में क्यों नहीं कई गई है ? वहीं दूसरी और इस कानून पर जानकारी के अभाव में असमंजस की स्थिति भी बनी हुई है. और कुछ सवाल हैं जिनके उत्तर उन्हें ढूंढे नहीं मिल रहे. जैसे स्कूल में किन बच्चों को मुफ्त में पढ़ाना है, इसका खर्च क्या सरकार देगी और देगी भी तो कैसे और कितना. २५ फीसदी बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने का प्रावधान कानून में है तो क्या क्लास में बच्चों की संख्या बढ़ानी है या पहले की तरह ही यथावत रखनी है. ऐसे कई सवाल स्कूल संचालकों ने उठाए हैं. नए अधिनियम की जानकारी देने के लिए अब तक शिक्षा विभाग ने निजी स्कूल संचालकों को कोई पत्र नहीं लिखा है और ना ही मामले में कोई कार्यशाला का आयोजन किया है. लिहाजा स्कूल संचालक पशोपेश की स्थिति में है.

शिक्षा का अधिकार वाला भारत 135वां देश :- शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू होने के बाद भारत उन 130 से अधिक देशों की सूची में शामिल हो गया है, जो बच्चों को नि:शुल्क और आवश्यक शिक्षा उपलब्ध कराने की कानूनी गारंटी प्रदान करते हैं. वहीं दुनिया के सिर्फ 13 देश ही ऐसे हैं जहां पूरी तरह नि:शुल्क शिक्षा मिलती है. बच्चों को पंद्रह साल तक पूरी तरह नि:शुल्क शिक्षा मुहैया कराने के मामले में चिली सबसे शीर्ष स्थान पर है. यह देश छह से 21 साल की उम्र तक के बच्चों को पूरी तरह मुफ्त और आवश्यक शिक्षा मुहैया कराता है. शिक्षा के अधिकार को दुनियाभर में अहम मानव अधिकार के तौर पर मान्यता है. इसे सबसे पहले मानवाधिकार संबंधी सार्वभौम घोषणापत्र 1948 [यूनिवर्सल डिक्लरेशन आफ ह्यूमन राइट्स 1948] के तहत मान्यता मिली थी.

बहरहाल विश्व स्तर पर आज हमारा भारत देश हर तरह से संपन्न और प्रगतिशील माना जाता हैं. आज देश ने आकाश से बढ़कर ब्रह्माण्ड को छूने में कामयाबी हासिल की हैं. लेकिन इस पूरे प्रगतिशील दौर में आज भी देश में शिक्षा का स्तर पहले अधिक चिंताजनक बना हुआ है. आज भले ही हमारे पास हर एक किलोमीटर पर स्कूल और पाठशालाएं मौजूद हों लेकिन शिक्षा का स्तर लगातार गिरता रहा है. आज दौर में भले ही हमने ज्यादा से ज्यादा बच्चों को स्कूल में दाखिला दिला दिया हो लेकिन शिक्षा के पैमानों में इन बच्चों की स्थिति और भी अधिक चिंताजनक हो गई है. देश में सभी के लिए राईट टू एजुकेशन क़ानून भले ही लागू हो गया हो. लेकिन यह अधिकार महज़ कागजों पर ही सिमट कर ना रह जाए इसके लिए निश्चित रूप कई चुनौतियों का सामना करना होगा. आज राज्य सरकारों का पैसे का अभाव बताकर केन्द्र से राशि की मांग करना भले ही केन्द्र सरकार के पसीने निकाल रहा हो. लेकिन अब जब इस क़ानून को लागू कर ही दिया है. तो हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार मिले इसके लिए हर चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा.

March 22, 2010

'जल नहीं तो कल नहीं' - जल बचाओ



(कमल सोनी)>>>> "रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून" आज २२ मार्च को पूरे विश्व में जल दिवस मनाया जा रहा है. यानि जल बचाने के संकल्प का दिन. धरती पर जब तक जल नहीं था तब तक जीवन नहीं था और यदि आगे जल ही नहीं रहेगा तो जीवन के अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती. वर्त्तमान समय में जल संकट एक विकराल समस्या बन गया है. नदियों का जल स्तर गिर रहा है. कुएं, बावडी, तालाब जैसे प्राकृतिक स्त्रोत सूख रहे हैं. घटते वन्य क्षेत्र के कारण भी वर्षा की कमी के चलते जल संकट बढ़ रहा है. वहीं उद्योगों का दूषित पानी की वजह से नदियों का पानी प्रदूषित होता चला गया. लेकिन किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया. आँकड़े बताते हैं कि विश्व के लगभग ८८ करोड लोगों को पीने का शुद्ध पानी नही मिल रहा है. ताज़े पानी के महत्त्व पर ध्यान केन्द्रित करने और ताज़े पानी के संसाधनों का प्रबंधन बनाये रखने के लिए राष्ट्र संघ प्रत्येक वर्ष २२ मार्च का दिन अंतर्राष्ट्रीय जल दिवस के रूप में मनाता है. सुरक्षित पेय जल स्वस्थ्य जीवन की मूल भूत आवश्यकता है फिर भी एक अरब लोग इससे वंचित हैं. जीवन काल छोटे हो रहे हैं- बीमारियाँ फैल रही हैं. आठ में से एक व्यक्ति को और पूरी दुनियाँ में ८८ करोड़ ४० लाख लोगों को पीने के लिए साफ़ पानी नहीं मिल पा रहा. विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार प्रत्येक वर्ष ३५ लाख ७५ हज़ार लोग गंदे पानी से फैलने वाली बीमारी से मर जाते हैं. मरने वालों में अधिकांश संख्या १४ साल से कम आयु के बच्चों की होती है जो विकासशील देशों में रहते हैं. इसे रोकने के लिए अमरीका विकास सहायता के तहत पूरी दुनियाँ में हर साल जल आपूर्ति और साफ़ पीने का पानी सुलभ कराने के लिए करोडों डॉलर खर्च कर रहा है.

जल बचाना ज़रूरी :- प्रकृति जीवनदायी संपदा जल हमें एक चक्र के रूप में प्रदान करती है, हम भी इस चक्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. चक्र को गतिमान रखना हमारी ज़िम्मेदारी है, चक्र के थमने का अर्थ है, हमारे जीवन का थम जाना. प्रकृति के ख़ज़ाने से हम जितना पानी लेते हैं, उसे वापस भी हमें ही लौटाना है. हम स्वयं पानी का निर्माण नहीं कर सकते अतः प्राकृतिक संसाधनों को दूषित न होने दें और पानी को व्यर्थ न गँवाएँ यह प्रण लेना आज के दिन बहुत आवश्यक है. पानी हमारे जीवन की पहली प्राथमिकता है, इसके बिना तो जीवन संभव ही नहीं क्या आपने कभी सोचा कि धरती पर पानी जिस तरह से लगातार गंदा हो रहा है और कम हो रहा है, अगर यही क्रम लगातार चलता रहा तो क्या हमारा जीवन सुरक्षित रहेगा कितनी सारी आपदाओं का सामना करना पड़ेगा और सबकी जिन्दगी खतरे में पड़ जाएगी इस लिए हम सबको अभी से इन सब बातों को ध्यान में रख कर पानी की संभाल और सुरक्षा की जिम्मेदारी उठानी चाहिए यह दिवस तो २२ मार्च को मनाया जाता है और वैसे भी पानी की आवश्यकता तो हमें हर पल होती है फिर केवल एक दिन ही क्यों, हमें तो हर समय जीवनदायी पानी की संभाल के लिए उपाय करते रहना चाहिए, यह दिन तो बस हमें हमारी जिम्मेदारी का अहसास कराने के लिए मनाए जाते हैं.

दुनिया भर की मुख्य नदियों के जल स्तर में भारी गिरावट दर्ज - रिसर्च :- दुनिया भर की मुख्य नदियों के जल स्तर में गिरावट दर्ज की गई है एक अध्ययन में निकले निष्कर्षों के मुताबिक़ जलवायु परिवर्तन की वजह से नदियों का जल स्तर जल स्तर घट रहा है और आगे इसके भयावह परिणाम सामने आएंगे अमेरिकन मीटियरॉलॉजिकल सोसाइटी की जलवायु से जुड़ी पत्रिका ने वर्ष २००४ तक, पिछले पचास वर्षों में दुनिया की ९०० नदियों के जल स्तर का विश्लेषण किया है. जिसमें यह तथ्य निकलकर आया है कि दुनिया की कुछ मुख्य नदियों का जल स्तर पिछले पचास वर्षों में गिर गया है. यह अध्ययन अमेरिका में किया गया है. अध्ययन के अनुसार इसकी प्रमुख वजह जलवायु परिवर्तन है. पूरी दुनिया में सिर्फ़ आर्कटिक क्षेत्र में ही ऐसा बचा है. जहाँ जल स्तर बढ़ा है. और उसकी वजह है. तेज़ी से बर्फ़ का पिघलना भारत में ब्रह्मपुत्र और चीन में यांगज़े नदियों का जल स्तर अभी भी काफ़ी ऊँचा है. मगर चिंता ये है कि वहाँ भी ऊँचा जल स्तर हिमालय के पिघलते ग्लेशियरों की वजह से है. भारत की गंगा नदी भी गिरते जल स्तर से अछूती नहीं है. उत्तरी चीन की ह्वांग हे नदी या पीली नदी और अमरीका की कोलोरेडो नदी दुनिया की अधिकतर जनसंख्या को पानी पहुँचाने वाली इन नदियों का जल स्तर तेज़ी से गिर रहा है. अध्ययन में यह भी पता चला है. कि दुनिया के समुद्रों में जो जल नदियों के माध्यम से पहुँच रहा है. उसकी मात्रा भी लगातार कम हो रही है. इसका मुख्य कारण नदियों पर बाँध बनाना तथा खेती के लिए नदियों का मुँह मोड़ना बताया जा रहा है. लेकिन ज़्यादातर विशेषज्ञ और शोधकर्ता गिरते जल स्तर के लिए जलवायु परिवर्तन को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. उनका मानना है कि बढ़ते तापमान की वजह से वर्षा के क्रम में बदलाव आ रहा है. और जल के भाप बनने की प्रक्रिया तेज़ हो रही है. मध्यप्रदेश की जीवनदायिनी नर्मदा का भी जल स्तर काफी तेज़ी से गिर रहा है. जिसका मुख्य कारण नर्मदा के दोनों तटों पर घटते वन्य क्षेत्र और जलवायु परिवर्तन माना जा रहा है. विशेषज्ञों ने प्राकृतिक जल स्रोतों की ऐसी क़मी पर चिंता ज़ाहिर करते हुए कहा है. कि दुनिया भर में लोगों को इसकी वजह से काफ़ी परेशानियों का सामना करना पड़ेगा. उनका कहना है. कि जैसे जैसे भविष्य में ग्लेशियर या हिम पिघलकर ग़ायब होंगे इन नदियों का जल स्तर भी नीचे हो जाएगा.

जल है तो कल है :- जल बचाने के लिए आमजनमानस को स्वयं विचार करना होगा. क्योंकि जल है तो कल है. हमें स्वयं इस बात पर गौर करना होगा कि रोजाना बिना सोचे समझे हम कितना पानी उपयोग में लाते हैं. २२ मार्च “विश्व जल दिवस” है. पानी बचाने के संकल्प का दिन. पानी के महत्व को जानने का दिन और पानी के संरक्षण के विषय में समय रहते सचेत होने का दिन. समय आ गया है जब हम वर्षा का पानी अधिक से अधिक बचाने की कोशिश करें. बारिश की एक-एक बूँद कीमती है. इन्हें सहेजना बहुत ही आवश्यक है. यदि अभी पानी नहीं सहेजा गया, तो संभव है पानी केवल हमारी आँखों में ही बच पाएगा. पहले कहा गया था कि हमारा देश वह देश है जिसकी गोदी में हज़ारों नदियाँ खेलती थी, आज वे नदियाँ हज़ारों में से केवल सैकड़ों में ही बची हैं. कहाँ गई वे नदियाँ, कोई नहीं बता सकता. नदियों की बात छोड़ दो, हमारे गाँव-मोहल्लों से तालाब आज गायब हो गए हैं, इनके रख-रखाव और संरक्षण के विषय में बहुत कम कार्य किया गया है. पानी का महत्व भारत के लिए कितना है. यह हम इसी बात से जान सकते हैं. कि हमारी भाषा में पानी के कितने अधिक मुहावरे हैं. आज पानी की स्थिति देखकर हमारे चेहरों का पानी तो उतर ही गया है, अब पानी हमें रुलाएगा, यह तय है. तो चलो हम सब संकल्प लें कि हर समय अपनी जिम्मेदारी को निभाएंगे इस तरह हम बहुत सारे जीवों का जीवन बचाने में अपना सहयोग दे सकते हैं.

March 9, 2010

बधाई....अंततः राज्यसभा में पास हुआ महिला आरक्षण बिल, मिले 186 मत


(कमल सोनी)>>>> राज्यसभा में अंततः महिला आरक्षण विधेयक पास हो ही गया. कुल १८७ मत पड़े, जिनमें विधेयक के पक्ष में १८६ और विपक्ष में १ वोट पड़ा. इससे पूर्व आज जब पुनः सरकार ने इस पर बहस करनी चाही. तो इस बिल का विरोध कर रहे सांसद फिर हंगामा करने लगे. लेकिन इस अनियंत्रित हंगामें को देख सदन में मार्शल बुलाकर विरोध कर रहे सांसदों को सदन से सख्ती से बाहर कर दिया. जिसके बाद महिला आरक्षण बिल ध्वनि मत से पारित करवा दिया गया. ध्वनि मत से बिल पास होने के बाद इस पर बहस कराई गई और वोटिंग प्रक्रिया पूरी हुई. और अंततः महिला आरक्षण बिल पास हो गया.

निलंबित सदस्यों को मार्शलों ने किया बाहर :- राज्यसभा में हुए एक अभूतपूर्व घटनाक्रम में महिला आरक्षण के प्रावधान वाले संविधान संशोधन विधेयक के विरोधी सात निलंबित सदस्यों को सदन से बाहर करने के लिए मार्शलों की ताकत का इस्तेमाल किया गया तथा इसके विरोध स्वरूप सपा के कमाल अख्तर ने कांच का ग्लास तक तोड़ दिया और करीब आधे घंटे तक सदन में जबर्दस्त अफरा-तफरी मची रही. तीन बार के स्थगन के बाद जब उच्च सदन की बैठक शुरू हुई तो सातों निलंबित सदस्य आसन के समक्ष धरने पर ही मौजूद थे. इनमें सपा के कमाल अख्तर, आमिर आलम खान, वीरपाल सिंह और नंद किशोर यादव, जदयू के निलंबित सदस्य डॉ. एजाज अली, राजद के सुभाष यादव तथा लोजपा के साबिर अली शामिल हैं. इन्हीं के साथ राजद के राजनीति प्रसाद और सपा के रामनारायण साहू भी आसन के समक्ष आकर विरोध व्यक्त करने लगे. सभापति हामिद अंसारी ने इन सदस्यों से वापस चले जाने की कई बार अपील की. इसी बीच उन्होंने संविधान 108वां संशोधन विधेयक पर चर्चा की घोषणा करते हुए विपक्ष के नेता अरुण जेटली का नाम पुकारा. जेटली अपने स्थान पर बोलने के लिए खड़े हुए लेकिन हंगामे के कारण वह बहुत देर तक अपनी बात शुरू नहीं कर पाये. काफी समय तक सदन में हंगामा जारी रहने के बीच ही सभापति ने विधेयक पर मत विभाजन की घोषणा कर दी. इसके बाद उन्होंने लॉबी खाली करवाने का आदेश दिया. सदन में उस समय 30 से ज्यादा मार्शल मौजूद थे. इन मार्शलों ने एक-एक कर सातों निलंबित सदस्यों को जबर्दस्ती उठाकर सदन से बाहर कर दिया. सबसे अंत में सपा के कमाल अख्तर को मार्शलों ने सदन से जबर्दस्ती बाहर किया. इससे पहले अख्तर सपा, बसपा, जद (यू) और अन्नाद्रमुक के संसदीय नेताओं की बैठने वाली अग्रिम पंक्ति की एक सीट पर खड़े होकर नारेबाजी करने लगे. विरोध के दौरान ही उन्होंने मेज पर पड़ा कांच का एक गिलास पटक दिया. इसके बाद मार्शल उन्हें उठाकर सदन से बाहर ले गए. कमाल अख्तर तथा अन्य निलंबित सदस्यों को जबर्दस्ती सदन से बाहर निकाले जाने का विरोध कर रहे सपा तथा राजद सदस्यों में भाजपा के विनय कटियार समेत कई अन्य सदस्य भी शामिल हो गए. भाजपा के सदस्य मांग कर रहे थे कि सदन को व्यवस्था में लाया जाना चाहिए और इस तरह मार्शल का प्रयोग कर सदन नहीं चलाया जा सकता. इससे पहले, भारी शोरगुल और हंगामे की वजह से सभापति ने विधेयक को बिना चर्चा के ही पारित कराने के उद्देश्य से मत विभाजन का निर्देश दे दिया था. यहां तक कि उन्होंने इस पर ध्वनि मत भी ले लिया था, लेकिन बाद में स्थिति शांत होने पर उन्होंने पुन: चर्चा शुरू कराने का निर्देश दिया.

क्या है विरोध :- पिछले १३ वर्षों से महिला आरक्षण विधेयक आम सहमति के अभाव में लटका पड़ा है. जब भी इसे पेश करने की कोशिश हुई है संसद में ज़बरदस्त हंगामा हुआ है. लेकिन इस बार कांग्रेस, भाजपा और वामपंथी दलों के सदस्यों की संख्या विरोध कर रहे छोटे दलों के सदस्यों पर भारी पड़ सकती है. जो छोटे दल इसका विरोध कर रहे हैं उनमें लालू यादव की आरजेडी, मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी, मायावती की बहुजन समाज पार्टी और देवगौड़ा शामिल हैं. इस विधेयक को लेकर बहस का मुद्दा यह है कि इस आरक्षण में पिछड़ी, दलित तथा मुस्लिम महिलाओं को अलग से आरक्षण दिया जाना चाहिए, वरना ज्यादातर सीटों पर पढ़ी-लिखी शहरी महिलाओं का कब्ज़ा हो जाएगा. यानि विरोध कर रहे सांसद आरक्षण के अंदर आरक्षण की मांग कर रहे थे. मुलायम सिंह यादव ने कहा कि ये पिछड़ों, मुसलमानों और दलितों को संसद में आने देने से रोकने की साज़िश है तो लालू यादव ने इसे भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस की साज़िश बताया. दूसरी ओर देशभर के मुस्लिम संगठनों ने महिला विधेयक के मौजूदा स्वरूप पर विरोध में प्रदर्शन की चेतावनी दी है. जामिया मिलिया इस्लामिया के प्रोफेसर अख्तरुल वासिम ने कहा है कि जब पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण के अंदर आरक्षण दे सकते हैं तो राष्ट्रीय पंचायत में ऐसा करने से क्यों परहेज किया जा रहा है.

जदयू का समर्थन :- एक तरफ जदयू अध्यक्ष शरद यादव विधेयक के विरोध में हैं. तो दूसरे तरफ पार्टी के दूसरे प्रमुख नेता व बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इसके समर्थन में हैं जिससे पार्टी के समीकरण बदल गए हैं. जनता दल-यू के सदस्यों की राय नीतीश कुमार के बयान के बाद विभाजित हो गई है. राज्यसभा में जदयू के सात सांसदों में जॉर्ज फर्नाडीस बीमार होने के कारण अनुपस्थित हैं. बाकी छह सांसदों को नीतीश का करीबी माना जाता है, इसीलिए उनके विधेयक के समर्थन में रहने की उम्मीद है. विधेयक के पक्ष में वकालत करने वालों का तर्क है कि पिछड़ी महिलाओं के लिए आरक्षण की बहस में कोई दम नहीं है. विधेयक के विरोधियों को बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल-यू के नेता नीतीश कुमार के समर्थन देने की घोषणा से झटका लगा है. तो केंद्र सरकार को राहत मिली है.

महिला आरक्षण बहुत जरूरी - जेटली :- राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरुण जेटली ने कहा है कि देश के विधायी निकायों में महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व देने के लिए आरक्षण बहुत जरूरी है. महिला आरक्षण विधेयक पर चर्चा की शुरुआत करते हुए जेटली ने मंगलवार को कहा, "जो लोग कहते हैं कि महिलाओं को उनका अधिकार दिलाने के लिए आरक्षण की आवश्यकता नहीं है, वे गलत हैं. स्वतंत्रता के 63 वर्षों बाद भी आज लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व सिर्फ 10.7 फीसदी है. ऐसे में आरक्षण से ही महिलओं को उचित प्रतिनिधित्व मिल सकता है." जेटली ने कहा कि बीते कई वर्षों के बाद आज वह मौका आया है जब यह ऐतिहासिक विधेयक पारित किया जाएगा. यह अवसर सभी के लिए ऐतिहासिक और अद्भुत है. उन्होंने अन्य दूसरे देशों में महिला आरक्षण पर प्रकाश डालते हुए कहा कि महिला आरक्षण क्षेत्रों के आधार पर होना चाहिए.

लोकतंत्र की ह्त्या - कमाल अख्तर :- सदन से बाहर किये जाने के बाद सपा के कमाल अख्तर ने कहा कि यह लोकतंत्र की ह्त्या है. हमें अपने अधिकारों से वंचित किया गया. अख्तर ने कहा यह बिल मुसलमान, पिछडा वर्ग और दलित विरोधी है. उन्होंने सरकार पर जबरन बिल पास करने का आरोप भी लगाया.

महिला दिवस पर राष्ट्रिय शर्म :- अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस पर देश में सोमवार का दिन राज्यसभा में काला सोमवार लेकर आया जब केंद्र सरकार ने महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक कदम आगे बढाते हुए राज्यसभा में महिला आरक्षण बिल तो पेश किया. लेकिन इस बिल के विरोधियों ने सदन की मर्यादा को तार-तार करते हुए बिल की प्रतियाँ फाड़ दीं. इसे महिला दिवस पर सबसे बड़ी शर्म ही कहा जायेगा कि सांसदों के हंगामेदार रवैये के कारण न तो इस पर बहस हो सकी और न ही वोटिंग कराई जा सकी. हंगामा इतना ज़बरदस्त था कि सांसदों ने सदन की मर्यादा को तार-तार कर दिया. महिला आरक्षण बिल पर मचे बवाल के कारण राज्‍यसभा को कई बार स्‍थगित किया गया. पहले बारह बजे, फिर दो बजे, और फिर तीन बजे के बाद अब राज्‍य सभा को चार बजे तक के लिए स्‍थगित कर दिया गया. लेकिन बाद में राज्यसभा की कार्यवाही आज तक के लिए स्थगित की गई थी.

बहरहाल भले ही महिला आरक्षण बिल को १४ सालों का इन्तेज़ार करना पड़ा लेकिन अंततः राज्यसभा में महिला आरक्षण विधेयक पास हो गया. अब आगे यह उम्मीद भी लगाईं जा रही है कि आगे यह बिल लोक सभा में भी जल्द से जल्द पेश होगा और भारी बहुमत से पास भी होगा. इस बिल के पास होने के बाद महिलाओं में उत्साह का माहौल है. कुछ महिलाओं ने इसे आज़ादी के बाद महिलाओं के लिए सबसे बड़ा दिन करार दिया है. अब यह देखना होगा कि आने वाले समय में महिला आरक्षण बिल महिला सशक्तिकरण की दिशा में कितना कारगर साबित होगा.



March 8, 2010

समाज की उन्नति, समृद्धी नारी विकास पर निर्भर


* आठ मार्च अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष
-------------------------------------------------------------------------------
(कमल सोनी)>>>> आज पूरा विश्व अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस मना रहा है. और इस दिन कई विशेष कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है. वैसे भी विश्व के समग्र व यथेष्ट विकास के लिए महिलाओं के विकास को मुख्य धारा से जोडना परम आवश्यक है. नारी की स्थिति समाज में जितनी महत्वपूर्ण, सुदृढ़, सम्मानजनक व सक्रिय होगी, उतना ही समाज उन्नत, समृद्ध व मज़बूत होगा. इस बात को आधुनिक विचारक व चिंतक भी स्वीकार करते हैं. बात भारतीय परिद्रश्य की करें तो नारी का त्याग और बलिदान भारतीय संस्कृति की अमूल्य निधि है. भारत में जहाँ एक और नारी को शक्ति स्वरूपा मना जाता है तो दूसरी और रूढीवादी विचारधारा में जकडे हमारे समाज में महिलाओं की वर्त्तमान वास्तविक स्थिति किसी से छिपी नहीं हैं. ऐसे में एक अहम सवाल यह उठता है कि क्या आज ही के दिन महिलाओं का सम्मान किया जाना चाहिए ? लगातार कई सालों से महिला दिवस के रूप में हम एक औपचारिकता निभाते आ रहे हैं लेकिन आज एक बार फिर हमें महिलाओं के अस्तित्व को पहचानने की कोशिश करनी होगी. क्या सिर्फ आज के ही दिन महिला सम्मान की बातें करने से महिला सम्मान की सुरक्षा हो जाती है. या ये सिर्फ यह एक ख़ाना पूर्ति ही है? अथवा महज़ एक औपचारिकता ? पुरुष प्रधान इस समाज में जरूरत इस बात की है कि आज महिलाएं स्वयं अपने अस्तित्व को पहचाने.

सृष्टि के आरंभ से नारी अनंत गुणों की आगार रही है. पृथ्वी सी क्षमता, सूर्य जैसा तेज, समुद्र सी गंभीरता, चंद्रमा सी शीतलता, पर्वतों सी मानसिक उच्चता हमें एक साथ नारी हृदय में दृष्टिगोचर होती है. वह दया करुणा, ममता और प्रेम की पवित्र मूर्ति है और समय पड़ने पर प्रचंड चंडी का भी रूप धारण कर सकती है. वह मनुष्य के जीवन की जन्मदात्री भी है. नर और नारी एक दूसरे के पूरक है. किंतु बदलते समय और विश्व के औद्योगीकरण के साथ महिलाओं के मानवीय गुणों की गहरी परीक्षा का प्रारंभ हुई. यह महसूस किया जाने लगा कि काम, पैसा और मेहनत का मूल्य मानवीय विशेषताओं से आगे निकलने लगा है और महिलाएँ इस दौड़ में पीछे रह गई हैं. उनकी इस पीड़ा को विश्व के अनेक देशों मे आवाज़ मिली. और पुरुषों के समान अधिकार की एक नई आवाज़ ने जन्म लिया. उनके उत्थान और पुरुषों के समान अधिकार प्रदान करने के लिए विश्व में कई परिवर्तन हुए. ८ मार्च १९०८ में ब्रिटेन में महिलाओं ने 'रोटी और गुलाब' के नारे के साथ अपने अधिकारों के प्रति सजगता दिखाते हुए प्रदर्शन किया. जहां रोटी उनकी आर्थिक सुरक्षा का प्रतीक था तो गुलाब अच्छे जीवन शैली का प्रतीक था. भारत की पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने भी कहा था, ''ऐसा कोई काम नहीं है जिसे महिलाएँ पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर नही कर सकती.'' और एक प्रधानमंत्री होते हुए वे समाज के सामने एक ज्वलंत उदाहरण भी थीं.

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का इतिहास :- वर्त्तमान में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस ८ मार्च को मानया जाता है. लेकिन अमेरिका में सोशलिस्ट पार्टी के आवाहन पर यह दिवस सबसे पहले २८ फरवरी १९०९ में मनाया गया. इसके बाद यह फरवरी के आखरी रविवार के दिन मनाया जाने लगा. १९१० में सोशलिस्ट इंटरनेशनल के कोपेनहेगन के सम्मेलन में इसे अन्तरराष्ट्रीय दर्जा दिया गया. उस समय इसका प्रमुख ध्येय महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिलवाना था क्योंकि, उस समय अधिकतर देशों में महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं था. १९१७ में रुस की महिलाओं ने, महिला दिवस पर रोटी और कपड़े के लिये हड़ताल पर जाने का फैसला किया. यह हड़ताल भी ऐतिहासिक थी. ज़ार ने सत्ता छोड़ी, अन्तरिम सरकार ने महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिये. उस समय रुस में जुलियन कैलेंडर चलता था और बाकी दुनिया में ग्रेगेरियन कैलेंडर. इन दोनो की तारीखों में कुछ अन्तर है. जुलियन कैलेंडर के मुताबिक १९१७ की फरवरी का आखरी रविवार २३ फरवरी को था जब की ग्रेगेरियन कैलैंडर के अनुसार उस दिन ८ मार्च थी. इस समय पूरी दुनिया में (यहां तक रूस में भी) ग्रेगेरियन कैलैंडर चलता है. इसी लिये ८ मार्च, महिला दिवस के रूप में मनाया जाने लगा. महिला दिवस अब लगभग सभी विकसित, विकासशील देशों में मनाया जाता है. यह दिन महिलाओं को उनकी क्षमता, सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक तरक्की दिलाने व उन महिलाओं को याद करने का दिन है जिन्होंने महिलाओं को उनके अधिकार दिलाने के लिए अथक प्रयास किए.
अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष :- अलग-अलग देशों की सरकारों ने अपनी-अपनी स्थित के अनुसार इस संबंध में नियम बनाए एवं वैधानिकता प्रदान किया. प्रथम अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष मैक्सिको में हुआ. चर्तुथ अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष के अवसर पर बीजिंग में विश्व के लगभग १८९ देशों ने हिस्सा लिया और विश्व भर मे महिलाओं के जीवन को सुधारने के लिए कठिन लक्ष्य के प्रति दृढ संकल्प और एकजुटता दिखाई. १९७५ मे अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष का भारत में उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था.

हालातों में सुधार की ज़रूरत :- आज, प्रथम अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मनाये जाने के लगभग सौ वर्ष बाद भी हमें क्या नज़र आता है? क्या महिलाओं की स्थिति में उतना सुधार हुआ जितना होना चाहिए एक तरफ, दुनिया की लगभग हर सरकार एवं कई अन्य संस्थान अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर खूब धूम मचाते हैं. वे महिलाओं को 'ऊपर उठाने' की अपनी 'कामयाबियों' का डिंडोरा पीटने से भी नहीं चूकते हैं और महिलाओं के लिये कुछ करने के बड़े-बड़े वादे करते हैं. दूसरी ओर, सारी दुनिया में महिलायें आज भी हर प्रकार के बेरहम शोषण और दमन के शिकार हो रही है. महिलाओं के प्रति हो रहे अत्याचार के आंकड़े तो यही दर्शाते हैं. भारत के राजनेता महिलाओं के सशक्तिकरण और उत्थान के लिए बड़े बड़े वायदे तो करते हैं, भाषण भी देते हैं, वे तो इस बात का भी जिक्र करते हैं कि अब बी.पी.ओ., पर्यटन, परिवहन व सेवा उद्योग जैसे कई क्षेत्रों में ज्यादा से ज्यादा संख्या में लड़कियों व महिलाओं को नौकरियां मिल रही हैं, कि वे अच्छे कपड़े पहनकर वातानुकूलित दफ्तरों में काम कर रही हैं, परन्तु क्या यह सब महिलाओं के लिये कोई विकास है ? शायद नहीं. क्योंकि इन क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाओं को भारी शोषण झेलना पड़ता है. इन कामों में उनकी कुशलता व योग्यता का कोई संवर्धन नहीं होता, उन्हें कोई सुरक्षा नहीं मिलती. काम पर जाने के बाद भी, वर्तमान पिछड़ी सामाजिक व्यवस्था के चलते, महिलाओं को न तो बराबरी दी जाती है और न ही इज्ज़त. चाहे सड़कों पर हो या काम की जगह पर, उन्हें तरह-तरह के अमानवीय व्यवहार, अपमान व हमलों से दो चार होना ही पड़ता है.

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस महज़ एक दिन औपचारिकता मात्र नहीं है. समूचे विश्व को इस बात पर विचार करना होगा कि महिलाओं को आर्थिक तथा सामाजिक स्तर पर स्वतंत्रता कैसे प्राप्त हो ? इस पुरुष प्रधान दुनिया में आर्थिक तथा सामाजिक आज़ादी के बिना पुरुषों के वर्चस्व को समाप्त नहीं किया जा सकता. दूसरी तरफ़ एक ऐसा समाज भी है जहाँ रूढ़िवादी नेतृत्व धर्म के नाम पर महिलाओं के अधिकारों का हनन करता है. इस समस्या के निराकरण के लिए महिलाओं को अधिक से अधिक शिक्षित करने के लिए एक ईमानदार प्रयास होना चाहिए. अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का मूल उद्देश्य पूर्ण होगा.