May 24, 2010

क्या आम आदमी के लिहाज़ से केंद्र सरकार के कार्यकाल का पहला साल संतोषजनक है ?



भारत के प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने केन्द्र सरकार के दूसरे कार्यकाल के एक वर्ष पूर्ण होने पर आज नई दिल्ली में केंद्र सरकार की उपलब्धियां गिनाईं और इस कार्यकाल को 'अहम उपलब्धियों' भरा कार्यकाल बताया. तमाम मुद्दों पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सरकार की उपलब्धियां तो गिनाई पर उन्होंने यूपीए सरकार के कामकाज की समीक्षा के संबंध में अपनी ओर से स्वयं कोई नम्बर नहीं दिया और इसका फैसला जनता तथा मीडिया पर छोड़ दिया. उन्होंने कहा कि पिछले चंद दिनों से मीडिया में सरकार की नीतियों पर काफी बहस हुई है और मीडिया ने नम्बर भी दिए हैं. उन्होंने अपनी ही सरकार के कार्यकाल पर नंबर नहीं दिए जाने को अनुचित बताया. अब यदि यह अनुचित था तो पिछले साल उन्होंने यूपीए सरकार को १० में से छः नंबर क्यों दिए थे. और इस बार वे अपनी की सरकार को नंबर देने से क्यों कतराए. उन्होंने कहा नंबर देने का फैसला भारत की जनता और मीडिया करेगी. अब चूँकि यूपीए सरकार के कार्यकाल के एक वर्ष पूर्ण हो चुके हैं ऐसे में एक अहम सवाल यह उठता है. कि क्या आम आदमी के लिहाज़ से यह कार्यकाल संतोषजनक रहा. हालांकि बीजेपी ने नक्सलवाद और महंगाई जैसे मुद्दों पर प्रधानमंत्री से अपनी नीति स्पष्ट करने को कहा है. बीजेपी नेता अरूण जेटली ने कहा है कि आमतौर पर किसी भी सरकार का पहला साल बहुत आसानी से बीतता है. इस सरकार का कार्यकाल बीएसपी, एसपी और आरजेडी के अवसरवादी समर्थन से शुरू हुआ जिसके चलते सरकार को लगा मानो उसने चांद को हासिल कर लिया हो. इसके बाद से ही उसकी राजनीति में अहंकार पैदा हो गया. दूसरे कार्यकाल के पहले साल में सरकार को अपने कई मंत्रियों को लाल आंखें भी दिखानी पड़ी. आईपीएल विवाद के चलते शशि थरूर को विदेश राज्यमंत्री पद से हटा दिया गया तो चीन को लेकर गृह मंत्रालय के रुख पर टिप्पणी के मामले में जयराम रमेश भी बाल बाल बचे. संसद में कटौती प्रस्ताव के दौरान सरकार संकट में घिरी नजर आ रही थी लेकिन विपक्ष की एकता में ऐसी सेंध लगी कि कटौती प्रस्ताव लाने वाली भारतीय जनता पार्टी को शर्मसार होना पड़ा और सरकार ने विरोध आसानी से किनारे कर दिया. सुरक्षा के मोर्चे पर भारत को मुंबई के बाद से पुणे में जर्मन बेकरी को छोड़ कर किसी अन्य बड़े आतंकवादी हमले का सामना नहीं करना पड़ा है. लेकिन माओवादियों की चुनौती सरकार के माथे पर पसीना ला रही है. हाल के दिनों में माओवादियों ने सीआरपीएफ जवानों पर हमले तेज किए हैं जिसमें 110 जवानों की मौत हो चुकी है. यूपीए सरकार ने इस कार्यकाल में महिला आरक्षण बिल राज्यसभा में पेश किया तो शिक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार में शामिल करने का भी श्रेय हासिल किया. लेकिन महंगाई के मुद्दे पर सरकार की कड़ी आलोचना होती रही, तो आर्थिक मोर्चे पर देश को बेहतर स्थिति में रखने के मामले पर केंद्र सरकार अपनी पीठ थपथपाती रही. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि लंबे-चौड़े वादों पर ज़बरदस्त जीत के साथ दोबारा सत्ता में आई यूपीए सरकार का रिपोर्ट कार्ड क्या कहता है. और जनता जितने नंबर देती है उसमें सरकार पास होगी या फेल ?

क्या आपके लिए यह कार्यकाल संतोषजनक रहा ?

May 6, 2010

कसाब को फांसी: फांसी की सजा तो अफजल गुरु को भी मिली पर अब तक फांसी क्यों नहीं हुई ?


(कमल सोनी)>>>> आज आर्थर रोड जेल की विशेष अदालत ने मुंबई हमलों के दोषी पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल आमिर कसाब को 4 मामलों में फांसी की सजा का ऐलान तो कर दिया. निश्चित रूप से यह भारतवासियों के लिए हर्ष का विषय है. पूरे देश में हर्ष का माहौल है. फटाखे फोड़े जा रहे हैं मिठाइयां भी बांटी जा रही हैं. भारत माता की जय और वन्देमातरम जैसे देशभक्ति नारों की गूँज भे सुनाई देने लगी. लेकिन एक अहम सवाल यहाँ यह उठाता है कि संसद पर हमले के दोषी अफसल गुरू को भी फांसी की सजा सुनाई गई थी. लेकिन अब तक उसे फांसी क्यों नहीं दी गई. मुंबई हमले के मामले में जिस तेजी से विशेष अदालत ने चार मामलों में कसाब को फांसी और पांच अन्य मामलों में उम्रकैद की सजा सुनाई. वह भी काबिले तारीफ़ है. लेकिन कसाब को फांसी के फंदे तक पहुचने में अभी काफी वक्त है. कसाब को सजा दिलवाने वाले सरकारी वकील उज्जवल निकम भी मानते हैं कि कसाब को मौत की सजा को अंजाम तक पंहुचाने के लिए अभी लंबा सफर तय करना होगा. निकम ने कहा कि कसाब को भी अपील का अधिकार है और जिस तरह का प्रोसिजर है, मुझे लगता है अंजाम तक पंहुचने में डेढ़ से दो साल तो लगेगा ही. विशेष कोर्ट की ओर से सुनाई गई सजा की पुष्टि हाईकोर्ट से करानी होगी. हाईकोर्ट में अपील के लिए कसाब को 90 दिन का वक्त मिलेगा. अगर कसाब अपनी सजा के खिलाफ अपील कर देता है, तो हाईकोर्ट फिर पूरे मामले की सुनवाई करेगा. हाईकोर्ट की सजा के बाद कसाब सुप्रीम कोर्ट जा सकता है. अगर सुप्रीम कोर्ट भी उसकी सजा पर मुहर लगा दे, तो इन सबके बाद राष्ट्रपति के यहां आवेदन देने का अधिकार भी है. राष्ट्रपति के पास करीब 28 मर्सी पेटिशन पहले से लंबित है. अगर ये मान भी लें कि सरकार 26/11 मुकदमे को प्राथमिकता देते हुए आगे बढ़ाए, तो भी उसे इस हिसाब से अंजाम तक पंहुचने में साल भर का समय तो लगेगा ही. ऐसे में यदि यह मान भी लिया जाय कि उपरी अदालते विशेष अदालत के फैसले को सही करार देते हुए कसाब की फांसी की सज़ा बरकरार रखती है. तो कहीं कसाब का मामला भी राष्ट्रपति तक पहुँच कर पिछले पेंडिंग मामलों की सूची में शामिल न हो जाए. अफजल गुरु को 13 दिसंबर,2001 को संसद पर हुए हमले में कसूरवार करार देते हुए फांसी की सजा सुनाई गई थी. लेकिन अभी तक उसे फांसी नहीं दी गई. कई बार यह मामला संसद में भे गूंजा. खुद अफजल गुरू ने भी स्वयं ही अपने बारे में जल्द फैसला लेने की बात कही हैं ऐसे में उसे अब तक फांसी पर क्यों नहीं लटकाया गया. वैसे कसाब मामले में जो सजा सुनाई गई है उससे एक बात तो साफ हो गई है कि भारत विरोधी कार्रवाइयों को अंजाम देने वालों का यही हश्र होगा. अब यह सरकार पर है कि वह इस सजा को जल्द से जल्द अमल में लाए, यह मामला संसद हमले के दोषी अफजल गुरु की तरह राजनीतिक कारणों से लटकना नहीं चाहिए, नहीं तो देश के खिलाफ साजिश करने वालों के हौसले बुलंद होंगे. कसाब किसी भी लिहाज से दया का पात्र नहीं है. कसाब मामले में जो सजा सुनाई गई है, उसका हर भारतीय स्वागत कर रहा है. आज हम इस हमले के दौरान शहीद हुए पुलिसकर्मियों, एनएसजी जवानों और सुरक्षा गार्डों को कोटि-कोटि नमन करते हैं और शपथ लेते हैं कि वह अपने पीछे अदम्य साहस और देशभक्ति की जो विरासत छोड़ कर गये हैं, उसे हम आगे बढ़ाएंगे साथ ही हमले के दौरन शिकार बनी मासूम जनता को अपनी श्रद्धांजलि देते हुए यह शपथ भी लेते हैं कि आतंकवाद का नामोनिशां मिटा कर रहेंगे, भारत के खिलाफ उठने वाला हर कदम किसी भी सूरत में सफल नहीं होने दिया जाएगा.

May 5, 2010

नार्को टेस्ट: सुप्रीम कोर्ट का फैसला जाँच एजेंसियों के लिए जबरदस्त झटका


भोपाल 05/मई/2010/(ITNN)>>>> सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर देश की जांच एजेंसियों को करारा झटका लगा है जिसमें कोर्ट ने नार्को टेस्ट को असंवैधानिक करार देते हुए कहा है कि बिना आरोपी की मर्जी के नार्को टेस्ट नहीं किया जा सकेगा. मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालाकृष्णन. न्यायमर्ति जे.एम. पंचाल और न्यायमूर्ति बी.एस. चौहान की खंडपीठ ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि अभियुक्त की सहमति के बगैर नार्को टेस्ट, ब्रेन मैपिंग या पॉलीग्राफी टेस्ट नहीं किया जा सकता. खंडपीठ की ओर से न्यायमूर्ति बालाकृष्णन ने फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी अभियुक्त का जबरन नार्को टेस्ट उसके मानवाधिकारों एवं उसकी निजता के अधिकारों का उल्लंघन है. बुधवार को सुनाए गए फ़ैसले में सर्वोच्च न्यायालय का कहना था कि दवा के प्रभाव में अभियुक्त या संदिग्ध अभियुक्त से लिए गए बयान से उसकी निजता के अधिकार का हनन होता है. यानि अब नार्को टेस्ट के लिए किसी भी अपराधी या आरोपी को बाध्य नहीं किया जा सकेगा. नार्को टेस्ट को लेकर अब तक की स्थिति भी यही थी कि नार्को टेस्ट से लिया गया बयान एक पुख़्ता सबूत के तौर पर पेश नहीं हो सकता था लेकिन उसे अदालत में मुख्य सबूत के साथ जोड़कर देखा जा सकता था. साथ ही नार्को टेस्ट के द्वारा हासिल की गई जानकारी को जांच का एक हिस्सा माना जाता था. अब अपने फैसले में कोर्ट ने यह भी कहा है कि यदि कोई अपराधी या आरोपी नार्को टेस्ट को तैयार हो जाता है तब भी उसके बयान को सबूत के तौर पर पेश नहीं किया जा सकता.

गौरतलब है कि नार्को टेस्ट को लेकर पूरे देश में अभियुक्तों ने इसके ख़िलाफ़ अलग अलग अदालतों में अपील दायर की थी और सुप्रीम कोर्ट ने इन सब मामलों पर सुनवाई के बाद अपना फ़ैसला सुनाया है. अंडरवल्र्ड की दुनिया में गॉडमदर के नाम से मशूहर संतोकबेन जडेजा और माफिया सरगना अरूण गवली ने इन परीक्षणों की वैधता को चुनौती दी थी. दोनों की याचिकाओं पर न्यायालय ने अपना फैसला सुरक्षित रखा है. अदालत ने यह भी कहा कि बलपूर्वक ऎसे परीक्षण संविधान की धारा 20 (3) का उल्लंघन है. इसके तहत प्रावधान है कि किसी मामले में किसी भी आरोपी को स्वयं के खिलाफ गवाही देने को बाध्य नहीं किया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर विधि आयोग की भी सलाह ली थी. संयुक्त राष्ट्र में पहले से ही इस तरह के टेस्ट पर प्रतिबंध है. गौरतलब है कि पिछले दिनों में कई बड़े मामले, मिसाल के तौर पर तेलगी केस, आरूषि हत्याकांड, निठारी केस सबमें इसका इस्तेमाल हुआ था. आरूषि हत्याकांड मामले में उसके माता-पिता की ब्रेन मेपिंग कराई गई थी. अबू सलेम का भी पोलीग्राफ टेस्ट कराया गया था. हाल ही में राजस्थान एटीएस ने दरगाह ब्लास्ट के मामले में हुई गिरफ्तारियों में एक आरोपी देवेन्द्र गुप्ता के नार्को टेस्ट की अदालत से अनुमति ली है. इसके अलावा अब्दुल करीम तेलगी, साध्वी प्रज्ञा के अलावा नार्को टेस्ट कराये गए आरोपियों के सूची लम्बी है.

क्या है नार्को परीक्षण :- नार्को परीक्षण का प्रयोग किसी व्यक्ति से जानकारी प्राप्त करने के लिए दिया जाता है जो या तो उस जानकारी को प्रदान करने में असमर्थ होता है या फिर वो उसे उपलब्ध कराने को तैयार नहीं होता दूसरे शब्दों मे यह किसी व्यक्ति के मन से सत्य निकलवाने लिए किया प्रयोग जाता है. अधिकतर आपराधिक मामलों में ही नार्को परीक्षण का प्रयोग किया जाता है. हालांकि बहुत कम किन्तु यह भी संभव है कि नार्को टेस्ट के दौरान भी व्यक्ति सच न बोले. इस टेस्ट में व्यक्ति को ट्रुथ सीरम इंजेक्शन के द्वारा दिया जाता है. जिससे व्यक्ति स्वाभविक रूप से बोलता है. नार्को विश्लेषण एक फोरेंसिक परीक्षण होता है, जिसे जाँच अधिकारी, मनोवैज्ञानिक, चिकित्सक और फोरेंसिक विशेषज्ञ की उपस्थिति में किया जाता है. भारत में हाल के कुछ वर्षों से ही ये परीक्षण आरंभ हुए हैं, किन्तु बहुत से विकसित देशों में वर्ष १९२२ में मुख्यधारा का भाग बन गए थे, जब राबर्ट हाउस नामक टेक्सास के डॉक्टर ने स्कोपोलामिन नामक ड्रग का दो कैदियों पर प्रयोग किया था. जिस व्यक्ति पर नार्को किया जाता है वह व्यक्ति जो भी बोलता है वह अनायास ही बोलता है यानि कि कुछ भी सोच समझकर नहीं बोलता. हालांकि कई उदाहरण ऐसे भी हैं जब यह पाया गया कि व्यक्ति ने नार्को टेस्ट के दौरान भी झूठ बोला है. वस्तुत: नार्को टेस्ट में व्यक्ति की मानसिक क्षमता और भावनात्मक दृढ़ता पर ही सब कुछ निर्भर करता है. नार्को टेस्ट कानूनी रूप से सबूत के तौर पर तो नहीं लिए जाते हैं, परंतु विभिन्न अपराधों की जांच में बहुत उपयोगी साबित होते रहे हैं.

कैसे होता है परिक्षण :- नार्को विशलेषण शब्द नार्क से लिया गया है, जिसका अर्थ है नार्कोटिक. हॉर्सले ने पहली बार नार्को शब्द का प्रयोग किया था. १९२२ में नार्को एनालिसिस शब्द मुख्यधारा में आया जब १९२२ में रॉबर्ट हाऊस, टेक्सास में एक ऑब्सेट्रेशियन ने स्कोपोलेमाइन ड्रग का प्रयोग दो कैदियों पर किया था. नार्को परीक्षण करने के लिए सोडियम पेंटोथॉल, सोडियम एमेटल, इथेनॉल, बार्बिचेरेट्स, स्कोपोल-अमाइन, टेपाज़ेमैन आदि को आसुत जल में मिलाया जाता है. परीक्षण के दौरान व्यक्ति को सोडियम पेंटोथॉल का इंजेक्शन लगाया जाता है. व्यक्ति को दवा की मात्रा उसकी आयु, लिंग, स्वास्थ्य और शारीरिक परिस्थिति के आधार पर दी जाती है. यदि परीक्षण के दौरान अधिक मात्रा दे दी जाये तो वह कोमा में भी जा सकता है या उसकी मृत्यु भी हो सकती है. परीक्षण में प्रश्नों के उत्तर देते हुए पूरी तरह से व्यक्ति होश में नहीं होता है और इसी कारण से वह प्रश्नों के सही उत्तर देता है क्योंकि वह उत्तरों को घुमा-फिरा पाने की स्थिति में नहीं होता है. इस ड्रग के प्रभाव में न केवल वह अर्ध बेहोशी की हालत में चला जाता है बल्कि उसकी तर्क बुद्धि (रिजिनिंग) भी कार्यशील नहीं रहती है. वह व्यक्ति जो एक तरह से सम्मोहन अवस्था में चला गया होता है, वह अपनी तरफ़ से अधिक कुछ बोलने की स्थिति में नहीं होता बल्कि पूछे गए कुछ सवालों के बारे में ही कुछ बता सकता है. यह भी माना जाता है कि नार्को टेस्ट में व्यक्ति हमेशा सच ही उगलता है, जबकि बहुत कम किन्तु फिर भी उस अवस्था में भी वह झूठ बोल सकता है, एवं विशेषज्ञों को गुमराह कर सकता है.

नार्को परीक्षण अवैज्ञानिक हैं :- नार्को टेस्ट को जहाँ विकसित विश्व के बहुत से देशों ने ऐसे परीक्षणों को अन्वेषण से मुख्य रूप से पृथक कर दिया हो, अधिकतर गणतांत्रिक विश्व जिनमे अमेरिका और ब्रिटेन भी शामिल हैं, वहाँ ऐसे परीक्षण कुछ समय से प्राय: लुप्त हो गए हैं. भारत में इसका प्रयोग आरंभ होने के बाद किसी अपराध के संदिग्ध को पकड़ते ही लोग उसके नार्को परीक्षण की मांग करने लगते हैं. उनका ये मानना होता है कि इस परीक्षण के बाद सच्चाई सामने निश्चित ही आ जायेगी, जबकि इसके पूरे प्रतिशत नहीं होते हैं. भारतीय संविधान का एक प्रमुख तत्त्व है धारा २०, अनु.३. इसके तहत "किसी व्यक्ति को जिस पर कोई आरोप लगे हैं, उसे अपने विरुद्ध गवाह के रूप में प्रयोग नहीं किया जाएगा." यदि नार्को परीक्षण की मूल अंतर्वस्तु को समझाने की कोशिश करेंगे तो इसके द्वारा व्यक्ति को किसी रूप में स्वयं के विरुद्ध ही गवाह के रूप में प्रयोग किए जाने की संभावना बनी रहती है. लेकिन विगत कुछ निर्णयों में माननीय न्यायालयों के द्वारा परीक्षण के पक्ष में मत दिया गया है. भारत के मानसिक स्वास्थ्य संस्थान नेशनल इंस्टिटयूट ऑफ मेण्टल हेल्थ एण्ड न्यूरो साइंसेस के निदेशक की अध्यक्षता में बनी विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों की समिति कमेटी ने ब्रेन मैपिंग आदि परीक्षणों के बरे में कहा है कि ये परीक्षण अवैज्ञानिक हैं और उन्हें जांच के उपकरण के रूप में प्रयोग करने पर तत्काल रोक भी लगानी चाहिए. नार्को परीक्षण के अलावा सच उगलवाने के लिए पॉलीग्राफ, लाईडिटेक्टर टेस्ट और ब्रेन मैपिंग टेस्ट किया जाता है.

क्या नार्को परिक्षण पर भारत में भी प्रतिबन्ध लग जाना चाहिए ?

April 23, 2010

नित्यानंद को मारी चप्पल (आपकी क्या राय है)


चप्पल अब विरोध का प्रतीक बन गई है. बुश, चिदंबरम और कई दूसरी नामी हस्तियों के बाद आज नित्यानंद को को चप्पल मारी गई. गिरफ्तार नित्यानंद को मजिस्ट्रेट हाउस से पेशी के बाद जेल ले जाते वक्त श्रीनिवास नामक एक शख्स ने नित्यानद पर चप्पल फेंक पर हमला किया. पुलिस ने श्रीनिवास को भी गिरफतार कर लिया है. उसके चप्पल मारने के कारणों का खुलासा नहीं हुआ है. लेकिन आम जन की भावनाओं के साथ खिलवाड करने वाले ढोंगी बाबाओं के साथ अगर ऐसा सलूक किया जाए तो कोई गलत न होगा.

April 22, 2010

कैसे बचाएं अपनी वसुंधरा ? (विश्व पृथ्वी दिवस पर विशेष)


(कमल सोनी)>>>> आज पूरे विश्व में विश्व वसुंधरा दिवस यानि विश्व पृथ्वी दिवस मनाया जा रहा है. इसे पहली बार अप्रैल 1970 में इस उद्देश्य से मनाया गया था कि लोगों को पर्यावरण के प्रति संवेदनशील बनाया जा सके. इसमें कोई संदेह नहीं है कि अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति अल गोर की पुस्तक 'इनकन्वीनिएंट ट्रुथ' और 2007 में उन्हें संयुक्त राष्ट्र के आईपीसीसी के साथ संयुक्त रूप से मिले नोबेल पुरस्कार ने इस ओर जागरूकता बढ़ाने में मदद की है. अक्सर यह समाचार सुनने को मिलते हैं कि उत्तरी ध्रुव की ठोस बर्फ कई किलोमीटर तक पिघल गई है. सूर्य की पराबैगनी किरणों को पृथ्वी तक आने से रोकने वाली ओजोन परत में छेद हो गया है. इसके अलावा फिर भयंकर तूफान, सुनामी और भी कई प्राकृतिक आपदों की खबरें आप तक पहुँचती हैं, हमारे पृथ्वी ग्रह पर जो कुछ भी हो रहा है? इन सभी के लिए मानव ही जिम्मेदार हैं, जो आज ग्लोबल वार्मिग के रूप में हमारे सामने हैं. धरती रो रही है. निश्चय ही हम ही दोषी हैं. भविष्य की चिंता से बेफिक्र हरे वृक्ष काटे गए. इसका भयावह परिणाम भी दिखने लगा है. सूर्य की पराबैगनी किरणों को पृथ्वी तक आने से रोकने वाली ओजोन परत का इसी तरह से क्षरण होता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब पृथ्वी से जीव-जन्तु व वनस्पति का अस्तिव ही समाप्त हो जाएगा. जीव-जन्तु अंधे हो जाएंगे. लोगों की त्वचा झुलसने लगेगी और त्वचा कैंसर रोगियों की संख्या बढ़ जाएगी. समुद्र का जलस्तर बढ़ने से तटवर्ती इलाके चपेट में आ जाएंगे.

विश्व पृथ्वी दिवस और उसका इतिहास :- पृथ्वी दिवस, 22 अप्रैल को मनाया जाता है, यह एक दिवस है जिसे पृथ्वी के पर्यावरण के बारे में प्रशंसा और जागरूकता को प्रेरित करने के लिए डिजाइन किया गया है. इसकी स्थापना अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन के द्वारा 1970 में एक पर्यावरण शिक्षा के रूप में की गयी, और इसे कई देशों में प्रति वर्ष मनाया जाता है. यह तारीख उत्तरी गोलार्द्ध में वसंत और दक्षिणी गोलार्द्ध में शरद का मौसम है. संयुक्त राष्ट्र में पृथ्वी दिवस को हर साल मार्च एक्विनोक्स (वर्ष का वह समय जब दिन और रात बराबर होते हैं) पर मनाया जाता है, यह अक्सर 20 मार्च होता है, यह एक परम्परा है जिसकी स्थापना शांति कार्यकर्ता जॉन मक्कोनेल के द्वारा की गयी. सितम्बर 1969 में सिएटल, वाशिंगटन में एक सम्मलेन में विस्कोंसिन के अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन घोषणा की कि 1970 की वसंत में पर्यावरण पर राष्ट्रव्यापी जन साधारण प्रदर्शन किया जायेगा. सीनेटर नेल्सन ने पर्यावरण को एक राष्ट्रीय एजेंडा में जोड़ने के लिए पहले राष्ट्रव्यापी पर्यावरण विरोध की प्रस्तावना दी."यह एक जुआ था," वे याद करते हैं "लेकिन इसने काम किया." जानेमाने फिल्म और टेलिविज़न अभिनेता एड्डी अलबर्ट ने पृथ्वी दिवस, के निर्माण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. हालांकि पर्यावरण सक्रियता का सन्दर्भ में जारी इस वार्षिक घटना के निर्माण के लिए अलबर्ट ने प्राथमिक और महत्वपूर्ण कार्य किये, जिसे उसने अपने सम्पूर्ण कार्यकाल के दौरान प्रबल समर्थन दिया, लेकिन विशेष रूप से 1970 के बाद, एक रिपोर्ट के अनुसार पृथ्वी दिवस को अलबर्ट के जन्मदिन, 22 अप्रैल, को मनाया जाने लगा, एक स्रोत के अनुसार यह गलत भी हो सकता है. अलबर्ट को टीवी शो ग्रीन एकर्समें प्राथमिक भूमिका के लिए भी जाना जाता था, जिसने तत्कालीन सांस्कृतिक और पर्यावरण चेतना पर बहुमूल्य प्रभाव डाला.

पारिस्थितिकीय फ्लैग का निर्माण :- विश्व के ध्वजों के अनुसार, पारिस्थितिक ध्वज का निर्माण कार्टूनिस्ट रोन कोब्ब के द्वारा किया गया, और इसे 7 नवम्बर, 1969 को लोस एंजेलेस फ्री प्रेस में प्रकाशित किया गया, और फिर इसे सार्वजनिक डोमेन में रखा गया. यह प्रतीक "E" व "O" अक्षरों के संयोजन से बनाया गया था, जिन्हें क्रमशः "Environment" व "Organism" शब्दों से लिया गया था. इस झंडे का प्रतिरूप संयुक्त राज्य अमेरिकी ध्वज से लिया गया था और इसमें एक के बाद एक तेरह हरी और सफ़ेद धारियां थीं.
इसकी केंटन हरी थी और इसमें पीला थीटा था. बाद के ध्वजों में थीटा का उपयोग ऐतिहासिक रूप से या तो एक चेतावनी के प्रतीक के रूप में या शांति के प्रतीक के रूप में किया गया. थीटा बाद में पृथ्वी दिवस से सम्बंधित हो गया.

पृथ्वी दिवस नेटवर्क :- राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण नागरिकता और साल भर उन्नति को बढ़ावा देने के लिए 1970 में पृथ्वी दिवस नेटवर्क की स्थापना पहले पृथ्वी दिवस के आयोजकों के द्वारा की गयी. पृथ्वी दिवस के नेटवर्क के माध्यम से, कार्यकर्ता, राष्ट्रीय, स्थानीय और वैश्विक नीतियों में परिवर्तनों को आपस में जोड़ सकते हैं.अन्तराष्ट्रीय नेटवर्क 174 देशों में 17,000 संस्थानों तक पहुँच गया है, जबकि घरेलू कार्यक्रमों में 5,000 समूह और 25,000 से अधिक शिक्षक शामिल हैं, जो साल भर कई मिलियन समुदायों के विकास और पर्यावरण सुरक्षा कार्यकर्ताओं की मदद करते हैं

धरती खो रही है अपना प्राकृतिक रूप :- आज हमारी धरती अपना प्राकृतिक रूप खोती जा रही है. जहाँ देखों वहाँ कूड़े के ढेर व बेतरतीब फैले कचरे ने इसके सौंदर्य को नष्ट कर दिया है. विश्व में बढ़ती जनसंख्या तथा औद्योगीकरण एवं शहरीकरण में तेज़ी से वृध्दि के साथ-साथ ठोस अपशिष्ट पदार्थों द्वारा उत्पन्न पर्यावरण प्रदूषण की समस्या भी विकराल होती जा रही है. ठोस अपशिष्ट पदार्थों के समुचित निपटान के लिए पर्याप्त स्थान की आवश्यकता होती है. ठोस अपशिष्ट पदार्थों की मात्रा में लगातार वृध्दि के कारण उत्पन्न उनके निपटान की समस्या न केवल औद्योगिक स्तर पर अत्यंत विकसित देशों के लिए ही नहीं वरन कई विकासशील देशों के लिए भी सिरदर्द बन गई है. उदा. के लिए अकेले न्यूयार्क में प्रतिदिन 2500 ट्रक भार के बराबर ठोस अपशिष्ट पदार्थों का उत्पादन होता है, यहाँ प्रतिदिन 25,000 टन ठोस कचरा निकलता है. इस समय विश्व में प्रतिवर्ष प्लास्टिक का उत्पादन 10 करोड़ टन के लगभग है और इसमें प्रतिवर्ष उसे 4 प्रतिशत की वृध्दि हो रही है. भारत में भी प्लास्टिक का उत्पादन व उपयोग बड़ी तेजी से बढ़ रहा है. औसतन प्रत्येक भारतीय के पास प्रतिवर्ष आधा किलो प्लास्टिक अपशिष्ट पदार्थ इकट्ठा हो जाता है. इसका अधिकांश भाग कूड़े के ढेर पर और इधर-उधर बिखर कर पर्यावरण प्रदूषण फैलाता है. एक अनुमान के अनुसार केवल अमेरिका में ही एक करोड़ किलोग्राम प्लास्टिक प्रत्येक वर्ष कूड़ेदानों में पहुंचता है. इटली में प्लास्टिक के थैलों की सालाना खपत एक खरब है. इटली आज सर्वाधिक प्लास्टिक उत्पादक देशों में से एक है.

पर्यावरण में जहर घोल रहा पॉलीथीन :- आधुनिक युग में सुविधाओं के विस्तार ने सबसे अधिक पर्यावरण को ही चोट पहुंचाई. लोगों की सुविधा के लिए इजाद की गई पॉलीथीन आज मानव जाति के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन गई है. नष्ट न होने के कारण यह भूमि की उर्वरक क्षमता को खत्म कर रही है. यह भूजल स्तर को घटा रही है और उसे जहरीला बना रही है. पॉलीथीन को जलाने से निकलने वाला धुआं ओजोन परत को भी नुकसान पहुंचा रहा है, जो ग्लोबल वार्मिग का बड़ा कारण है. पॉलीथीन कचरे से देश में प्रतिवर्ष लाखों पशु-पक्षी मौत का ग्रास बन रहे हैं. लोगों में तरह-तरह की बीमारियां फैल रही हैं, जमीन की उर्वरा शक्ति नष्ट हो रही है तथा भूगर्भीय जलस्रोत दूषित हो रहे हैं. प्लास्टिक के ज्यादा संपर्क में रहने से लोगों के खून में थेलेट्स की मात्रा बढ़ जाती है. इससे गर्भवती महिलाओं के गर्भ में पल रहे शिशु का विकास रुक जाता है और प्रजनन अंगों को नुकसान पहुंचता है. प्लास्टिक उत्पादों में प्रयोग होने वाला बिस्फेनॉल रसायन शरीर में डायबिटीज व लिवर एंजाइम को असामान्य कर देता है. पॉलीथीन कचरा जलाने से कार्बन डाईऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड एवं डाईऑक्सीन्स जैसी विषैली गैसें उत्सर्जित होती हैं. इनसे सांस, त्वचा आदि की बीमारियां होने की आशंका बढ़ जाती है. इन थैलों का अधिक इस्तेमाल करके हम न सिर्फ पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे है, बल्कि गंभीर रोगों को भी न्यौता दे रहे है. इन्हे यूं ही फेंक देने से नालियां जाम हो जाती है. इससे गंदा पानी सड़कों पर फैलकर मच्छरों का घर बनता है. इस प्रकार यह कालरा, टाइफाइड, डायरिया व हेपेटाइटिस-बी जैसी गंभीर बीमारियों का भी कारण बनते है.
भारत में प्रतिवर्ष लगभग 500 मीट्रिक टन पॉलीथिन का निर्माण होता है, लेकिन इसके एक प्रतिशत से भी कम की रीसाइकिलिंग हो पाती है. अनुमान है कि भोजन के धोखे में इन्हे खा लेने के कारण प्रतिवर्ष 1,00,000 समुद्री जीवों की मौत हो जाती है. इनको निगलने से मवेशियों की मौत की खबरें तो तुमने भी पढ़ी-सुनी होंगी. जमीन में गाड़ देने पर पॉलीथिन थैले अपने अवयवों में टूटने में 1,000 साल से अधिक ले लेती है. यह पूर्ण रूप से तो कभी नष्ट होते ही नहीं हैं. यहाँ तक कि जिन पॉलीथिन के थैलों पर बायोडिग्रेडेबल लिखा होता है, वे भी पूर्णतया इकोफ्रेंडली नहीं होते है.

ग्लोबल वार्मिग :- पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि ही ग्लोबल वार्मिग कहलाता है. वैसे, पृथ्वी के तापमान में बढोत्तरी की शुरुआत 20वीं शताब्दी के आरंभ से ही हो गई थी. माना जाता है कि पिछले सौ सालों में पृथ्वी के तापमान में 0.18 डिग्री की वृद्धि हो चुकी है. वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि धरती का टेम्परेचर इसी तरह बढता रहा, तो 21वीं सदी के अंत तक 1.1-6.4 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान बढ जाएगा. हमारी पृथ्वी पर कई ऐसे केमिकल कम्पाउंड पाए जाते हैं, जो तापमान को बैलेंस करते हैं. ये ग्रीन हाउस गैसेज कहलाते हैं. ये प्राकृतिक और मैनमेड (कल-कारखानों से निकले) दोनों होते है. ये हैं- वाटर वेपर, मिथेन, कार्बन डाईऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड आदि. जब सूर्य की किरणें पृथ्वी पर पडती हैं, तो इनमें से कुछ किरणें (इंफ्रारेड रेज) वापस लौट जाती हैं. ग्रीन हाउस गैसें इंफ्रारेड रेज को सोख लेती हैं और वातावरण में हीट बढाती हैं. यदि ग्रीन हाउस गैस की मात्रा स्थिर रहती है, तो सूर्य से पृथ्वी पर पहुंचने वाली किरणें और पृथ्वी से वापस स्पेस में पहुंचने वाली किरणों में बैलेंस बना रहता है, जिससे तापमान भी स्थिर रहता है. वहीं दूसरी ओर, हम लोगों (मानव) द्वारा निर्मित ग्रीन हाउस गैस असंतुलन पैदा कर देते हैं, जिसका असर पृथ्वी के तापमान पर पडता है. यही ग्रीन हाउस इफेक्ट कहलाता है. दरअसल, पृथ्वी के तापमान को स्थिर रखने के लिए दशकों पूर्व काम शुरू हो गया था. लेकिन मानव निर्मित ग्रीन हाउस गैसों के उत्पादन में कमी लाने के लिए दिसंबर 1997 में क्योटो प्रोटोकोल लाया गया. इसके तहत 160 से अधिक देशों ने यह स्वीकार किया कि उनके देश में ग्रीन हाउस गैसों के प्रोडक्शन में कमी लाई जाएगी. आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि 80 प्रतिशत से अधिक ग्रीन हाउस गैस का उत्पादन करने वाले अमेरिका ने अब तक इस प्रोटोकोल को नहीं माना है.

मौसम चक्र हुआ अनियमित :- आज धरती पर हो रहे जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार कोई और नहीं बल्कि समस्त मानव जाति है. सुविधाभोगी जीवन शैली में सामाजिक सरोकारों को पीछे छोड़ दिया है. जैसे-जैसे हम विकास के सोपान चढ़ रहे हैं वैसे-वैसे पृथ्वी पर नए-नए खतरे उत्पन्न हो रहे हैं. दिन-प्रतिदिन घटती हरियाली व बढ़ता पर्यावरण प्रदूषण रोज नई समस्याओं को जन्म दे रहा है. इस कारण प्रकृति का मौसम चक्र भी अनियमित हो गया है. अब सर्दी, गर्मी और वर्षा का कोई निश्चित समय नहीं रह गया. हर वर्ष तापमान में हो रही वृद्धि से बारिश की मात्रा कम हो रही है. इस कारण भू जल स्तर में भारी कमी आई है. अगर समय रहते कोई उपाय नहीं किए तो समस्याएं इतना विकराल रूप धारण कर लेंगी. इसलिए सभी को एकजुट होकर पृथ्वी को बचाने के उपाय करने होंगे. इसमें प्रशासन, सामाजिक संगठन, स्कूल, कालेज सहित सभी को इसमें भागीदारी निभानी होगी.

क्या करें :-
1. बाजार जाते समय साथ में कपड़े का थैला, जूट का थैला या बॉस्केट ले जाएं.
2. हम प्रत्येक सप्ताह कितने पॉलीथिन थैलों का इस्तेमाल करते हैं, इसका हिसाब रखें और इस संख्या को कम से कम आधा करने का लक्ष्य बनाएं.
3. यदि पॉलीथिन थैले के इस्तेमाल के अलावा कोई और विकल्प न बचे तो एक सामान को एक पॉलीथिन थैले में रखने के स्थान पर कई सामान एक ही थैले में रखने की कोशिश करे.
4. घर पर पॉलीथिन थैलों का काफी उपयोग किया जाता है. जैसे लंच पैक करना, कपड़े रखना या कोई अन्य घरेलू सामान रखना, इनमें से कुछ को कम करने का प्रयास करे.
5. पॉलीथिन के थैलों से जितना बच सकते है, बचें. पॉलीथिन के थैलों को एक बार इस्तेमाल कर फेंकने के स्थान पर उनका पुन: प्रयोग करने का प्रयास करे.
6. स्थानीय अखबारों में चिट्ठिया लिखकर, स्कूल में पोस्टर के द्वारा या प्रजेंटेशन से इस मसले पर जागरुकता फैलाने का काम करे
7. आज के दिन पोलीथिन के उपयोग से बचें. बाजार जाते समय कप़ड़े का बेग साथ लें जाएँ. ऐसा कर आप पर्यावरण संरक्षण यज्ञ में छोटी ही सही, पर महत्वपूर्ण आहूति दे सकते हैं.
8. बच्चों को प्रोत्साहित करें कि वे अपने पुराने खिलौने तथा गेम्स ऐसे छोटे बच्चों को दे दें जो कि इसका उपयोग कर सकते हैं. एक तरह से यह रिसाइक्लिंग प्रक्रिया ही होगी क्योंकि एक तो आपके घर की सामग्री नष्ट होने से बच जाएगी, दूसरे जिसे वह मिलेगी उसे बाहर से पर्यावरण के लिए नुकसानदायक सामग्री खरीदनी नहीं पड़ेगी. इससे बच्चों में त्याग की भावना भी बलवती होगी. केवल बच्चों ही नहीं बड़े लोग भी अपने कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक सामान तथा पुस्तकें भेंट कर सकते हैं.

चिंतन मनन का दिन :- विश्व पृथ्वी दिवस महज़ एक दिन मनाने का नहीं है. यह दिन है इस बात के चिंतन मनन का कि हम कैसे अपनी वसुंधरा को बचा सकते हैं ? ऐसे कई तरीके हैं जिसे हम अकेले और सामूहिक रूप से अपनाकर धरती को बचाने में योगदान दे सकते हैं. वैसे तो हमें हर दिन को पृथ्वी दिवस मानकर उसके संरक्षण के लिए कुछ न कुछ करते रहना चाहिए, लेकिन अपनी व्यस्तता में व्यस्त इंसान यदि विश्व पृथ्वी दिवस के दिन ही थो़ड़ा बहुत योगदान दे तो धरती के ऋण को उतारा जा सकता है. हम सभी जो कि इस स्वच्छ श्यामला धरा के रहवासी हैं उनका यह दायित्व है कि दुनिया में कदम रखने से लेकर आखिरी साँस तक हम पर प्यार लुटाने वाली इस धरा को बचाए रखने के लिए जो भी सकें करें क्योंकि यह वही धरती है जो हमारे बाद भी हमारी निशानियों को अपने सीने से लगाकर रखेगी. लेकिन यह तभी संभव होगा जब वह हरी-भरी तथा प्रदूषण से मुक्त रहे और उसे यह उपहार आप ही दे सकते हैं. तो हर दिन को पृथ्वी दिवस मानें और आज से ही नहीं अभी से ही करें इसे बचाने के प्रयास करे.