October 16, 2009

पंचकल्याण पर्व दीपावली (दीपावली विशेष)

सभी बलोगर मित्रों को कमल सोनी की ओर से दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं..................
भोपाल (कमल सोनी) 16/अक्टूबर/2009/(ITNN)>>>> भारत में पर्व संस्कृति की दीर्घ परंपरा में दीपावली जैसा कोई दूसरा पर्व नहीं है। दीपावली पांच दिनों का श्रृंखलाबद्ध माननीय त्योहार है। कार्तिकमास कृष्णपक्ष की त्रयोदशी, चतुर्दशी तथा अमावस्या और शुक्लपक्ष की प्रतिपदा तथा द्वितीया तक आयोजित यह पर्व केवल आगम-निगम का सम्मेलन ही नही होता बल्कि जीवन के तमाम कर्मपक्ष इन्हीं पांच दिनो में अनुस्यूत हो उठते है। कार्तिक की अमावस्या को दीवाली कहा जाता है। इस दिन देश भर में चौतरफा दीपमालाएं प्रज्जवलित की जाती है। नदी तटों, देव मंदिरों, चौराहों और गलियो में जलते हुए दीपक अमावस्या के निविड़ अंधकार को पराजित कर खिलखिला उठते है। इस दिन घूरे के भी दिन बहुरते है। छोटे-बड़े सभी एक रूप। यह है दीपावली का ममैव पक्ष। भ्रतहरि का कहना है, 'कृतिनाम् अपि स्फुरति एष निर्मल विवेद दीपक:' अर्थात दीपावली मनाने वाले कृतीजन मिट्टी के दीए तो जलाते ही हैं, साथ ही वे अपने विवेक-दीपक भी जला लेते है। दीपावली पंचकल्याण पर्व है। इसे पांच दिनों के श्रृंखलाबद्ध कृत्यों द्वारा सम्पन्न किया जाता है। इसका मुख्य त्योहार है अमावस्या, परन्तु अमावस्या के दो दिन पहले से दो दिन बाद तक यह पर्व मनाया जाता है। दो दिन पहले के पर्व है - धनतेरस और नरक चतुर्दशी।
धनतेरस :- धनतेरस दीपावली की शुरुआत होती है। इस दिन क्रेता-विक्रेताओं का उत्तोजक संगमन होता है। दीपवृक्षों और दीप प्रखंडिकाओं से दुकानें सजाई जाती है। आजकल बिजली की सजावटे कलात्मक बाजारों को चुनौतियां देने की कोशिश कर रही है परन्तु प्राचीनता अपना अस्तित्व कायम रखना चाहती है। ग्लोबल बाजार रहे तो रहे। धनतेरस के बाजार में स्वर्ण, रजत पात्र से लेकर स्टेनलेस स्टील तक के पात्रों की बिक्री हो जाती है। दीपावली को शिष्टाचारी भक्त लगभग आधी रात को क्रीत पात्रों सहित लक्ष्मी पूजन करते है। लक्ष्मी और गणेश की स्थापना करते हैं। बाएं गणेश दाहिने लक्ष्मी। धनतेरस की पूजा का अर्थ ही है लक्ष्मी का आवाहन। गणेश स्थायी सुरक्षा देने वाले देवता माने जाते है। इस प्रकार धनतेरस दीपावली के उत्सव को काफी सघन बना देता है।
नरक चौदस :- इसे नरक चतुर्दशी इसलिए कहा जाता है कि इसी दिन घर का सारा कूड़ा-कतवार बाहर निकालकर एक स्थान पर फेंक देते है। शाम होते-होते कतवार के उस ढेर पर घर के सबसे बड़े दीए को कड़ुवा तेल से भरकर चारों मुंह जला देते है। किसी भी ओर से नरकासुर के आने की संभावना नहीं रह जाती। कार्तिक की कृष्णा चतुर्दशी 'यम' का दिन होती है। यम और यमी की पूजा दीपावली को वैदिक परंपरा से जोड़ देती है। पद्मपुराण, भविष्य पुराण, गरुड़ पुराण और स्कंद पुराण जैसे कई दूसरे पुराणों में दीपावली पर्व की राष्ट्रीय धारा पर बड़ी-बड़ी कथाएं लिखी गई है।
दीपावली :- धनतेरस और नरक चतुर्दशी पूर्व पर्वो के बाद कृषिकर्मा दीपावली आती है। दीपावली को महानिशा और शुभ रात्रि माना गया है। इस रात में सूर्य और चंद्रमा की युति शुक्र की तुला राशि में होती है जो कि भौतिक सुखों और संपन्नता को प्रदान करती हैं। श्रीसूक्त और भविष्यपुराण के अनुसार लक्ष्मीजी का वास बिल्ववृक्ष में माना गया है। दीपावली की रात के तीसरे और चौथे प्रहर में मंत्र और यंत्रों को सिद्ध करके संपन्नता प्राप्त की जा सकती है।
प्रात:काल ही मिट्टी के दीए और काजल पारने की मृत्तिका घटी खरीदे जाते है। दिन में दीपावली का विशेष पकवान बनता है। विशेष इस अर्थ में कि सूरन का भर्ता और नए आलू के साथ नए बैगन की सब्जी अवश्य बनाते है। यहा यह कह देना असंगत न होगा कि सूरन और बैगन आर्यकालीन द्रविड़ों के मुख्य भोग्य थे, जिन्हे वे यम-दिशा में उगाते थे। बाद में आर्यो ने भी इन्हे खाना शुरू कर दिया। दीपावली पर ओदन और उड़द का बड़ा का पकवान निश्चित बनता है। दीपावली पर ऋग्वेदिक आर्यो का सबसे प्रिय खेल द्यूतक्रीड़ा था। महाभारत का पूरा युद्ध ही द्यूत-क्रीड़ा का परिणाम माना गया है। ये सभी कर्म निगमवादी है, परन्तु दीपावली को आगमवादियों ने भी कम महत्व नहीं दिया है। दीपावली की आधी रात को तंत्रसाधना का बहुविधान किया गया है। दीपावली की आधी रात के करीब घंटी में पारा गया काजल पूरे घर को लगाया जाता है। इससे आंख की रोशनी तो बढ़ती है है तांत्रिक साधकों की नजर भी नहीं लगती। दीपावली की सारी रात श्वान निद्रा तक सीमित रहती है क्योंकि उषाकाल होते ही घर की कोई स्त्री शूर्पवादन करते हुए घर के कोने-कोने से दरिद्रता का निष्काषन और ईश्वरता का प्रवेशन करती है।
दीपावली पर प्रचलित कथा :-
भगवान राम अयोध्या लौटें : 14 साल के वनवास के बाद भगवान राम, रावण का वध करकर अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अयोध्या वापस आये थे इसी दिन अयोध्या अपने राजा की वापसी मनाता है, दीपावली के दिन अयोध्यावासियों ने दीप जलाकर भगवान राम का स्वागत किया था एक युद्ध जिसमें भगवान राम ने रावण को मार डाला था
अन्नकूट :- दीपावली की रात बीती और शुक्ल प्रतिपदा लगते ही अन्नकूट की सजावट प्रारंभ हो जाती है। अन्नकूट देवता के भोगोपरांत प्राय: सभी मंदिरों, घरों में दर्शन-पूजन और कथा श्रवण तथा दीपदान का विधान होता है। अन्नकूट के भोग के लिए छप्पन प्रकार के व्यंजन बनते है। अन्नकूट के दिन भगवान को कच्चा भोग लगाया जाता है यानि आज के दिन अनाज के व्यंजन बनाकर भगवान को भोग लगाया जाता है आज के दिन गोवर्धन पूजा भी की जाती है, यही वह दिन है जो कृष्ण इंद्र हार के रूप में मनाया जाता है. आज ही के दिन भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाया था इसीलिये अन्नकूट के दिन कृष्ण मंदिरों में गोवर्धन पूजा का विशेष आयोजन भी किया जाता है
भैयादूज :- दीपावली के पाँच दिन चलने वाले महोत्सव में शामिल है 'भाई दूज' उत्सव। भैयादूज अन्नकूट के दूसरे दिन पड़ता है। हिंदू समाज में भाई-बहन के अमर प्रेम के दो ही त्योहार हैं। पहला है रक्षा बंधन जो श्रावण मास की पूर्णिमा को आता है तथा दूसरा है भाई दूज जो दीपावली के तीसरे दिन आता है। भाई दूज को यम द्वितीया भी कहते हैं। परम्परा है कि रक्षाबंधन वाले दिन भाई अपनी बहन को रक्षा का वचन देकर उपहार देता है और भाई दूज वाले दिन बहन अपने भाई को तिलक लगाकर, उपहार देकर उसकी लम्बी उम्र की कामना करती है। रक्षा बंधन वाले दिन भाई के घर तो, भाई दूज वाले दिन बहन के घर भोजन करना अति शुभ फलदाई होता है।
भाई दूज की कथा : - सूर्यदेव की पत्नी छाया की कोख से यमराज तथा यमुना का जन्म हुआ। यमुना अपने भाई यमराज से स्नेहवश निवेदन करती थी कि वे उसके घर आकर भोजन करें। लेकिन यमराज व्यस्त रहने के कारण यमुना की बात को टाल जाते थे। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना अपने द्वार पर अचानक यमराज को खड़ा देखकर हर्ष-विभोर हो गई। प्रसन्नचित्त हो भाई का स्वागत-सत्कार किया तथा भोजन करवाया। इससे प्रसन्न होकर यमराज ने बहन से वर माँगने को कहा। तब बहन ने भाई से कहा कि आप प्रतिवर्ष इस दिन मेरे यहाँ भोजन करने आया करेंगे तथा इस दिन जो बहन अपने भाई को टीका करके भोजन खिलाए उसे आपका भय न रहे। यमराज 'तथास्तु' कहकर यमपुरी चले गए।
दीपावली(विशेष संयोग) "लक्ष्मी के साथ सूर्य, शनि को भी पूजें" :- दीपावली पर इस बार तुला संक्रांति और शनि अमावस्या भी पड़ रही है। अतरू जो लोग लोहा या उससे जुड़ा व्यापार करते हैं उनके लिए यह लाभदायक है। ज्योति पर्व पर इस बार जो योग बन रहे हैं, वह सभी के लिए अच्छे हैं। ज्योतिषाचार्य आशु गुरु कहते हैं कि दीपावली शनिवार को पड़ रही है, अतरू शनि से संबंधित लोगों के लिये यह लाभ दायक है। जो लोग शेयर, जमीन, लोहा आदि से जुड़ा व्यापार करते हैं, उनके लिए यह शुभदायक होगी। पूजन सायं 07:22 बजे से 09:15 बजे तक किया जायेगा। इस दौरान वृष लगन होगी। जो लोग सिद्घि करना चाहते हैं उनके लिए रात्रि 01:52 से लेकर 04:05 तक है।
एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने लोगों का भ्रम दूर किया। बताया कि 17 अक्टूबर को ही दीपावली पूजन है, क्योंकि इस दिन दोपहर 12:37 से अमावस्या लग रही है। महालक्ष्मी पूजन रात्रि को ही होता है, इसलिए दूसरे दिन यह तिथि रात्रि में नहीं होगी। उन्होंने बताया कि दक्षिणावर्ती शंख में चांदी का सिक्का और साबुत चावल, गौरीशंकर रुद्राक्ष, स्फटिक श्रीयंत्र को एक साथ रखकर दीपावली पूजन करें। इससे सभी मनोकामना पूर्ण होंगी।
ज्योतिष विभाग की पूर्व अध्यक्ष डा:किरन जेटली ने बताया कि 17 अक्टूबर दोपहर 11:30 बजे से तुला संक्रांति भी है। प्रातरू सूर्य की उपासना से सुख-समृद्घि आती है। इस दिन प्रातरू गेंहू, तांबे का बर्तन, लाल फूल आदि दान करना लाभदायक है। उनके अनुसार प्रदोष काल (संध्या समय) सायं 05:45 से 11:35 बजे तक मुहुर्त सर्वश्रेष्ठ है।
दीपावली की रात्रि को निम्न उपाय भी करें :-
>> इस दिन श्रीयंत्र को स्थापित कर गन्ने के रस और अनार के रस से अभिषेक करके लक्ष्मी मंत्रों का जाप करें।
>> दीपावली की रात्रि को पीपल के पत्ते पर दीपक जलाकर नदी में प्रवाहित करें। उसके दूर जाने की प्रतीक्षा करें। इससे आर्थिक संकट दूर होंगे।
>> लक्ष्मी पूजन के समय अपने बहीखातों व कलम-दवात का पूजन करना चाहिए।
>> दीपावली को रात्रि में हात्थाजोड़ी को सिंदूर में भरकर तिजोरी में रखने से धन में वृद्धि होती है।
>> सात गोमती चक्र और काली कोड़ियों को व्यापार वाले स्थान में रखने से निरंतर व्यापार में वृद्धि होती रहती है।
>> घर पर हमेशा बैठी हुई लक्ष्मीजी की और व्यापारिक स्थल पर खड़ी हुई लक्ष्मीजी की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए।
>> लक्ष्मीजी को गन्ना, अनार, सीताफल अवश्य चढ़ाएं।
>> इस दिन पूजा स्थल में एकाक्षी नारियल की स्थापना करें। यह साक्षात लक्ष्मी का ही स्वरूप माना गया है। जिस घर में एकाक्षी नारियल की पूजा होती हो, वहां लक्ष्मी का स्थाई वास होता है।
>> दीपावली की रात्रि में श्रीसूक्त, कनकधारा स्तोत्र एवं गोपाल सहस्रनाम का पाठ करने से लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है।

October 10, 2009

ओबामा को नोबेल, क्या नोबेल पर भी राजनीति हावी ?

भोपाल (कमल सोनी) 10/अक्टूबर/2009 >>>> अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को वर्ष 2009 का शांति का नोबेल पुरस्कार दिया जाएगा लेकिन सबसे अहम् सवाल यह है कि अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी को नोबेल क्यों नहीं मिला जबकि ओबामा खुद महात्मा गांधी को "रियल हीरो" मानते है ओबामा को वर्ष 2009 का शांति का नोबेल पुरस्कार दिए जाने की घोषणा से फिर एक नया विवाद उठ खडा हुआ है इससे पूर्व भी शांति के लिए दिए जाने वाले नोबेल पुरस्कार पर विवाद उठ चुके हैं वर्षो से इनकी चयन प्रक्रिया पर उंगली उठती रही है। यूं कहें कि शांति के नोबेल पुरस्कार और विवादों का चोली-दामन का साथ है तो गलत न होगा। ख़ास बात तो यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा स्वयं नोबेल शांति पुरस्कार के लिए उनके चयन पर ‘आश्चर्यचकित’ हैं और उन्हें इस पर संदेह है कि क्या वह इस सम्मान के हकदार हैं।
हैरत में डालने वाली एक ख़ास बात तो यह है कि अभी उन्हें पद संभाले हुए एक साल भी नहीं हुआ फिर एक साल में उन्होंने ऐसा क्या कर दिया कि उन्हें 2009 का शांति का नोबेल पुरस्कार दिए जाने की घोषणा कर दी गई इसमें कोई दो मत नहीं कि ओबामा के प्रयास सराहनीय नहीं हैं नोबेल पुरस्कारों के लिए बनी निर्णायक समिति ने अपने बयान में कहा है कि बराक ओबामा को यह पुरस्कार देने का निर्णय उनके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक प्रयासों को विशेष गति देने के लिए किया गया है
इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए ओबामा के चुने जाने की खबर अमेरिकियों के साथ ही शेष विश्व के लोगों के लिए भी चौंका देने वाली ही है क्योंकि उनका नाम न तो संभावितों की सूची में कहीं था और न ही नोबेल शांति पुरस्कार के दावेदारों में उनके बारे में कोई अटकल थी। ओबामा ऐसे तीसरे पदस्थ राष्ट्रपति हैं जिन्हें यह प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला है। वर्ष 1906 में टी. रूजवेल्ट और 1919 में वूड्रो विल्सन को भी नोबेल शांति पुरस्कार मिल चुका है। वर्ष 2002 में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर को भी यह पुरस्कार मिला था।
यहाँ एक ख़ास बात और गौर करने लायक यह है कि अमेरिका को भले ही कई लड़ाइयों के लिए दोषी ठहराया जाता रहा हो, लेकिन शांति के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वालों में सबसे आगे अमेरिकी ही हैं। 1901 में शुरुआत से अब तक करीब दो दर्जन अमेरिकियों को यह पुरस्कार मिल चुका है।
एक और रोचक तथ्य यह है कि ओबामा ने 20 जनवरी 2009 को अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में काम शुरू किया। नोबेल शांति पुरस्कार के नाम लेने की अंतिम तारीख 1 फरवरी 2009 थी। यानी 11 दिन के उनके कार्यकाल पर उन्हें विश्व में अमन स्थापित करने का सम्मान दे दिया गया! यही नहीं, निर्णायकों ने अपने वोट जून में दे दिए थे- यानी तब भी चार माह हुए थे ओबामा के उन प्रयासों को, जो किसी और को तो खैर दिखे तक नहीं, किन्तु नोबेल कमेटी को ‘असाधारण, अद्वितीय’ लगे। सम्मान की घोषणा वाले दिन तक भी वे नौ माह पुराने ही ‘शांति के क्रांतिकारी’ हैं।
अंततः अब हर आदमी के दिल में एक ही सवाल जन्म ले रहा है कि अब कहीं यह पुरस्कार राजनीति से प्रेरित तो नहीं हो गया ?
सन १९८० से शांति के लिए नोबल पुरस्कार विजेताओं की सूची :-
<><><> 2009: यूं एस प्रेसिडेंट बराक ओबामा
<><><> 2008: मर्त्ति आहतिसाड़ी
<><><> 2007: इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज, अल गोरे
<><><> 2006: मुहम्मद युनुस, ग्रामीण बैंक
<><><> 2005: इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेन्सी, मोहमद एल्बरादी
<><><> 2004: वंगारी माथाई
<><><> 2003: शिरीन एबादी
<><><> 2002: फोर्मेर यूं एस प्रेजिडेंट जिमी कार्टर
<><><> 2001: यूनाइटेड नेशन्स, कोफी अन्नान
<><><> 2000: किम डे-ज़ंग
<><><> 1999: मेडेसिंस साँस फ़्रन्तियरर्स
<><><> 1998: जॉन ह्युमे, डेविड त्रिम्ब्ल
<><><> 1997: इंटरनेशनल काम्पैन तो बैन लैंडमाइंस, जोडी विलियम्स
<><><> 1996: कार्लोस फिलिपे ज़िमेनेस बेलो, जोसे रामोस-होर्ता
<><><> 1995: जोसफ रोटब्लाट, पुगवाश कोंफ्रेंस ऑन साइंस एंड वर्ल्ड अफेयर्स
<><><> 1994: यासेर अराफात, शिमोन पेरेस, यित्ज्हक राबिन
<><><> 1993: नेल्सन मंडेला, ऍफ़.डब्ल्यू. दे क्लर्क
<><><> 1992: रिगोबेर्ता मंचू तुम
<><><> 1991: औंग सान सू क्यी
<><><> 1990: मिखाइल गोर्बाचेव
<><><> 1989: 14th दलाई लामा
<><><> 1988: यूएन पीसकीपिंग फोर्सेस
<><><> 1987: ऑस्कर अरिअस सांचेज़
<><><> 1986: एली विएसेल
<><><> 1985: इंटरनेशनल फिजिसियन फॉर द प्रिवेंशन ऑफ़ न्यूक्लियर वार
<><><> 1984: डेसमंड टूटू
<><><> 1983: लेक वालेसा
<><><> 1982: अल्वा मिर्डल, अलफोंसो गार्सिया रोब्ल्स
<><><> 1981: ऑफिस ऑफ़ द यूं एन हाई कमीश्नर फॉर रिफ्यूजी
<><><> 1980: अदोल्फो पेरेज़ एस्कुइवेल

October 2, 2009

क्या गांधी को सिर्फ गोडसे ने मारा ?

आज दो अक्टूबर यानि गांधी जयंती वो दिन जिस दिन अहिंसा के पुजारी ने जन्म लेकर इस धरती को पुण्य किया था लेकिन आज २ अक्टूबर का दिन महज़ एक औपचारिकता बनकर ही रह गया है राजनेता राष्टपिता को श्रद्धा सुमन अर्पित कर गांधी विचारों को अपनाने का संकल्प लेते हैं यह सिलसिला काफी तो समय से चल रहा है कल से फिर धर्म, जात और क्षेत्रीयता के नाम पर देशवासियों को बाँट कर अपने स्वार्थ की रोटियाँ सेकना शुरू कर देगे स्कूल, कॉलेज के छात्र छात्राएं हों या फिर, कामकाजी वर्ग, या फिर व्यवसाई वर्ग, हट व्यक्ति दो अक्तूबर को गाँधी जयंती से ज्यादा छुट्टी के दिन के रूप में जानता हैं । आज की आधुनिक पीढ़ी गाँधी के विचारों से पूरे तरह अनजान है । यही वजह है कि अहिंसा के पुजारी के इस देश में हिंसा अपने चरम पर है स्वदेशी अपनाने का नारा देने वाले गांधी के देशवासी अपनी संस्कृति छोड़ विदेशी को अपनाने में जुटे हुए हैं
गांधी के विचारों से अनजान है यही वजह है कि उनमें धैर्य नही है, आज की हिंसक घटनाओं का सीधा असर देश की ऍम जनता पर पद रहा है लेकिन किसी को क्या ? गांधी जयन्ती तो हर साल आती है ! राजनैतिक पार्टियों एवं अन्य संगठनो का नजरिया बिल्कुल साफ है, मांगे मनवानी हो शहर बंद कर दो, सरकार से नाराजगी है, नेताओ के पूतले फूंक दो, सरकार से बात मनवानी है, बसे फूंक दो । विरोध प्रदर्शन करना है रेलें फूंक दो । हम ऐसे ही हैं और ऐसे ही रहेंगे हमें क्या ? "ये फूंक दो-जला दो प्रथा" गांधी के देश की संस्कृति बनती जा रही है । कौन कहता है गांधी को गोडसे ने मारा, आज हर दिन हर पल, चौक चौराहों से लेकर सदन तक गांधी के विचारों और आदर्शों की क्रमिक हत्या होती है । और वो हत्याएं करने वाले भी हम में से ही एक हैं "जैसे राम से बड़ा राम का नाम" वैसे ही "गांधी से बड़े गांधी के विचार" जिनकी हमारे देश में हर रोज़ हत्या होती है क्या हम कह सकते हैं ? कि - गांधी को सिर्फ गोडसे ने मारा

July 21, 2009

सदी का सबसे लंबा सूर्यग्रहण कल, वैज्ञानिकों में खासा उत्साह


चांद-सितारों और खगोलीय घटनाओं में दिलचस्पी रखने वालों सहित तमाम लोगों खासा उत्साह है, क्योंकि बुधवार २२ जुलाई को इस सदी का सबसे लंबे समय तक चलने वाला खग्रास सूर्यग्रहण देखा जा सकेगा। करीब 360 वर्ष बाद किसी क्षेत्र विशेष में हो रही इस अद्भुत खगोलिया घटना को देखने के लिए पूरे देश में रोमांच की स्थिति है। दिन की शुरुआत के साथ ही शुरू होने वाला यह सूर्यग्रहण पृथ्वी के अलग-अलग स्थानों पर लगभग तीन घंटे 25 मिनिट तक दिखाई देगा।
कब होता है पूर्ण सूर्यग्रहण :- खग्रास सूर्यग्रहण तब होता है, जब चंद्रमा सूर्य के सामने आ जाता है और सूर्य की चमकीली सतह चंद्रमा के कारण ढंक जाती है। खग्रास सूर्यग्रहण को पृथ्वी की सतह से एक पतली पट्टी पर पड़ने वाले स्थानों से ही देखा जा सकता है।
कहाँ कहाँ देखा जा सकेगा खग्रास सूर्यग्रहण :- जिन भारतीय शहरों से खग्रास सूर्यग्रहण देखा जा सकता है, उनमें भावनगर, सूरत, उज्जैन, इंदौर, भोपाल, जबलपुर, वाराणसी, इलाहाबाद, गया, पटना, भागलपुर, जलपाईगुड़ी, गुवाहाटी और डिब्रूगढ़ शामिल हैं। मध्यप्रदेश के भोपाल में पूर्ण सूर्यग्रहण 6.22 से 6.26 बजे के बीच लगभग साढ़े तीन मिनट तक चलेगा। आम लोग भी अपने स्तर पर सूर्यग्रहण का नजारा देख सकें इसके लिए कुछ संस्थाओं ने सोलर फिल्टर चश्मे उपलब्ध करवाने की व्यवस्था की है। मप्र विज्ञान सभा सदस्य के एस तिवारी के अनुसार आंचलिक विज्ञान केंद्र तथा जवाहर विद्यालय से कोई भी न्यूनतम कीमत में सोलर फिल्टर चश्मा प्राप्त कर सकता है। मध्यप्रदेश के जिन शहरों में पूर्ण सूर्यग्रहण दिखेगा उनमें इंदौर, उज्जैन, देवास, सीहोर, खंडवा, विदिशा, रायसेन, भोपाल, होशंगाबाद, इटारसी, सागर, दमोह, नरसिंहपुर, जबलपुर, सतना, मैहर, रीवा, सीधी, शहडोल शामिल हैं।
अध्ययन के लिए विशेष इन्तेजाम :- सदी का सबसे लंबी अवधि का सूर्यग्रहण 22 जुलाई को भोपाल समेत देश के अन्य शहरों में दिखाई देगा। इसके अध्ययन और दर्शन के लिए शासकीय और निजी संस्थाओं ने विशेष इंतजाम किए हैं। रीजनल साइंस सेंटर ने सोमवार से जागरूकता कार्यक्रम की शुरुआत की, वहीं साइंस सेंटर (ग्वालियर) मप्र मंगलवार से तीन दिनी महोत्सव शुरू कर रहा है, जिसमें इसके प्रभाव पर अध्ययन किया जाएगा।
ग्रहण बताएगा सूरज की गर्मी का राज :- इंदौर सहित दुनियाभर में वैज्ञानिकों ने सूर्यग्रहण के दौरान कई प्रयोगों की तैयारी की है। इतना लंबा खग्रास सूर्यग्रहण इसके बाद ठीक 123 वर्ष बाद 13 जुलाई 2132 को दिखेगा। इस ऐतिहासिक खगोलीय घटना के बारे में नेहरू प्लेनेटेरियम के पूर्व निदेशक जे.जे. रावल का कहना है कि प्रभात की वेला में सूर्यग्रहण होने की वजह से ग्रहण के समय शेडाबेक फिनोमिनन स्पष्ट रूप से देखा जा सकेगी और इस अवधि में वायुमंडल में कंपन्न का एहसास होगा। हल्के सफेद-काली पट्टी भी वातावरण में देखी जा सकेंगी। यह सूर्यग्रहण एक भारतीय वैज्ञानिक की 1981 में इंटरनेशनल जर्नल ‘अर्थ, मून एंड प्लेनेट’ में प्रकाशित उस थीसिस को समर्थन देगा जिसमें कहा गया था कि सूर्य के इर्दगिद वलय (घेरे) एवं छोटे-छोटे गृह होने की संभावना है। यह खगोलशास्त्री एवं नेहरू प्लेनेटेरियम, दिल्ली के पूर्व निदेशक जे जे रावल ने विश्व के सामने रखी थी। उन्होंने आगे बताया कि खग्रास सूर्यग्रहण के समय सूर्य के इर्दगिर्द जो रंगपटल (स्पैक्ट्रम ) बनता है, उससे सूर्य के वातावरण के तापमान एवं प्रेशर की जानकारी प्राप्त हो सकती है।
14 इंच के टेलिस्कोप से देखेंगे ग्रहण :- 22 जुलाई को होने वाले सदी के सबसे बड़े सूर्यग्रहण के लिए सभी ओर तैयारियां चल रही हैं। इसे देखने के लिए वैज्ञानिकों ने कई सुझाव दिए और कई जगह विशेष व्यवस्था की गई है। खगोलशास्त्र में रुचि रखने वालों के लिए ग्रहण बड़ी उत्सुकता का विषय है। शहर में ऐसे ही लोगों के लिए सूर्यग्रहण देखने का इंतजाम आईपीएस एकेडमी में किया जा रहा है। यहां १४ इंच के सेलिस्ट्रोन टेलिस्कोप से सूर्यग्रहण लाइव देखा जा सकता है। एकेडमी के आईएसएलटी विभाग के डायरेक्टर प्रो. एम.एल. शर्मा ने बताया यह टेलिस्कोप प्रदेश का सबसे शक्तिशाली टेलिस्कोप है। ज्यादा से ज्यादा लोग इससे सूर्यग्रहण देख सकें इसलिए सीसीडी कैमरे लगाकर स्क्रीन पर भी ग्रहण दिखाया जाएगा।
तारेगना में भी जुडा शोधकर्ताओं का हुजूम :- सूर्यग्रहण पट्टी में ऐतिहासिक खगोलीय घटना का गवाह बनने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त स्थान साबित होने के बाद आर्यभट्ट की धरती तारेगना इसके लिए पूरी तरह तैयार है। दुनिया भर से वैज्ञानिकों का हुजूम अपने पूरे साजो सामान के साथ बिहार के तारेगना स्थान से सूर्यग्रहण का नजारा देखेगा। मुख्यमंत्री समेत विशिष्ट लोगों के लिए अनुमंडल का रेफरल अस्पताल तो अन्य लोगों के लिए तारेगना के गांधी मैदान, सेंट मैरी स्कूल तथा सेंट माइकल स्कूल को तैयार किया गया है। तारेगना में तैयारियों और शहर में बाहरी लोगों के जमघट से स्थानीय लोगों के कौतूहल को पंख लग गए हैं। विभिन्न विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों के वैज्ञानिक और छात्र भी आज शाम तक तारेगना पहुंच जाएंगे। इस सिलसिले में अखिल भारतीय जनविज्ञान नेटवर्क एवं भारत ज्ञान विज्ञान समिति से जुड़े एवं पूर्व राष्ट्रपति डा. ए पी जे अब्दुल कलाम के सहयोगी रहे डा. एम पी परमेश्वरन, नेटवर्क के अध्यक्ष सी पी नारायणन, महासचिव डा. अमित सेनगुप्ता, राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद के वैज्ञानिक शशि आहूजा, भारत ज्ञान विज्ञान समिति के सचिव आशा मिश्र, मुख्य रूप से राजधानी पहुंच गए हैं। स्पेस के डा. विक्रांत नारंग भी 21 की शाम तक तारेगना पहुंच जाएंगे। पटना तथा अन्य जगहों से पहुंच रहे लोगों ने सूर्यग्रहण देखने को स्थानीय लोगों के मकान की छतें भी बुक करा ली हैं। बाहरी लोगों की हलचल और यहां चल रही प्रशासनिक तैयारियों ने पूरे माहौल में उत्सुकता घोल दी है। आर्यभट्ट की धरती का होने का गौरव उनके हावभाव में झलक जाता है।
नासा की रिपोर्ट से सुर्खियों में आया तारेगना :- पर्यटकों का रुख तारेगना की ओर करने में अमेरिका के नेशनल एरोनाटिक एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन [नासा] द्वारा इस सूर्य ग्रहण के संबंध में जारी करीब 200 पृष्ठों की रिपोर्ट ने अहम भूमिका निभाई है। रिपोर्ट में सूर्यग्रहण के संदर्भ में तारेगना की खूबियां गिनाई गई हैं। नासा के मुताबिक तारेगना में बदली छाने की औसत संभावना इलाहाबाद में 77 और बनारस में 71 प्रतिशत के मुकाबले 63 प्रतिशत है। साथ ही धूप की चमक [सनशाईन] का औसत मुंबई के 18 प्रतिशत, इंदौर के 25 प्रतिशत, इलाहाबाद के 34 प्रतिशत के मुकाबले तारेगना में 43 प्रतिशत है। तारेगना में ये दो फैक्टर नेपाल, बांग्लादेश, भूटान एवं चीन से बेहतर हैं जहां ये सूर्य ग्रहण दिखाई देगा। ऐसे में सूर्य ग्रहण के नजारे के लिए यह सबसे बेहतर स्थान है।
घटेगा गुरुत्वाकर्षण :- कहा जाता है कि ग्रहण के दौरान पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण कम हो जाता है। चीन में छह स्थानों पर हाई सेंसिटिव उपकरण लगाए जाएंगे, जो ग्रहण काल के दौरान पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण क्षमता रिकॉर्ड करेंगे।
सूर्यग्रहण देखने के लिए क्या करें :- गत्ते में पिन छेद करके उसे सूर्य की किरणों के सामने रखकर सूर्य की छवि किसी छाया वाली दीवार पर प्रक्षेपित करें। एक छोटे दर्पण को कागज के टुकड़े से ढ़ककर कागज में दो सेंटीमीटर व्यास का छिद्र बनाकर इससे दीवार पर सूर्य की छवि प्रक्षेपित करें। पूर्णता की स्थिति में आप सूर्य को सीधा निहार सकते हैं, मगर लगातार न देखें।
ग्रहण देखने के लिए यह न करें :- धुंआयुक्त ग्लास, रंगीन फिल्म, सनग्लास, नानसिल्वर ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म का इस्तेमाल न करें। टेलीस्कोप या बाइनाकुलर से सूर्य को कभी न देखें। पूर्ण सूर्यग्रहण की दशा को लगातार न देखें।
राशियों पर असर :- ग्रहण का धार्मिक महत्व भी है। मंदिरों में इसके लिए भी विशेष तैयारियां की गई हैं। ग्रहण काल में भगवान की मूर्ति को स्पर्श नहीं किया जाता है। ज्योतिषों के अनुसार ग्रहण का कुछ राशियों में शुभ तो कुछ राशियों में अशुभ फलदायक रहेगा कुछ राशियों में मिश्रित फल मिलेंगे
मेष: स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव, दुर्घटना की संभावना
वृष: रुके काम बनेंगे। वाणी पर संयम रखें।
मिथुन: खर्च अधिक, चिंताएं बढ़ेंगी
कर्क: कोर्ट के मामलों में सतर्क रहें, वाहन सावधानी से चलाएं।
सिंह: अधिकारियों से विवाद होगा। लेनदेन नहीं करें।
कन्या: आर्थिक लाभ होगा। शुभ कार्य होंगे।
तुला: मिलेजुले प्रभाव होंगे। पदोन्नति हो सकती है।
वृश्चिक: परिवार में मतभेद उभरेंगे। काम रुक सकते हैं।
धनु: समय कष्टप्रद रहेगा। वाहन सावधानी से चलाएं।
मकर: स्वास्थ्य प्रभावित होगा। संतान की चिंता बढ़ेगी।
कुंभ: शत्रु शांत होंगे। काम बन सकते हैं।
मीन: मिश्रित फल मिलेंगे। धैर्य बना रहा तो फायदा होगा।

June 5, 2009

विश्व पर्यावरण दिवस - ३८ सालों से इस परम्परा का बखूबी पालन कर रहे हैं |


आज हम ३८ वां विश्व पर्यावरण दिवस मना रहे हैं पिछले ३८ सालों से इस परम्परा का बखूबी पालन कर रहे हैं लेकिन इसके कितने बेहतर परिणाम मिले यह किसी से छिपा नहीं है विश्व पर्यावरण दिवस (WED) की शुरुआत यूनाइटेड नेशंस इनवायरमेंट प्रोग्राम के तहत यूं.एन एसेम्बली द्वारा 1972 में की गई थी वर्ष 1972 से प्रतिवर्ष 5 जून को पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा है। और इस साल इस आयोजन की थीम है-'आपके ग्रह को आपकी जरूरत है! जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए एक हों'। साथ ही इसका मुख्य उद्देश्य आम जनमानस में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता लाना था हालाकि इस दिशा में कुछ हद तक सफलता ज़रूर मिली लेकिन क्या इसे सराहनीय कहा जा सकता है ..... ? क्या आज जो परिणाम हमारे सामने है उन्हें आशानुरूप कहा जा सकता है ..... ? नहीं
पूरी दुनिया के मुकाबले हिमालय ज्यादा तेज़ गति से गर्म हो रहा है एक आंकड़े के मुताबिक गत 100 वर्षों में हिमालय के पश्चिमोत्तर हिस्से का तापमान 1.4 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है जो कि शेष विश्व के तापमान में हुए औसत इजाफे (0.5-1.1 डिग्री सेल्सियस) से अधिक है। रक्षा शोध एवं विकास संस्थान (डीआरडीओ) और पुणे विश्वविद्यालय के भूगर्भ विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों ने क्षेत्र में बर्फबारी और बारिश की विविधता का अध्ययन किया और पाया कि एक और बढ़ती गर्मी के कारण सर्दियों की शुरुआत अपेक्षाकृत देर से हो रही है तो दूसरी और बर्फबारी में भी कमी आ रही है। शोधकर्ताओं का कहना है कि पश्चिमोत्तर हिमालय का इलाका पिछली शताब्दी में 1.4 डिग्री सेल्सियस गर्म हुआ है जबकि दुनिया भर में तापमान बढ़ने की औसत दर 0.5 से 1.1 डिग्री सेल्सियस रही है। “अध्ययन का सबसे रोचक निष्कर्ष यह रहा कि पिछले तीन दशकों के दौरान पश्चिमोत्तर हिमालय क्षेत्र के अधिकतम और न्यूनतम तापमान में तेज इजाफा हुआ जबकि दुनिया के अन्य पर्वतीय क्षेत्रों जैसे कि आल्प्स और रॉकीज में न्यूनतम तापमान में अधिकतम तापमान की अपेक्षा अधिक तेजी से वृद्धि हुई है।” अध्यान के लिए इस क्षेत्र से संबंधित आंकड़े भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) स्नो एंड अवलांच स्टडी इस्टेब्लिशमेंट (एसएएसई) मनाली और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मीटरोलॉजी से जुटाए गए थे।
जलवायु परिवर्तन के कारण अनेक दुष्परिणाम सामने आ रहे है। यदि यह सब ऐसे ही चलता रहा, तो हमारी पृथ्वी को आग का गोला बनते देर न लगेगी। और तब क्या होगा इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती जिस तरह जलवायु परिवर्तन के कारण डायनासोर धरती से अचानक विलुप्त हो गए। ठीक उसी तरह जलवायु परिवर्तन के कारण अन्य जीव-जंतुओं पर भी ऐसा ही खतरा मंडरा रहा है। एक अनुमान के मुताबिक, 2050 तक पृथ्वी के 40 फीसदी जीव-जंतुओं का खात्मा हो जाएगा! इतना ही नहीं जलवायु परिवर्तन का खासा असर इंसानों पर भी पड़ने वाला है जिससे हम अनभिज्ञ नहीं है लेकिन हाँ सतर्क भी नहीं
आज पीढ़ी दर पीढ़ी सुविधाभोगी होती जा रही है। स्कूल जाने के लिए भी आप में से कई बाइक की जिद करते हैं। साइकिल चलाना शान के खिलाफ लगता है। वास्तव में, कुल ऊर्जा खपत का पांचवां हिस्सा हम निजी वाहनों के प्रयोग व सरकारी और बसों आदि के संचालन में ही धुआं कर देते हैं!
जिंदा रहने के लिए सांस लेना जरूरी है, लेकिन फैक्ट्रियों और वाहनों की रासायनिक धुँए से हवा में लगातार कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा बढ़ रही है जो जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारण है । एक रिसर्च के मुताबिक आने वाले सौ सालों में वायुमंडल में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा मौजूदा स्तर की तीन गुना हो जाएगी। तब हर किसी को ऑक्सीजन मास्क पहनने की ज़रुरत पड़ेगी
दूसरी और सडकों के निर्माण और उद्योगों के विस्तार के चलते अंधाधुंध पेड़ों की कटाई से वर्षा का प्रभावित होना भी जलवायु परिवर्तन का एक विशेष कारण रहा है परिणाम स्वरुप धरती के जलस्तर में भी गिरावट आ रही है पूरे देश में मौजूदा पानी किल्लत यही दर्शाती है
आज ज़रुरत है 5 जून के वास्तविक महत्व को समझने की और पर्यावरण के संरक्षण के प्रति खुद को संकल्पित करने की पर्यावरण संरक्षण दिवस साल में एक बार महज़ एक औपचारिकता के रूप में मानाने का दिन नहीं है बल्कि स्वयं को दूसरों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्रेरित करने का है किसी ने सच ही कहा है "हम बदलेंगे जग बदलेगा, हम सुधरेंगे जग सुधरेगा" यदि पूरे साल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम किया जाय ऐसे आयोजन किये जाएँ जहां आमजनमानस में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता लाइ जा सके पेड़ों की कटाई करने की अपेक्षा ज़्यादा से ज्यादा मात्रा में नए पेड़ और उद्यान लगाये जाएँ धरती के जल स्तर को संतुलित करने के लिए इमारतों, घरों और सडकों का निर्माण "वाटर हारवेस्टिंग" प्रणाली के तहत किया जाये उद्योगों का रासायनिक कचरा नष्ट करने की विधी विकसित की जाए जो सीधे तौर पर पर्यावरण को इतना नुकसान न पहुंचा सकें सामान्य तौर पर हो वाहनों के प्रयोग में कमी लाइ जाये तो जलवायु में होने वाले इस क्रमिक परिवर्तन को रोका जा सकता है ग्लोबल वार्मिंग पर विजय हासिल की जा सकती है